युद्ध खत्म होने के बाद कैसा दिख सकता है ईरान का भविष्य

अभी कोई नहीं जानता कि अमेरिका, इस्राएल और ईरान के बीच छिड़ी यह जंग कब खत्म होगी. यह कहना भी मुश्किल है कि लड़ाई के बाद ईरान की हालत कैसी होगी

Update: 2026-03-07 05:09 GMT

अभी कोई नहीं जानता कि अमेरिका, इस्राएल और ईरान के बीच छिड़ी यह जंग कब खत्म होगी. यह कहना भी मुश्किल है कि लड़ाई के बाद ईरान की हालत कैसी होगी. विशेषज्ञों ने अंदाजा लगाया है कि भविष्य में ईरान की राजनीति कैसे बदलेगी.

जब 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राएल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तो तेहरान के लोग अपनी छतों पर खड़े होकर खुशियां मनाते और नारे लगाते दिखे. हालांकि, यह बहुत अजीब बात थी. एक ओर इस युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादास्पद माना जा रहा है. कहा जा रहा है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर, ईरानी सरकार भी अमेरिका-इस्राएल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानती है. इसके बावजूद, लोगों ने वह किया जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी.

हैरान करने वाली बात यह है कि ईरान के कई नागरिक अपने ही देश में तबाही और मौतों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते इसका नतीजा उस धार्मिक शासन का अंत हो जिससे वे नफरत करते हैं. हालांकि, अमेरिका ने युद्ध के उद्देश्यों को लेकर कई विरोधाभासी बयान दिए हैं, लेकिन शासन बदलने की संभावना बनी हुई है.

जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शन करने वाले ईरानियों से सीधा संवाद करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उन्हें डटे रहने को कहा था. ट्रंप ने कहा, "जब हमारा काम (हमला) पूरा हो जाएगा, तब आप अपनी सरकार की कमान संभाल लेना. आपके पास ऐसा करने का मौका होगा. शायद आने वाली कई पीढ़ियों के लिए आपके पास यह इकलौता मौका होगा.”

कुछ ही घंटों बाद, खबर आई कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई एक हमले में मारे गए. हालांकि, खामेनेई के न रहने के बावजूद ईरान का शासन तंत्र पूरी तरह सक्रिय है और अनुभवी नेता अली लारीजानी इस समय देश का नेतृत्व कर रहे हैं. ऐसे में, अब यह देखना बाकी है कि क्या अमेरिका और इस्राएल अपने युद्ध उद्देश्यों को पूरा कर पाएंगे और भविष्य में ईरान किस दिशा में जाएगा.

वेनेजुएला जैसी स्थिति

राष्ट्रपति ट्रंप इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि खामेनेई के बाद कोई ऐसा उत्तराधिकारी चुना जाए जो अमेरिकी हितों को प्राथमिकता दे. ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स' से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि उनके मन में ‘तीन बहुत अच्छे विकल्प' हैं, लेकिन उन्होंने किसी का नाम उजागर नहीं किया.

किसी देश के राजनीतिक ढांचे को बदले बिना केवल उसके शीर्ष नेतृत्व को बदल देना यही ट्रंप की वेनेजुएला रणनीति रही है. जनवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पद से हटा दिया और फिर उनकी डिप्टी, डेल्सी रोद्रिगेज के साथ एक राजनीतिक समझौता कर लिया.

क्या ईरान पर हमले के दौरान तोड़ा गया अंतरराष्ट्रीय कानून?

ट्रंप ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स' से बातचीत में साफ तौर पर कहा, "हमने वेनेजुएला में जो किया, मुझे लगता है कि वह (ईरान के लिए) एकदम सही और सटीक परिदृश्य है.”

जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के कॉर्नेलियस अडेबहार ने जर्मन ब्रॉडकास्टर ‘एआरडी' से बात करते हुए एक नई संभावना जताई है. उन्होंने कहा कि ईरान एक ऐसा नया नेतृत्व तैयार कर सकता है जिसकी असली ताकत ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' (आईआरजीसी) होगी. यही नहीं, यह नया नेतृत्व अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से सुधारने और फिर से तालमेल बिठाने की कोशिश भी कर सकता है.

वह कहते हैं, "यह वेनेजुएला जैसी ही स्थिति है. आप शीर्ष नेतृत्व को बदल देते हैं और लोगों की उम्मीद से बहुत कम बदलाव होते हैं.”

हालांकि, यह पक्का नहीं है कि अमेरिका वास्तव में क्या चाहता है. एक तरफ ट्रंप ‘वेनेजुएला मॉडल' की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स से यह भी कहा कि ईरानी लोग एक बड़ा राजनीतिक बदलाव लाने के लिए उठ खड़े हो सकते हैं.

ईरानी नेतृत्व का क्या होगा?

हार्वर्ड के केनेडी स्कूल से जुड़े विशेषज्ञ पेयमान असदजादे का मानना है कि अमेरिका और इस्राएल के साथ जारी यह युद्ध अंततः ईरान के मौजूदा शासन को खत्म कर सकता है.

असदजादे के मुताबिक, दूसरा व्यवहारिक रास्ता भी मुमकिन है. इसे ‘रीकैलिब्रेशन के साथ कंटिन्यूटी' कहा जा सकता है. इस स्थिति में ईरान की ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' खामेनेई की जगह किसी व्यावहारिक और नरमपंथी उत्तराधिकारी को चुन सकती है. इसके बाद, सरकार का पूरा ध्यान बाहरी युद्ध के बजाय घरेलू मुद्दों, जैसे कि ‘अर्थव्यवस्था को सुधारने, देश में स्थिरता लाने और शासन में सुधार' पर केंद्रित होगा. जबकि, विदेश नीति का रुख तनाव कम करने की ओर मुड़ जाएगा. यह रास्ता काफी हद तक ऊपर बताए गए ‘वेनेजुएला मॉडल' जैसा ही है.

ब्रिटिश सिक्योरिटी थिंक टैंक ‘रुसी' के साथ जुड़ी मध्य-पूर्व मामलों की विशेषज्ञ बुर्कू ओजसेलिक ने कहा, "इस युद्ध के बाद तेहरान में जो भी सत्ता में आएगा, उसके लिए सबसे बुद्धिमानी भरा रास्ता यही होगा कि वह अमेरिका के साथ तनाव कम करने की नीति अपनाए. ऐसा करने से इस बात की उम्मीद जगेगी कि ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिल सके और उन करोड़ों ईरानियों पर पड़ रहा रोजमर्रा की महंगाई का बोझ कम होना शुरू हो जाए, जो इस समय भारी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. इससे आगे चलकर देश में स्थिरता आएगी और पुनर्निर्माण का वह दौर शुरू हो सकेगा जिसकी ईरान को इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत है.”

अली लारीजानी, जो पर्दे के पीछे से चला रहे हैं ईरान की हुकूमत

असदजादे एक तीसरी स्थिति की कल्पना भी करते हैं, जिसमें ईरानी शासन किसी और भी अधिक कट्टरपंथी नेता के इर्द-गिर्द लामबंद हो सकता है. ऐसी स्थिति में, शासन अपनी रूढ़िवादी विचारधारा को पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत और सख्त बना लेगा. यानी, ईरान पश्चिमी देशों के खिलाफ और भी कड़ा रुख अपना सकता है.

यह एक ऐसा रास्ता है जिससे ‘द गार्डियन' के संवाददाता जूलियन बोर्गर डरे हुए हैं. अपने हालिया विश्लेषण में उन्होंने लिखा, "बार-बार होने वाले हमलों के बाद, बचे हुए नेता इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि अब केवल बम ही उनके बचने की एकमात्र गारंटी है. ऐसे में विपक्ष को और भी अधिक क्रूरता के साथ दबा दिया जाएगा और यह बचा हुआ शासन काफी हद तक उत्तर कोरिया जैसा बनने लगेगा: दुनिया से कटा हुआ, शक्की और परमाणु हथियारों से लैस.”

क्या सत्ता में आ सकता है विपक्ष?

युद्ध छिड़ने से मात्र दो सप्ताह पहले, जर्मनी के म्यूनिख शहर की सड़कों पर लगभग 2,50,000 ईरानियों और अन्य प्रदर्शनकारियों का हुजूम उमड़ पड़ा. ये लोग रजा पहलवी का हौसला बढ़ा रहे थे, जिनके पिता (ईरान के अंतिम शाह) को 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सत्ता से बेदखल कर दिया गया था. पहलवी ने स्पष्ट किया कि वे दोबारा राजशाही स्थापित नहीं करना चाहते, बल्कि उनका लक्ष्य ईरान को एक लोकतंत्र में बदलना है.

जनवरी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान रजा पहलवी ने काफी ध्यान आकर्षित किया. हालांकि, उनका व्यक्तित्व विवादों से मुक्त नहीं है. इसका एक प्रमुख कारण यह है कि ईरान के वर्तमान शासन ने देश के भीतर सक्रिय लगभग सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया है या उन्हें खामोश कर दिया है.

अमेरिकी फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज (एफडीडी) के मार्क डुबोवित्स और बेन कोहेन ने स्वीकार किया कि रजा पहलवी ने ‘सत्ता हस्तांतरण की योजना' पर गंभीर काम किया है. लेकिन, योजना बनाना और सत्ता हाथ में होना दो अलग बातें हैं. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जिस दिन धार्मिक शासन खत्म होगा, उस दिन तेहरान की कमान किसके पास होगी. इसका कारण यह है कि ईरान सिर्फ एक तरह के लोगों का देश नहीं है. यह अलग-अलग जातियों और समुदायों, जैसे कि कुर्द, बलूच और अरबों का एक समूह है.

क्या युद्ध के बाद ईरान में हिंसा बढ़ेगी?

ईरान की सेना ने 1979 में शाह के पतन की राह तब आसान कर दी, जब उसने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था. इस अनुभव से सीख लेते हुए, क्रांति के बाद नए शासकों ने अपनी सत्ता की रक्षा के लिए ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी)' का गठन किया. आज भी ईरान में नियमित सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स साथ-साथ अस्तित्व में हैं. हालांकि, अधिकांश विश्लेषक आज आईआरजीसी को कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली मानते हैं.

इस बीच, यूरोपीय संघ ने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है. यह फैसला तब लिया गया, जब आईआरजीसी ने जनवरी में ईरान में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए बड़े पैमाने पर हिंसा का सहारा लिया.

राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध की शुरुआत में ईरानी सेना, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और पुलिस से सीधे अपील की थी कि वे अपने हथियार डाल दें. हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं कि इनमें से कोई भी संगठन बिखर गया हो या उनमें किसी तरह की अव्यवस्था पैदा हुई हो.

रुस से जुड़ी विशेषज्ञ ओजसेलिक का मानना है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को अपने ही देश में कड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है. इसकी वजह उनका ‘खास लोगों को फायदा पहुंचाने वाला सिस्टम' है.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "इससे ईरान के अलग-अलग संस्थानों के बीच मतभेद और गहरे हो सकते हैं. एक संभावना यह है कि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और नियमित सेना के बीच की खाई और बढ़ जाए. इस स्थिति में, सेना को एक ‘सुधरे हुए' चेहरे के रूप में पेश किया जा सकता है, जिसकी छवि देशभक्त और ईमानदार सेना के तौर पर हो. दूसरी संभावना यह है कि खुद रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के भीतर ही फूट पड़ जाए, जहां अलग-अलग गुट युद्ध के बाद मिलने वाले संसाधनों और ओहदों के लिए आपस में ही भिड़ जाएं.”

इस स्थिति में, ईरान की नियमित सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अलग-अलग और शायद एक-दूसरे के विरोधी राजनीतिक खेमों में बंट सकते हैं. इससे देश में गृहयुद्ध शुरू हो सकता है.

ईरान में अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोग रहते हैं. अगर सरकार गिरती है, तो यह जातीय विविधता देश की शांति के लिए खतरा बन सकती है. डर यह है कि सत्ता खाली होते ही अलग-अलग गुट सत्ता हथियाने की कोशिश करेंगे. युद्ध शुरू होने से सिर्फ एक हफ्ते पहले पांच कुर्द संगठनों ने मिलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. वे रजा पहलवी को अंतरिम नेता के रूप में मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं.

इन तमाम बातों से यह पता चलता है कि अगर ईरान का मौजूदा शासन खत्म होता है, तो आगे कितनी चुनौतियां हैं.

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