नई दिल्ली: संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत मुल्ला अफरोज की एहतियाती हिरासत को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसकी हिरासत को बरकरार रखा गया था। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में पुलिस हिरासत के दौरान दर्ज किए गए कथित कबूलनामे को लेकर अहम टिप्पणी की गई। अदालत ने माना कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA के तहत एहतियाती हिरासत का वैध आधार नहीं बनाया जा सकता।
कथित कबूलनामे पर टिका था विवाद
मामले की सुनवाई के दौरान मुल्ला अफरोज की ओर से मुख्य दलील यही थी कि उसके खिलाफ कार्रवाई में पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाया गया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से दर्ज कई आपराधिक मामलों की मौजूदगी अपने आप में प्रिवेंटिव डिटेंशन के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दर्ज कथित कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ भविष्य में संभावित खतरे को देखते हुए NSA के तहत हिरासत का आदेश दिया जा सकता है।
यूपी सरकार ने क्या दलील दी?
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका बनती थी कि मुल्ला अफरोज भविष्य में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। सरकार ने इसी आधार पर एहतियाती हिरासत को उचित ठहराने की कोशिश की। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA की हिरासत का वैध आधार मानने से इनकार कर दिया। अदालत के मुताबिक, इस तरह के कथित कबूलनामे के आधार पर एहतियाती हिरासत का आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
क्या है संभल हिंसा का मामला?
यह मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के न्यायिक सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। हिंसा के दौरान चार लोगों की मौत हुई थी। मामले में मुल्ला अफरोज को कथित मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया था। दिए गए विवरण के मुताबिक, घटना के करीब 54 दिन बाद मुल्ला अफरोज को गिरफ्तार किया गया। बाद में उसे इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिल गई। इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत एहतियाती हिरासत का आदेश जारी किया गया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
8 सितंबर को कोर्ट ने उठाया था अहम सवाल
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 8 सितंबर को मामले में अपना आदेश सुरक्षित रखा था। उस समय अदालत ने कथित कस्टडी कबूलनामे की प्रासंगिकता और उसके महत्व पर सवाल उठाए थे। पीठ ने यह जानना चाहा था कि क्या पुलिस हिरासत में दर्ज ऐसा कथित कबूलनामा किसी व्यक्ति को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखने के लिए जरूरी ‘व्यक्तिगत संतुष्टि’ का वैध आधार बन सकता है। अंतिम फैसले में अदालत ने इस पहलू को महत्वपूर्ण माना और इसी आधार पर NSA के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया।
हाई कोर्ट का आदेश भी हुआ निरस्त
सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की हिरासत को बरकरार रखने वाले इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को भी निरस्त कर दिया। इसके साथ ही NSA के तहत जारी हिरासत आदेश का कानूनी आधार भी खत्म हो गया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने का भी निर्देश दिया है। यह फैसला एहतियाती हिरासत के मामलों में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और पुलिस हिरासत में दर्ज कथित कबूलनामे की कानूनी भूमिका से जुड़े सवालों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
फैसले को लॉ क्लर्क को समर्पित किया
फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने लॉ क्लर्क को श्रद्धांजलि दी, जिनका 27वें जन्मदिन से पहले निधन हो गया था। जस्टिस दत्ता ने कहा कि वह इस फैसले को अपने दिवंगत लॉ क्लर्क को समर्पित करते हैं।