साइबेरिया के रूसी संस्थान में प्लेग से मौत के मामले पर सस्पेंस बरकरार; जानिए अब तक क्या पता चला है

माना जा रहा है कि साइबेरिया के एक रूसी संस्थान में 2 अक्टूबर, 2026 को एक शोध कर्मचारी की मौत न्यूमोनिक प्लेग से हुई थी.;

Update: 2026-10-09 10:30 GMT

साइबेरिया में प्लेग पर शोध करने वाले एक रूसी संस्थान में 2 अक्टूबर, 2026 को एक कर्मचारी की मौत के बाद, उसके संपर्क में आए लोगों की जांच हुई. माना जा रहा है कि इस कर्मचारी की मौत न्यूमोनिक प्लेग की वजह से हुई थी.

शुरुआती रिपोर्टों में जब यह अंदेशा जताया गया था कि एक लैब वर्कर की न्यूमोनिक प्लेग (फेफड़ों वाले प्लेग) की वजह से दुर्घटनावश मौत हो गई है, तो यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (ईसीडीसी) ने कहा कि वह भी अब "इस पूरी स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए है.”

हालांकि, 6 अक्टूबर 2026 को जारी एक बयान में ईसीडीसी ने साफ किया कि "अभी तक मिली सीमित जानकारी के हिसाब से, दूसरे लोगों में संक्रमण (सेकेंडरी केस) का कोई मामला सामने नहीं आया है. साथ ही, इंसानों से इंसानों में बीमारी फैलने का भी कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है जिससे यह बीमारी और आगे फैल सके.”

प्लेग क्या है और कैसे फैलता है?

प्लेग तीन तरह का होता है और ये तीनों ही ‘येर्सिनिया पेस्टिस' नाम के बैक्टीरिया से फैलते हैं. इनके नाम हैं: ब्यूबोनिक, सेप्टिसेमिक और न्यूमोनिक प्लेग. इनमें से ब्यूबोनिक प्लेग सबसे ज्यादा देखने को मिलता है और यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता है. हालांकि, अगर इसका वक्त पर इलाज न हो, तो यह बैक्टीरिया पूरे शरीर और खून की नलियों में फैल जाता है और सेप्टिसेमिक प्लेग हो सकता है. इससे शरीर के अंदर ब्लीडिंग होने लगती है और अंग काम करना बंद कर देते हैं.

अगर यह बैक्टीरिया फेफड़ों तक पहुंच जाए, तो न्यूमोनिक प्लेग हो जाता है. न्यूमोनिक प्लेग बहुत तेजी से फैलता है, क्योंकि यह हवा के जरिए, जैसे कि खांसने से, एक इंसान से दूसरे इंसान में आसानी से फैल सकता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो ब्यूबोनिक प्लेग से 30 से 60 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है. वहीं, सेप्टिसेमिक और न्यूमोनिक प्लेग तो बिना इलाज के सीधे जानलेवा साबित होते हैं.

रूस की प्लेग लैब में हुई मौत को लेकर अटकलें

रूस की एक लैब में काम करने वाली महिला की मौत के बाद, न्यूमोनिक प्लेग (फेफड़ों का एक बहुत तेजी से फैलने वाला बैक्टीरियल इन्फेक्शन) के फैलने की अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि, रूस का कहना है कि इससे आम लोगों को कोई बड़ा खतरा नहीं है.

रूसी अधिकारियों का कहना है कि उस लैब कर्मचारी की मौत प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया (पैथोजन) से नहीं हुई थी. रूसी समाचार एजेंसी ‘इंटरफैक्स' ने वहां की बीमारी नियंत्रण एजेंसी ‘रोस्पोट्रेबनादजोर' के हवाले से बताया कि उस 28 साल की महिला की जान ‘अज्ञात कारणों से हुए निमोनिया' की वजह से गई थी. एजेंसी ने यह भी कहा कि महिला से लिए गए सैंपल में ऐसा कोई माइक्रोऑर्गेनिज्म (सूक्ष्मजीव) नहीं मिला है, "जिसका उसके लैब के काम से कोई लेना-देना हो.” यह बात पहले मिली खबरों से बिल्कुल अलग है.

प्लेग ने 5,500 साल पहले भी मनुष्यों को मारा था

स्थानीय मीडिया ने पहले खबर दी थी कि प्लेग से लड़ने के लिए बने एक संस्थान में काम करने वाली उस महिला के हाथ से एक टेस्ट ट्यूब गिर गई थी. खबरों के मुताबिक, उसकी मौत शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 को साइबेरिया में इरकुत्स्क के पास स्थित शहर शेलेखोव के जिला अस्पताल में हुई.

रूस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अधिकारियों ने दो अस्पतालों और बच्चों के एक क्लिनिक को क्वारंटीन कर दिया था. स्थानीय खबरों में कहा गया कि संस्थान के कर्मचारियों को उनके काम की जगह पर ही क्वारंटीन किया जा रहा था. अमेरिकी समाचार साइट ‘एक्सियोस' ने खबर दी है कि महिला के संपर्क में आए लगभग 200 लोगों को निगरानी में रखा गया था. इसके बाद संक्रमण का कोई और मामला सामने नहीं आया.

इसके बावजूद, रूस जिस तरह से जानकारी साझा करता है उस पर लोगों को अब भी भरोसा नहीं हो रहा. डीडब्ल्यू के रूसी भाषा वाले एक सोशल मीडिया चैनल पर एक यूजर ने कमेंट किया, "अगर यह अब एक बड़ी मुसीबत बन जाए, तो मुझे हैरानी नहीं होगी, चाहे वह बीमारी के फैलने की बात हो या क्वारंटीन से जुड़े उपायों की.”

न्यूमोनिक प्लेग: फेफड़ों का तेजी से फैलने वाला संक्रमण

न्यूमोनिक प्लेग बहुत तेजी से फैलने वाली बीमारी है. न्यूमोनिक प्लेग, प्लेग का ही एक रूप है जो फेफड़ों को संक्रमित करता है. बीमारी के हर रूप की तरह, यह भी ‘येर्सिनिया पेस्टिस' नाम के बैक्टीरिया से होता है. यह बैक्टीरिया आमतौर पर छोटे स्तनधारियों (जैसे, चूहे-गिलहरी जैसे जीव) और उन पर पलने वाले पिस्सुओं में पाया जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन न्यूमोनिक को प्लेग का सबसे खतरनाक रूप बताता है. इसका इनक्यूबेशन पीरियड (संक्रमण से लक्षण दिखने तक का समय) मात्र 24 घंटे जितना कम भी हो सकता है. प्लेग का सिर्फ यही एक ऐसा रूप है जो मरीज के खांसने पर निकलने वाले सांस के कणों के जरिए एक इंसान से दूसरे इंसान में बहुत आसानी से फैल सकता है. डब्ल्यूएचओ की मानें तो इसी वजह से यह गंभीर महामारी का कारण बन सकता है.

इसके लक्षण बहुत जल्दी दिखाई देते हैं, जिनमें शुरुआत में तेज बुखार, सिरदर्द और शरीर में भारी कमजोरी शामिल है. इसके तुरंत बाद निमोनिया का गंभीर असर शुरू हो जाता है, जिससे सांस लेने में कठिनाई, सीने में तेज दर्द और खांसी के साथ खून आने जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो जाती है.

कोई भी इंसान न्यूमोनिक प्लेग से दो तरीकों से संक्रमित हो सकता है. या तो वह सीधे हवा के जरिए इस बैक्टीरिया को सांस में ले ले या फिर अगर ब्यूबोनिक या सेप्टिसेमिक प्लेग का सही समय पर इलाज न हो और इन्फेक्शन बढ़कर फेफड़ों तक पहुंच जाए.

ब्यूबोनिक और न्यूमोनिक प्लेग में क्या अंतर है?

न्यूमोनिक प्लेग कोई अलग बीमारी नहीं है. यह प्लेग के तीन रूपों में से एक है: ब्यूबोनिक, सेप्टिसेमिक और न्यूमोनिक. ये सभी एक ही बैक्टीरिया से होते हैं. इनमें अंतर इस बात से होता है कि संक्रमण शरीर में कहां फैलता है और इसी से तय होता है कि बीमारी कैसे फैलेगी और कितनी खतरनाक होगी.

ब्यूबोनिक प्लेग इसका सबसे सामान्य रूप है और जब भी लोग ‘प्लेग' नाम सुनते हैं, तो आमतौर पर इसी के बारे में सोचते हैं. यह अक्सर किसी पिस्सू के काटने से फैलता है. काटने के बाद बैक्टीरिया शरीर की सबसे पास वाली लिम्फ नोड में चले जाते हैं. यहां एक दर्दनाक सूजन या गांठ बन जाती है, जिसे ‘ब्यूबो' कहते हैं. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, यह एक इंसान से दूसरे इंसान में बहुत ही कम या दुर्लभ मामलों में फैलता है.

अगर ब्यूबोनिक प्लेग का सही समय पर इलाज न हो, तो इसके बैक्टीरिया शरीर में आगे फैलने लगते हैं. अगर वे खून में पहुंच जाएं, तो यह बीमारी ‘सेप्टिसेमिक प्लेग' का रूप ले लेती है. इससे त्वचा के नीचे ब्लीडिंग होने लगती है, हाथों और पैरों की उंगलियां गलने (टिश्यू डेथ) लगती हैं और अंग काम करना बंद कर देते हैं.

अगर ये बैक्टीरिया फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं, तो यह ‘न्यूमोनिक प्लेग' बन जाता है, जो हवा के जरिए एक इंसान से दूसरे इंसान में फैल सकता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि सेप्टिसेमिक और न्यूमोनिक प्लेग, दोनों ही बिना ब्यूबों (गांठ) बने भी सीधे हो सकते हैं. इलाज न होने पर, ब्यूबोनिक प्लेग से 30 से 60 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है. सेप्टिसेमिक और न्यूमोनिक रूप बिना इलाज के हमेशा जानलेवा होते हैं.

न्यूमोनिक प्लेग का इलाज: शुरुआती 24 घंटों के अंदर एंटीबायोटिक्स

न्यूमोनिक प्लेग का इलाज संभव है, लेकिन तभी जब इलाज जल्दी शुरू हो जाए. डब्ल्यूएचओ का कहना है कि बिना इलाज के, लक्षण दिखने के 18 से 24 घंटों के अंदर ही मरीज की मौत हो सकती है. सामान्य एंटीबायोटिक्स से इस संक्रमण का इलाज किया जा सकता है. अगर बीमार पड़ने के लगभग एक दिन के अंदर मरीज का इलाज शुरू हो जाए, तो ठीक होने की संभावना ज्यादा होती है.

नतीजा इस बात पर निर्भर करता है कि इलाज कितना जल्दी शुरू होता है. यूएस सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक, डॉक्टरों को सलाह दी जाती है कि वे लैब से पुष्टि का इंतजार न करें और प्लेग का शक होते ही एंटीबायोटिक्स देना शुरू कर दें.

खुल गया 675 साल पहले बरसी काली मौत का राज

ये दवाएं कोई दुर्लभ या खास तरह की नहीं होतीं. ये सामान्य और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक्स हैं. मरीजों को आमतौर पर दो हफ्ते तक इनका कोर्स लेना पड़ता है. डब्ल्यूएचओ का कहना है कि संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए मरीजों को आइसोलेशन में रखा जाता है और मास्क पहनने से उनके आस-पास के लोगों का बचाव होता है.

नजदीकी संपर्क में आने वालों के लिए जरूरी है एंटीबायोटिक्स और आइसोलेशन

मरीज के संपर्क में आने वाले लोगों का भी इलाज किया जाता है, भले ही उनमें कोई लक्षण न हों. डब्ल्यूएचओ और सीडीसी, दोनों ही न्यूमोनिक प्लेग से पीड़ित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों के लिए सात दिन तक बचाव वाली एंटीबायोटिक्स लेने की सलाह देते हैं.

डब्ल्यूएचओ आम जनता के लिए प्लेग वैक्सीन की सलाह नहीं देता है. यह वैक्सीन सिर्फ ज्यादा जोखिम वाले समूहों के लिए है, जैसे कि लैब में काम करने वाले कर्मचारी जो इस बैक्टीरिया पर काम करते हैं और स्वास्थ्य कर्मचारी.

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