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सामाजिक जागरण की फ़िल्म : 'मार्चिंग इन द डार्क'

किंशुक सुरजन की पुरस्कृत डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है, जो रायपुर शहर के श्याम टॉकीज में 14 तारीख की शाम दिखाई गई

सामाजिक जागरण की फ़िल्म : मार्चिंग इन द डार्क
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  • डॉ. सत्यभामा आडिल

किंशुक सुरजन की पुरस्कृत डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है, जो रायपुर शहर के श्याम टॉकीज में 14 तारीख की शाम दिखाई गई। 2 घण्टे की इस फ़िल्म ने दर्शकों को बांधे रखा! सबसे खास बात यह कि, देश की ज्वलन्त समस्याओं को क्रमश: उठाया गया,व प्रश्नचिन्ह खड़ा किया!

पहली समस्या-सोयाबीन,प्याज आदि के बम्पर उत्पादन के बावजूद,किसानों को सही दाम नहीं मिलना।फलस्वरूप हताश ,निराश किसान आत्महत्या करते हैं। बिचौलियों के कारण यह विषम व कारुणिक स्थिति उत्पन्न होती है। सरकार को दृढ़ता से बिचौलिया वाली स्थिति को तत्काल समाप्त करते हुए अनाज,दलहन,तिलहन, आलू प्याज, आदि के दाम निर्धारित करना चाहिए। सरकार किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो, सरकार की एक सुव्यवस्थित नीति बननी चाहिए। किसान ही राष्ट्र व समाज की नींव है,जो अर्थव्यवस्था का निर्माण करते हैं।

किसान की आत्महत्या के बाद विधवा पर कई आर्थिक व सामाजिक समस्याएं आती हैं--जिस पर छोटे छोटे दृश्यों व संवादों के माध्यम से प्रश्न उठाया गया है--जो बहुत मर्मान्तक है!

पहला प्रश्न यह कि अकेली विधवा अपना व बच्चों का भरण पोषण कैसे करेगी ? निश्चित रूप से किसान विमर्श के साथ साथ यह स्त्री विमर्श की भी कहानी है?

नायिका 'संजीवनी' के साथ उसकी साथिनें बतलाती हैं कि पति के जाने के बाद उनकी चूड़ियां तोड़ी जाती हैं?उन्हें बिंदी नहीं लगाने दिया जाता? उनका मंगलसूत्र निकाल दिया जाता है?

स्त्री के मन से उठने वाले ये प्रश्न भारतीय समाज की कट्टर रूढ़ियों पर प्रहार है! बिंदी रहित व चूड़ी के बिना खाली कलाई देखकर पुरुष वर्ग वासनापूर्ण दृष्टि से, नारी को देखता है--यह संकेत, अप्रत्यक्ष रूप से स्त्री दे रही है। छेड़छाड़ व पुरुषों की कुदृष्टि से बचाव का तरीका हो सकता है कि विधवा होने के बाद भी स्त्री को बिल्कुल सामान्य स्त्री की तरह पहनना,ओढ़ना चाहिये! फ़िल्म का यह संदेश बहुत सकारात्मक व प्रगतिशीलता का प्रतीक है।यह एक क्रांति की तरह है!

नायिका संजीवनी केवल घर पर रोती बिसूरती कैद नहीं होती,वरन पढाई, सिलाई, सीखकर आगे बढ़ती है।इस तरह समान समस्याएं झेलने वाली स्त्रियां समूह बनाकर अर्थोपार्जन के लिए आगे बढ़ती हैं।जीवन में आये अंधकार को दूर करने प्रगतिशील सोच की मशाल लेकर रोशनी की तलाश में आगे बढ़ती हैं!

वे निराशा के गहन अंधकार को भेदकर यात्रा करती हैं। यह सकारात्मक पक्ष ही इस फ़िल्म 'मार्चिंङ्ग इन द डार्क' की सफलता है। युवा किंशुक की सामाजिक सोच को बधाई।। इस फ़िल्म के बाद किंशुक को ब्रेक नहीं लेना है।हम चाहते हैं कि राष्ट्र में कई ज्वलन्त समस्याओं को लेकर फ़िल्म बनाते रहें। देश व समाज में जागरूकता लाएं। किंशुक को ढेरों बधाई व आशीष--इस फ़िल्म के लिए।यह प्रयोग है, जो आगे भी होते रहना चाहिए। अनन्त शुभकामनाएं क्रांति के बीजारोपण के लिए।


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