जर्मनी में चरमपंथी दलों के उभार से लोगों में डर का माहौल

धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी पार्टियां जर्मनी में लगातार चुनावी सफलता हासिल कर रही हैं.;

Update: 2026-09-25 11:12 GMT

धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी पार्टियां जर्मनी में लगातार चुनावी सफलता हासिल कर रही हैं. इसके चलते मध्यमार्गी नेता पीछे छूटते जा रहे हैं और कई जर्मन नागरिक चिंतित हैं. आखिर राजनीतिक ध्रुवीकरण क्यों बढ़ रहा है?

6 सितंबर को जर्मनी के पूर्वी राज्य सैक्सनी-अनहाल्ट में राज्य की संसद के लिए चुनाव हुए. चुनाव में सबसे बड़ी जीत धुर दक्षिणपंथी ‘एएफडी' (अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) पार्टी की हुई. उसे 43.8 फीसदी वोट मिले, जो अब तक का उसका सबसे बड़ा वोट प्रतिशत है. हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि राज्य में किस पार्टी या गठबंधन की सरकार बनेगी, क्योंकि एएफडी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है. इसके बावजूद, एएफडी के लिए यह एक जबरदस्त जीत है. जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसी ने एएफडी की सैक्सनी-अनहाल्ट शाखा को दक्षिणपंथी चरमपंथी के रूप में वर्गीकृत किया है और यह बात कई जर्मनों को चिंतित करती है.

चुनाव के अगले दिन कंजर्वेटिव सीडीयू पार्टी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कहा कि वे चुनाव नतीजों से "बहुत हैरान” हैं. बतौर मैर्त्स, "कल न सिर्फ सैक्सनी-अनहाल्ट में कुछ बदला, बल्कि पूरे जर्मनी में बदलाव आया है.” सैक्सनी-अनहाल्ट में पिछले राज्य चुनावों की तुलना में मैर्त्स की पार्टी सीडीयू को मिले वोटों का हिस्सा आधे से भी कम हो गया. सीडीयू को 2021 में 37.1 फीसदी वोट मिले थे, जो 2026 में घटकर 17.2 फीसदी रह गया.

दो हफ्ते बाद, 20 सितंबर को मेक्लेनबुर्ग-वेस्टर्न पोमेरेनिया राज्य में हुए चुनावों में, सीडीयू संसद में पहुंचने के लिए जरूरी 5 फीसदी वोट भी हासिल नहीं कर पाई. सीडीयू के साथ ऐसा पहली बार हुआ. उसे इस उत्तर-पूर्वी राज्य पोमेरेनिया में सिर्फ 4.9 फीसदी वोट मिले. एएफडी एक बार फिर 38.2 फीसदी वोटों के साथ सबसे मजबूत पार्टी बनकर उभरी. उसी दिन, बर्लिन में हुए राज्य चुनावों में सोशलिस्ट ‘लेफ्ट पार्टी' ने चुनाव जीता और संभावना है कि वह जर्मनी की राजधानी में सरकार चलाएगी. बर्लिन में सीडीयू दूसरी सबसे मजबूत पार्टी रही और एएफडी तीसरे स्थान पर रही.

धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी पार्टियों के उभार से चिंतित हैं जर्मन

इन राज्यों में चुनाव के नतीजों से पता चलता है कि जर्मनी में राजनीतिक विचारधारा के दोनों छोर पर मौजूद पार्टियां मजबूत हो रही हैं. जर्मनी का अतीत भी धुर-दक्षिणपंथी और धुर-वामपंथी सरकारों का गवाह रहा है. इनमें नाजी शासन शामिल है, जिसने जर्मनी को द्वितीय विश्व युद्ध में झोंक दिया था. वहीं, सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी (एसईडी) ने 1949 से 1989 तक तत्कालीन पूर्वी जर्मनी पर शासन किया था. कुछ लोगों के लिए राजनीति में इस तरह के चरम रुख की वापसी चिंता और डर का कारण है.

जर्मनी में जजों ने की न्याय व्यवस्था को सशक्त बनाने की मांग

"दुनिया को किस बात की चिंता है?” नामक एक नियमित मासिक सर्वे में पोलिंग संस्था ‘इप्सोस' ने पाया कि करीब पांच में से एक जर्मन नागरिक (18 फीसदी) देश में बढ़ते चरमपंथ को लेकर चिंतित है. मार्च और अप्रैल 2026 में 16 से 74 वर्ष की उम्र के करीब 1,000 लोगों से पूछे गए सवालों के आधार पर यह नतीजा सामने आया.

आम तौर पर, जर्मनी के लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनका देश किस दिशा में जा रहा है. इप्सोस के सर्वे में, 82 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें लगता है कि जर्मनी गलत दिशा में आगे बढ़ रहा है.

किसी देश का मिजाज कैसे जानें

लोगों से उनके डर या चिंताओं के बारे में पूछना देश का मिजाज जानने का बस एक तरीका है. हालांकि, यह पता लगाने के कई तरीके हैं कि लोगों के मन में राजनीति को लेकर किस तरह की भावनाएं हैं.

केर्स्टिन पाल, बर्लिन स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट में शोधकर्ता हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि इसके लिए क्वांटिटेटिव (संख्या-आधारित) और क्वालिटेटिव (गुण-आधारित) सर्वे किए जा सकते हैं. इसके अलावा, ऑनलाइन बातचीत और सोशल मीडिया पर लोगों की ओर से शेयर किए गए कॉन्टेंट का भी विश्लेषण किया जा सकता है. किसी देश के लोगों की भावनाओं का अंदाजा वास्तविक जीवन में होने वाले भावनाओं के प्रदर्शन से भी लगाया जा सकता है, जैसे सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन.

पाल जैसे शोधकर्ताओं के लिए यह समझना भी दिलचस्प है कि राजनीतिक मुद्दे अपने असली मतलब से आगे बढ़कर बड़े मुद्दों और भावनाओं के प्रतीक कैसे बन जाते हैं. पाल ने कहा, "लोग अपने क्षेत्र की खराब होती बुनियादी सुविधाओं को सिर्फ निवेश की कमी के सबूत के तौर पर नहीं देखते, बल्कि इसे इस संकेत के रूप में भी देखते हैं कि उनके नेताओं ने उन्हें भुला दिया है.”

भावनाओं पर आधारित ध्रुवीकरण: राजनीतिक विरोधी दुश्मन बन जाते हैं

चरमपंथी पार्टियों के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हमें सतह पर दिखाई देने वाला बदलाव है. इसके पीछे समाज में दो तरह का ध्रुवीकरण काम करता है: भावनात्मक ध्रुवीकरण और वैचारिक ध्रुवीकरण.

पश्चिमी जर्मनी की ट्रियर यूनिवर्सिटी के सोशल साइकोलॉजी विभाग की प्रमुख ईवा वाल्थर ने डीडब्ल्यू को बताया, "भावनात्मक ध्रुवीकरण का मतलब राजनीतिक विरोधी के प्रति बढ़ती नफरत है. ज्यादातर अध्ययनों में अमेरिका में डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों के बीच इसे समझने की कोशिश की गई है. जब यह स्थिति राजनीतिक दलों के स्तर पर पैदा होती है, तो समस्या बन जाती है.”

अलग-अलग पार्टियों के नेताओं को अक्सर साथ मिलकर काम करना पड़ता है और समझौते करने पड़ते हैं. वाल्थर ने कहा कि जरूरी नहीं कि वे एक-दूसरे को पसंद करें, लेकिन उन्हें एक-दूसरे के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए. उन्होंने आगे कहा, "जब सम्मान का यह रवैया कमजोर पड़ने लगता है, तो यह लोकतंत्र के लिए एक समस्या बन जाता है.”

वैचारिक ध्रुवीकरण: किस समस्या को हल करना सबसे जरूरी है?

दूसरी स्थिति वैचारिक ध्रुवीकरण की है. इसमें समाज अलग-अलग समूहों में बंट जाता है. यह बंटवारा इस बात पर होता है कि लोग किन मुद्दों को अपने लिए सबसे बड़ी समस्या मानते हैं. उदाहरण के लिए, जर्मनी में राजनीतिक रूप से सेंटर (मध्य) से दक्षिणपंथ की ओर झुकाव रखने वाले कई लोग प्रवासन को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं. वहीं, वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले कई लोगों के लिए जलवायु संकट सबसे बड़ी समस्या है.

जब प्रवासन और जलवायु परिवर्तन जैसे अलग-अलग संकट वाली स्थितियां एक ही समय पर सामने आती हैं, तो शोधकर्ता इसे "पॉलीक्राइसिस” यानी कई संकटों की एक साथ मौजूदगी कहते हैं. पॉलीक्राइसिस वैचारिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा देता है. नतीजतन, समाज के लिए आगे बढ़ने का कोई साझा रास्ता तय करना और मुश्किल हो जाता है. वाल्थर ने कहा, "इस समय जलवायु संकट के साथ सस्ती और किफायती ऊर्जा का संकट भी सामने है, जो मुख्य रूप से एक आर्थिक समस्या है.”

जिन लोगों के लिए जलवायु संकट सबसे जरूरी मुद्दा है, उनके हिसाब से जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल जल्द से जल्द बंद कर देना चाहिए. वहीं, जो लोग सस्ती ऊर्जा को लेकर ज्यादा चिंतित हैं, उनके हिसाब से सिर्फ अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर रहने से कीमतें बेवजह बढ़ जाएंगी.

लोग चाहते हैं कि नेता उनकी समस्याओं को गंभीरता से लें

लोगों का यह विश्वास कि कोई राजनेता बड़ी चुनौतियों से निपटने में सक्षम है और उन्हें हल करने के लिए कदम उठाने को तैयार है, लोकतंत्र पर उनके भरोसे को तय करने वाला एक बड़ा कारक है. लेकिन यही वजह है कि एक साथ कई संकटों से निपटना इतना मुश्किल होता है. राजनेता किसी भी समस्या को पहले हल करने की कोशिश करें, आबादी के एक हिस्से को निराशा जरूर होगी. वाल्थर ने कहा, "कई संकटों (पॉलीक्राइसिस) के कारण नेताओं के लिए कदम उठाना मुश्किल हो जाता है. इसका मतलब है कि लोगों का यह भरोसा कम हो जाता है कि नेता उनके हिसाब से जरूरी समस्याओं को हल कर सकते हैं.”

वाल्थर ने आगे कहा कि दक्षिणपंथी चरमपंथी पार्टियों का मकसद "जटिल समस्याओं के सरल जवाब देकर लोगों को संतुष्ट करना” होता है. इससे लोगों में यह धारणा बन सकती है कि चरमपंथी नेता उनकी समस्याएं हल कर सकते हैं. यही धारणा आगे चलकर बढ़ते राजनीतिक ध्रुवीकरण का कारण बनती है. वाल्थर के मुताबिक, लोकतांत्रिक दलों के नेता इस चुनौती से निपटने के तरीके क्लिनिकल रिसर्च से सीख सकते हैं. उन्होंने कहा, "जब कोई व्यक्ति दर्द में होता है और डॉक्टर के पास जाता है, तो यह काफी मायने रखता है कि डॉक्टर मरीज के दर्द को समझे.”

भले ही डॉक्टर तुरंत समस्या का समाधान न कर सके और दर्द को दूर न कर पाए, लेकिन यह दिखाना बेहद जरूरी है कि वह मरीज की समस्या और उसकी तकलीफ को गंभीरता से ले रहा है. यही बात राजनेताओं पर भी लागू होती है. वाल्थर ने कहा, "राजनेताओं को अपने रोजमर्रा के काम में लोगों की जरूरतों को सबसे पहली प्राथमिकता देनी चाहिए. लोग चाहते हैं कि उनकी बात सुनी और समझी जाए. इसलिए, राजनेताओं के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वे लोगों की समस्याओं को देख और समझ रहे हैं.”

चाहे डॉक्टर मरीज की उम्मीदों पर खरा न उतरे या राजनेता अपने मतदाताओं की उम्मीदों पर, दोनों ही मामलों में मरीज और मतदाता अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर सकते हैं. यह एक ऐसा संकेत है, जिसे हम सभी समझ सकते हैं.

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