यूएनजीए में अंतरराष्ट्रीय कानून के चुनिंदा इस्तेमाल का व‍िरोध, दुनियाभर के नेताओं ने कहा-सब पर लागू हो एक कानून

दुनियाभर के नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू करने से ग्लोबल ऑर्डर कमजोर हो रहा है और युद्ध रोकने व सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिए बनाई गई संस्थाओं पर भरोसा कम हो रहा है।;

Update: 2026-09-27 07:12 GMT

संयुक्त राष्ट्र। दुनियाभर के नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को चुनिंदा तरीके से लागू करने से ग्लोबल ऑर्डर कमजोर हो रहा है और युद्ध रोकने व सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिए बनाई गई संस्थाओं पर भरोसा कम हो रहा है।

यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और कैरेबियन के नेताओं ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नियम तब भरोसेमंद नहीं रह सकते, जब उन्हें कुछ देशों पर सख्ती से लागू किया जाए, लेकिन ताकतवर देशों या उनके सहयोगियों के मामले में नजरअंदाज कर दिया जाए।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि दुनिया के सामने चुनाव अंतरराष्ट्रीय न्याय और ऐसी व्यवस्था के बीच है, जहां सिर्फ ताकत ही मायने रखती है। उन्होंने कहा क‍ि न्याय के बिना शांति नहीं हो सकती।

मैक्रों ने सवाल किया कि क्या देश एक सभ्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं या फिर 'जंगल के कानून' की ओर वापस जाना चाहते हैं।

उन्होंने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) का समर्थन किया और उस व्यवस्था का विरोध किया, जिसे उन्होंने ऐसी नई व्यवस्था बताया जहां गलत काम करने वालों को सजा का डर नहीं रह जाता।

कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी ने कहा कि जब तक फिलिस्तीन के मुद्दे को नजरअंदाज किया जाता रहेगा, तब तक दुनिया में न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था नहीं हो सकती। उन्होंने कहा क‍ि कानून सभी पर बराबर लागू होना चाहिए।

जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास प्रतिबंध, संपत्तियां फ्रीज करने, व्यापारिक पाबंदियां लगाने और किसी देश को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने जैसे कई तरीके मौजूद हैं। लेकिन उनके मुताबिक, इजरायल की कार्रवाइयों के मामले में इनका लगातार और एक समान इस्तेमाल नहीं किया गया।

उन्होंने कहा क‍ि प्रस्ताव वहीं खत्म हो जाते हैं, जहां से शुरू होते हैं, यानी कागज पर। कई नेताओं ने गाजा की स्थिति को दूसरे संघर्षों से भी जोड़ा। उनका कहना था कि अलग-अलग संघर्षों पर अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देने से पूरी बहुपक्षीय व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होती है।

घाना के राष्ट्रपति जॉन महामा ने चेतावनी दी कि दुनिया 'एकतरफा फैसलों, कानून की अनदेखी और बहुपक्षीय नियमों के कमजोर होने की खतरनाक दिशा' में बढ़ रही है। उन्होंने इजरायल और फिलिस्तीन के लिए टू-स्टेट सॉल्यूशन का समर्थन किया और हमास की ओर से की गई आतंकवादी कार्रवाइयों की निंदा की। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा कि आम नागरिकों की तकलीफ को कूटनीतिक भाषा के पीछे छिपाना बंद किया जाना चाहिए।

गुयाना के राष्ट्रपति इरफान अली ने कहा कि जलवायु आपदाएं, खाद्य असुरक्षा, असमानता और संघर्ष सभी गंभीर संकट हैं, लेकिन बहुपक्षीय व्यवस्था का कमजोर होना संभवतः सबसे ज्यादा चिंता की बात है। स्लोवेनिया के प्रधानमंत्री जनेज जान्शा ने दुनिया के बड़े संकटों और उन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया की तुलना करने के लिए एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव दिया।

इसके तहत यह देखा जाएगा कि कोई संकट कितना बड़ा, कितना लंबा और कितना गंभीर था और उसके जवाब में दुनिया ने कूटनीतिक, मानवीय और कानूनी स्तर पर क्या कदम उठाए। उन्होंने कहा कि इसका मकसद किसी राजनीतिक नतीजे को थोपना नहीं होगा, बल्कि यह पता लगाना होगा कि क्या अलग-अलग मामलों में चुनिंदा तरीके से कार्रवाई की जा रही है।

नीदरलैंड ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (आईसीसी) को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध किया। प्रधानमंत्री रॉब जेटन ने कहा कि इस अदालत की नींव न्यूरेमबर्ग और टोक्यो मुकदमों की विरासत पर रखी गई थी। उन्होंने मध्यम शक्ति वाले देशों से अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की व्यवस्था को बचाने में मदद करने की अपील की।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि इजरायलियों के खिलाफ होने वाले हमलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जबकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया पर इजरायली सेटलर्स की कथित हिंसा को बहुत ज्यादा जगह मिलती है। उन्होंने इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को 7 अक्टूबर को हमास के हमले और ईरान से पैदा हुए खतरों का जवाब बताया।

वहीं, फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने वीजा नहीं मिलने के बाद रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के जरिए संबोधन किया।उन्होंने कहा कि मौजूदा संघर्ष फिलिस्तीनी लोगों के अस्तित्व और टू-स्टेट सॉल्यूशन की संभावना, दोनों के लिए खतरा बन गया है।

स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गाई पार्मेलिन ने सरकारों से अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि बातचीत करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि विरोधी पक्ष एक जैसे हो जाएं या हर मुद्दे पर सहमत हों। लेकिन आपसी संपर्क बातचीत की मेज पर वापस लौटने का रास्ता जरूर खोल सकता है।

भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र चार्टर, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और देशों की संप्रभुता के सम्मान का समर्थन करता रहा है। भारत का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को ज्यादा सही प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। भारत के मुताबिक, अगर बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था को ग्लोबल साउथ का भरोसा बनाए रखना है, तो अंतरराष्ट्रीय नियमों को सभी देशों पर एक समान और लगातार तरीके से लागू किया जाना जरूरी है।


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