म्यांमार: क्या यूरोपीय संघ की कूटनीतिक घेराबंदी को कमजोर कर रहा है अमेरिका?
यूरोपीय संघ पर सवाल उठ रहे हैं कि वह अब भी म्यांमार के सैन्य शासन से दूरी क्यों बनाए हुए है.;
अमेरिका ने म्यांमार की सेना के समर्थन वाली सरकार से फिर बातचीत शुरू कर दी है. ऐसे में यूरोपीय संघ पर सवाल उठ रहे हैं कि वह अब भी म्यांमार के सैन्य शासन से दूरी क्यों बनाए हुए है.
अमेरिकी सरकार ने म्यांमार की सेना समर्थित सरकार के साथ चुपचाप रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी है. सितंबर से अब तक, विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि माइकल वेंस की अगुवाई में दो दौर की बातचीत हो चुकी है. खबरों के मुताबिक, अमेरिकी राजनयिकों ने इस महीने की शुरुआत में पहले म्यांमार की राजधानी नेपीदाव और फिर टोक्यो में म्यांमार के अधिकारियों से मुलाकात की.
अमेरिका ऑनलाइन ठगी के केंद्रों पर लगाम लगाना चाहता है, जेल में बंद अमेरिकी कारोबारी एडम कैस्टिलो की रिहाई सुनिश्चित करना चाहता है और म्यांमार के दुर्लभ खनिज (रेअर अर्थ) संसाधनों तक पहुंच हासिल करने की संभावना भी तलाश रहा है. इन कीमती खनिजों के बाजार पर फिलहाल अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी चीन का दबदबा है.
इस बीच, दक्षिण-पूर्व एशिया की सरकारें भी म्यांमार के सैन्य नेतृत्व को अलग-थलग रखने की अपनी नीति पर सवाल उठाने लगी हैं. कई देशों ने पहले ही म्यांमार के साथ सीधे राजनयिक संपर्क फिर से बहाल कर लिए हैं.
हालांकि, यूरोपीय संघ (ईयू) अब भी युद्ध से तबाह म्यांमार की सेना समर्थित सरकार को वैध नहीं मानता है. 2025-26 में हुए चुनाव के बाद भी ईयू के रुख में कोई बदलाव नहीं आया. इस चुनाव के बाद सेना प्रमुख मिन आंग ह्लाइंग राष्ट्रपति बने. देश की राजनीतिक व्यवस्था पर अब भी सेना का नियंत्रण है.
अभी भी लागू हैं ईयू के प्रतिबंध
फरवरी 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद यूरोपीय संघ ने म्यांमार सरकार को सीधे दी जाने वाली वित्तीय सहायता रोक दी. साथ ही, उसने कुछ चुनिंदा लोगों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए. इसके अलावा, सैन्य अधिकारियों के साथ राजनयिक संबंधों को काफी कम कर दिया.
म्यांमार की सेना से जुड़े 105 लोगों और 22 संस्थाओं पर फिलहाल यूरोपीय संघ के प्रतिबंध लागू हैं. अप्रैल में ईयू ने इन प्रतिबंधों को अगले 12 महीनों के लिए बढ़ा दिया. हालांकि, ईयू विस्थापित लोगों और रोहिंग्या शरणार्थियों को मानवीय सहायता दे रहा है. इसके साथ ही, वह नागरिक समाज के संगठनों की मदद भी कर रहा है.
यूरोपीय संघ ने म्यांमार को मिलने वाली व्यापारिक छूट को खत्म नहीं किया है. उसे चिंता थी कि ऐसा करने से वहां के कामगारों पर बुरा असर पड़ सकता है. इनमें खास तौर पर कपड़ा उद्योग में काम करने वाली ज्यादातर युवा महिलाएं शामिल हैं. पिछले साल यूरोपीय संघ और म्यांमार के बीच वस्तुओं का व्यापार करीब 4 अरब यूरो (4.46 अरब डॉलर) का रहा, जो 2019 में 3.4 अरब यूरो था.
ईयू ने आसियान के शांति समझौते का समर्थन किया
2021 के तख्तापलट के बाद, म्यांमार में शुरू हुए गृहयुद्ध में अब तक लगभग 1,00,000 लोग मारे जा चुके हैं. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, विद्रोही समूहों का अभी भी म्यांमार के बड़े हिस्सों पर नियंत्रण है या वहां संघर्ष चल रहा है. 40 लाख से ज्यादा लोग अपने ही देश में विस्थापित हो गए हैं.
ईयू के एक प्रवक्ता ने डीडब्ल्यू को बताया कि ईयू "जारी हिंसा और अपनी ही आबादी पर हो रहे हमलों” को देखते हुए, "मौजूदा सैन्य शासन को मान्यता न देने की अपनी नीति पर कायम है.”
इसी बीच, यूरोपीय संघ "अमेरिका, जापान, आसियान देशों और अन्य प्रमुख पक्षों की म्यांमार के सैन्य शासन के प्रतिनिधियों के साथ जारी बातचीत और उनके रुख पर करीब से नजर रख रहा है.”
प्रवक्ता ने आगे कहा, "यूरोपीय संघ आसियान के प्रयासों का भी समर्थन करता है. इनमें खास तौर पर पांच सूत्रीय सहमति शामिल है, जिसे अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका है.” यह सहमति दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) ने 2021 में शांति स्थापित करने के लिए प्रस्तावित की थी.
म्यांमार के राजनयिकों ने यूरोपीय साझेदारों से संपर्क किया
तख्तापलट के बाद, जब म्यांमार की सैन्य सरकार (जुंटा) क्षेत्रीय शांति योजना को लागू करने में विफल रही, तो आसियान ने एक अभूतपूर्व फैसला लिया. उसने म्यांमार के सैन्य नेताओं को अपनी उच्च-स्तरीय बैठकों से बाहर रखने का निर्णय लिया.
हालांकि, आसियान के रुख में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. कुछ सदस्य देश, खासकर म्यांमार के पड़ोसी थाईलैंड, इस बात पर नाराजगी जता रहे हैं कि म्यांमार में गृहयुद्ध खत्म करने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हो रही है.
पिछले हफ्ते, थाईलैंड के विदेश मंत्री सिहासक फुआंगकेतकेव ने अमेरिका के दोबारा बातचीत शुरू करने के कदम का स्वागत किया. उन्होंने संकेत दिया कि आसियान के सदस्य अगले महीने मनीला में होने वाले शिखर सम्मेलन में म्यांमार के भविष्य पर गंभीर चर्चा करेंगे.
म्यांमार के अधिकारी भी राजनयिक अलगाव से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं. सितंबर में म्यांमार के नेता ने ‘टाइम' पत्रिका को एक इंटरव्यू दिया. तख्तापलट के बाद किसी बड़े पश्चिमी मीडिया संस्थान को दिया गया यह उनका पहला इंटरव्यू था. इसे पश्चिमी देशों की सरकारों के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
लंदन स्थित मानवाधिकार संगठन ‘बर्मा कैंपेन यूके' ने 22 अक्टूबर को ब्रिटिश सरकार पर अपने रुख में "बड़ा बदलाव” करने का आरोप लगाया. संगठन ने यह आरोप तब लगाया, जब कुछ दिन पहले एक आसियान राजनयिक कार्यक्रम में ब्रिटिश विदेश कार्यालय ने लंदन में म्यांमार के सैन्य-नियंत्रित दूतावास के ‘चार्ज डी अफेयर्स' (राजनयिक प्रतिनिधि) विन जेयार तुन की मेजबानी की.
इस महीने ‘इंटेलिजेंस ऑनलाइन' में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, ब्रसेल्स में म्यांमार के ‘चार्ज डी अफेयर्स' खिन थिदार अय ने भी यूरोपीय राजनेताओं से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की है. इनमें चेक गणराज्य के एमईपी (यूरोपीय संसद के सदस्य) ओंद्रेज डोस्ताल भी शामिल हैं, जो दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए यूरोपीय संसद के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य हैं.
ईयू की अलग-थलग करने की नीति से ‘बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ'
चेक गणराज्य की पलाकी यूनिवर्सिटी ओलोमौत्स की क्रिस्टीना किरोंस्का म्यांमार को लेकर यूरोपीय संघ की नीति की विशेषज्ञ हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि ईयू के पास अमेरिका की तरह म्यांमार के सैन्य शासन से दोबारा संपर्क बढ़ाने की खास वजह नहीं है. उन्होंने कहा कि अमेरिका की इस रणनीति के पीछे "कुछ खास हित” हो सकते हैं, जैसे कि रेअर अर्थ (दुर्लभ खनिजों) की माइनिंग और साइबर अपराध से जुड़े मुद्दे.
हालांकि, रेअर अर्थ के खनन का सबसे अहम काम अब सेना के नियंत्रण में नहीं है. काचिन राज्य में ‘काचिन इंडिपेंडेंस ऑर्गनाइजेशन' जैसे विद्रोही संगठन इन पर नियंत्रण रखते हैं. उन्होंने कहा, "यह देखना बाकी है कि सैन्य शासन के साथ बातचीत करके अमेरिका क्या हासिल कर पाता है.”
किरोंस्का ने आगे कहा, "यूरोपीय संघ लंबे समय से म्यांमार में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले पक्ष के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है. ऐसे में सिर्फ इसलिए अपनी नीति छोड़ देना कि अमेरिका एक नई और शायद लेन-देन पर आधारित नीति अपना रहा है, यूरोपीय संघ की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा.”
वह कहती हैं, "साथ ही, अलग-थलग रखने की नीति से भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि यूरोपीय संघ को बातचीत करनी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि उसे किसके साथ और किन शर्तों पर बातचीत करनी चाहिए.”
म्यांमार के विद्रोहियों और सैन्य शासकों के बीच संतुलन बनाना
यूरोपीय संघ को अब अपने प्रभाव पर पड़ने वाले खतरे के बारे में भी सोचना पड़ रहा है. अगर अमेरिका, आसियान देशों की सरकारें और क्षेत्र की अन्य बड़ी ताकतें म्यांमार के अधिकारियों से संपर्क बढ़ाती हैं, तो म्यांमार के राजनीतिक भविष्य को लेकर होने वाली चर्चाओं में यूरोपीय संघ की भूमिका काफी कम हो सकती है.
वहीं, सेना के साथ जुड़ाव बढ़ाने से म्यांमार के लोकतांत्रिक विपक्ष और जातीय विद्रोही समूहों के साथ ईयू के संबंध खराब हो सकते हैं. इनमें से कई समूहों का म्यांमार के बड़े इलाकों पर नियंत्रण है.
गैर-सरकारी संगठन ‘बर्मा सेंटर प्राग' के निदेशक साबे सोए कहते हैं, "ईयू के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वह लोकतांत्रिक बदलाव के एक विश्वसनीय समर्थक के रूप में अपनी पहचान बनाए रख सकता है और साथ ही यह भी सुनिश्चित कर सकता है कि म्यांमार के भविष्य को तय करने वाली बातचीत में उसकी भी एक अहम भूमिका बनी रहे.”
ईयू के पास एक विकल्प यह है कि वह सैन्य नेताओं और उनके कारोबारों पर प्रतिबंध बरकरार रखते हुए आसियान, संयुक्त राष्ट्र और क्षेत्रीय साझेदारों के माध्यम से कूटनीतिक प्रयास तेज करे. साथ ही, वह प्रतिबंधों में किसी भी ढील को मानवीय सहायता तक पहुंच, राजनीतिक स्वतंत्रता में सुधार और शांति प्रक्रिया में प्रगति जैसी शर्तों से जोड़ सकता है.
सोए ने यह भी सुझाव दिया कि यूरोपीय संघ क्रांतिकारी और जातीय विद्रोही समूहों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग बढ़ा सकता है. इस तरह ईयू के पास नेपीदाव में मौजूद सैन्य अधिकारियों के साथ संबंधों पर निर्भर रहने के बजाय एक वैकल्पिक रास्ता होगा. उन्होंने कहा कि इस तरीके से यूरोपीय संघ, म्यांमार की सेना-समर्थित सरकार को मान्यता दिए बिना भी, वहां के भविष्य से जुड़ा रह सकता है.
फिलहाल, ऐसा लगता है कि यूरोपीय संघ अपनी नीति में कोई बड़ा बदलाव करने का इच्छुक नहीं है. लेकिन जैसे-जैसे अन्य सरकारें म्यांमार के सैन्य जनरलों के लिए अपने दरवाजे फिर से खोलेंगी, हालात बदल सकते हैं.