एआई के डर से अब चीन भी अछूता नहीं पर ट्रंप नहीं मान रहे

डॉनल्ड ट्रंप को छोड़ दें तो एआई को लेकर समाज के अलग-अलग तबकों से चिंताएं सामने आ चुकी हैं.;

Update: 2026-09-22 11:43 GMT

अगर डॉनल्ड ट्रंप को छोड़ दें तो एआई को लेकर समाज के अलग-अलग तबकों से चिंताएं सामने आ चुकी हैं. खुद एआई को रफ्तार देने वाली कंपनियों के मालिक भी इसकी गति को धीमा करने की बातें करने लगे हैं.

एआई को लेकर एक दिलचस्प स्थिति बन गई है. आम तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखने वाले लोग अब एक ही बात कर रहे हैं. दक्षिणपंथी स्टीव बैनन और वामपंथी बर्नी सैंडर्स जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एक साथ एआई पर सख्त नियंत्रण की मांग कर रहे हैं. टेक दुनिया में भी कुछ ऐसा ही दिख रहा है. इलॉन मस्क, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो आमोदेई सब कह चुके हैं कि सबसे शक्तिशाली एआई मॉडलों के विकास की रफ्तार कम की जानी चाहिए. उनके मुताबिक तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि सुरक्षा उपाय पीछे छूटते जा रहे हैं.

लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर खतरा इतना गंभीर है, तो फिर कार्रवाई की शुरुआत खुद यही कंपनियां क्यों नहीं करतीं? आखिर सबसे उन्नत एआई मॉडल कुछ गिनी-चुनी कंपनियों के हाथ में हैं. ये चाहें तो नए मॉडल लॉन्च करने की गति धीमी कर सकती हैं, सुरक्षा परीक्षणों को ज्यादा लंबी अवधि तक चला सकती हैं और कुछ रिसर्चों पर अस्थायी रोक भी लगा सकती हैं. फिर भी इनकी बहस का केंद्र बार-बार नए कानून और सरकारी नियमन पर आकर क्यों टिक जाता है?

कोई भी अकेले कदम नहीं उठाना चाहता

इसकी एक वजह प्रतिस्पर्धा है. कोई भी कंपनी अकेले ब्रेक लगाना नहीं चाहती. डर यह है कि अगर उसने रफ्तार कम की तो कोई प्रतिद्वंद्वी आगे निकल जाएगा. यही तर्क अब देशों के स्तर पर भी दिया जा रहा है. अमेरिकी एआई उद्योग और डॉनल्ड ट्रंप दोनों बार-बार चीन की बात उठाते हैं. उनका कहना है कि अगर अमेरिका धीमा हुआ और चीन नहीं, तो तकनीकी बढ़त हाथ से निकल सकती है. हाल ही में एक टीवी इंटरव्यू रोक कर एनवीडिया के सीईओ जेनसन हुआंग के साथ फोन पर की गई बातचीत में भी ट्रंप ने इसी चिंता को दोहराया कि एआई की दौड़ में अमेरिका पीछे नहीं रह सकता.

एआई सुरक्षा की मांग के पीछे सिर्फ सुरक्षा की चिंता ही नहीं, बल्कि भू-राजनीति का पहलू भी है. कुछ आलोचकों का कहना है कि जब तक अमेरिका स्पष्ट बढ़त में था, तब तक विकास की रफ्तार पर ज्यादा सवाल नहीं उठे. लेकिन अब चीन की कंपनियां भी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, तो 'धीमा चलने' की मांग भी तेज हो गई है. हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इस तरह चीन को वास्तव में रोका जा सकेगा.

सिर्फ अमेरिका के रुकने से रुकेगी रफ्तार?

अब एआई में ज्यादातर तरक्की कुछ गिनी-चुनी अमेरिकी कंपनियों तक सीमित नहीं है. चीन अपने मॉडल विकसित कर रहा है. उसने डीपसीक जैसे कारनामों से बीच-बीच में दुनिया को चौंकाया भी है. फिर ओपन-सोर्स एआई भी तेजी से फैल रहा है और कई दूसरे देश भी इस दौड़ में उतर चुके हैं. ऐसे में सिर्फ अमेरिका के धीमा होने या नियम बनाने से पूरी दुनिया की रफ्तार शायद नहीं रुकेगी. यही इस बहस की सबसे बड़ी दुविधा है. सुरक्षा के लिए ब्रेक जरूरी हो सकता है, लेकिन कोई भी देश यह जोखिम नहीं लेना चाहता कि ब्रेक लगाते-लगाते उसका प्रतिद्वंद्वी उससे आगे निकल जाए.

रिसर्चरों की चेतावनी: एआई कंपनियां पूरी मानवता को दांव पर लगा रही हैं

यहीं पूरी बहस का विरोधाभास सामने आता है. एक तरफ एआई उद्योग के शीर्ष पर बैठे उद्योगपति कह रहे हैं कि सबसे शक्तिशाली एआई मॉडल इंसानी नियंत्रण की सीमाओं को चुनौती देने लगे हैं. एजेंट्स के अनपेक्षित व्यवहार, सुरक्षा उल्लंघनों और स्वायत्त फैसलों के उदाहरण लगातार दिए जा रहे हैं. दूसरी तरफ यही उद्योग इस बात से भी डर रहा है कि कहीं नियंत्रण की कोशिश उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कमजोर ना कर दे.

एआई के डर से अछूता नहीं चीन

दिलचस्प बात यह है कि एआई फिलहाल इतना बड़ा हौव्वा बन चुका है कि सुरक्षा की चिंता सिर्फ अमेरिका या पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रही है. चीन ने भी इसे लेकर पहली बार खुलकर चेतावनी दी है. चीनी खुफिया एजेंसी की ओर से एक बयान में कहा गया कि एआई का इस्तेमाल डीपफेक, फर्जी सूचनाओं और तथाकथित 'कॉग्निटिव वॉरफेयर' के लिए किया जा सकता है. कॉग्निटिव वॉरफेयर यानी ऐसी लड़ाई, जिसमें दुश्मन आपकी सेना पर नहीं, बल्कि आपकी जनता की सोच, विश्वास और निर्णय लेने की क्षमता पर हमला करता है. बीजिंग का कहना है कि एआई अब सिर्फ साइबर सुरक्षा का नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक सुरक्षा का भी मुद्दा बन चुका है.

हालांकि चीन का नजरिया अमेरिकी एआई उद्योग से थोड़ा अलग दिखता है. अमेरिका में कई लोग एआई को धीमा करने की बात कर रहे हैं, जबकि चीन अपने एआई विकास की रफ्तार कम करने की बात नहीं कर रहा है. उसकी चिंता ज्यादा इस बात को लेकर है कि यह तकनीक उसके खिलाफ इस्तेमाल ना हो और विदेशी एआई टूल्स के जरिए संवेदनशील जानकारी लीक ना हो. यानी दोनों महाशक्तियां अब एआई सुरक्षा की बात तो कर रही हैं, लेकिन उनकी प्राथमिकताएं अब भी अलग-अलग हैं.

अमेरिकी चुनाव से भी जुड़ा एआई

एआई को लेकर बढ़ती चिंताएं सिर्फ टेक कंपनियों या राजनेताओं तक सीमित नहीं हैं. एंथ्रोपोलॉजिस्ट और दार्शनिक युवल नोआ हरारी ने भी एक महीने पहले एक इंटरव्यू में चेताया था कि एआई अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के सबसे बड़े मुद्दों में होना चाहिए. हरारी की चिंता चीन-अमेरिका की तकनीकी प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एआई की इंसानों जैसी बातचीत करने और खुद को इंसान के रूप में पेश करने की बढ़ती क्षमता को लेकर थी. उनका कहना था कि एआई को इंसानों का प्रतिरूप बनने से रोकने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान होने चाहिए.

तब हरारी का इंटरव्यू ले रहीं द इकोनॉमिस्ट मैग्जीन की चीफ एडिटर ने इस मुद्दे के बड़ा चुनावी मुद्दा बनने की संभावना पर शक जताया था. पर अब करीब एक महीने बाद यह साफ दिखाई दे रहा है कि एआई को लेकर डर अब केवल तकनीकी बहस नहीं रह गया है. एआई मॉडल, डेटा सेंटर, ऊर्जा खपत, चुनावी प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे सवाल धीरे-धीरे कानूनी और राजनीतिक मुद्दों में बदल चुके हैं. और अब एआई से जुड़ी चिंताएं कई दिशाओं से सामने आ रही हैं.

हिचकिचाहट के बीच बहुत देर ना हो जाए

कुल मिलाकर एआई की समस्या तकनीकी से ज्यादा राजनीतिक और आर्थिक है. लगभग सभी पक्ष इस बात पर सहमत दिख रहे हैं कि एआई से होने वाले जोखिम वास्तविक हैं. लेकिन कोई भी पक्ष पहला कदम उठाने को तैयार नहीं दिखता. कंपनियां सरकारों का इंतजार कर रही हैं, सरकारें प्रतिस्पर्धा का हवाला दे रही हैं, और इस बीच एआई पहले से ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है.

शायद इसलिए सवाल अब यह नहीं रह गया कि एआई के खतरे हैं या नहीं. सवाल यह है कि अगर मस्क, ऑल्टमैन, आमोदेई, बैनन और सैंडर्स जैसे एक-दूसरे से असहमत लोग भी जोखिम पर सहमत हैं, तो क्या यह वही क्षण नहीं है जब चेतावनियों से आगे बढ़कर वास्तविक कार्रवाई शुरू की जाए? क्योंकि अगर हर पक्ष खतरे को स्वीकार करता है, लेकिन कोई भी पहले ब्रेक नहीं लगाता, तो फिर सबसे बड़ी बाधा तकनीक नहीं, बल्कि इंसानी और राजनीतिक हिचकिचाहट है.

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