ओडिशा में 20.5 प्रतिशत लड़कियों का विवाह 18 से पहले

कानूनी सुरक्षा और विकास के दावों के बावजूद ओडिशा में बाल विवाह का चलन अब भी काफी ज्यादा है और लगभग 20.5 प्रतिशत लड़कियों के बालिग होने से पहले ही उनका विवाह कर दिया जाता है जो एक चिंताजनक आंकड़ा है

Update: 2026-03-10 04:57 GMT

गरीबी और भेदभाव से बाल विवाह की जड़ें गहरी

  • कम उम्र में मां बनने की दर 7.6 प्रतिशत
  • शिक्षा छोड़ने और खून की कमी की समस्या बढ़ी

भुवनेश्वर। कानूनी सुरक्षा और विकास के दावों के बावजूद ओडिशा में बाल विवाह का चलन अब भी काफी ज्यादा है और लगभग 20.5 प्रतिशत लड़कियों के बालिग होने से पहले ही उनका विवाह कर दिया जाता है जो एक चिंताजनक आंकड़ा है।

राज्य सरकार ने "बाल विवाह की रोकथाम: एक सामूहिक संकल्प" पर एक पुस्तिका तैयार की है, जिसके अनुसार बाल विवाह आज भी ओडिशा में लैंगिक भेदभाव और बच्चों के अधिकारों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पुरानी सामाजिक मान्यताएं, गरीबी और लड़का-लड़की के बीच का अंतर आज भी किशोरियों के भविष्य और उनके अवसरों को खत्म कर रहा है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-5 के आंकड़ों के मुताबिक, ओडिशा में आज भी 20.5 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है, और कम उम्र में मां बनने की दर 7.6 प्रतिशत पर रुकी हुई है।

इस पुस्तिका में सर्वे के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि गरीबी और जल्दी शादी के कारण हाई स्कूल तक आते-आते पढ़ाई छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या काफी ज्यादा (23.6 प्रतिशत) है। इसके साथ ही, प्रजनन आयु वाली महिलाओं में खून की कमी की समस्या 51 प्रतिशत से बढ़कर 64.3 प्रतिशत हो गई है। बाल लिंगानुपात भी 932 से घटकर 894 रह गया है, जो दर्शाता है कि समाज में भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी हैं।

ओडिशा की जनसंख्या लगभग 4.65 करोड़ है और यहां अलग-अलग समुदाय के लोग रहते हैं, जिनमें 22.8 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 17.1 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग शामिल हैं। इन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का सबसे बुरा असर आदिवासी, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों की लड़कियों पर पड़ता है, जिससे वे पिछड़ेपन के चक्र में फंसी रहती हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि महिलाएं कुल आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार और राजनीति में उनकी भागीदारी अब भी सीमित है।

राज्य सरकार ने लैंगिक समानता और जरूरतमंद लड़कियों की मदद के लिए 'अद्विका', 'ममता योजना' और 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसी कई पहल शुरू की हैं। हालांकि ये प्रयास सुरक्षा और समावेश के रास्ते खोलते हैं, लेकिन व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाना अभी भी एक चुनौती है।

इस पुस्तिका के अनुसार समस्या के समाधान के लिए 'बाल विवाह समाप्त करने की राज्य रणनीति और कार्य योजना (2019-2030)' बनाई गई थी, जिसे 2024 में और मजबूत किया गया है। अब इसका मुख्य ध्यान बाल विवाह रोकने, किशोरियों को सशक्त बनाने और समाज को जागरूक करने पर है।

महिला और शिशु विकास विभाग ने बाल विवाह को समाप्त करने के लिये कानूनी, संस्थागत और सामुदायिक स्तर पर प्रयास किये हैं।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाल विवाह को रोकना न केवल कानूनी और विकासात्मक रूप से अनिवार्य है, बल्कि हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है - हर लड़की को सम्मान, आजादी और समान अधिकारों के साथ जीने का हक है।

उपमुख्यमंत्री प्रावती परिदा ने कहा, "ओडिशा सरकार ने बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण को अपने विकास एजेंडे के केंद्र में रखा है। प्रमुख योजनाओं और विभिन्न विभागों के आपसी सहयोग से हम बाल विवाह को रोकने के लिए कड़े कदम उठा रहे हैं। हमारा ध्यान सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने, किशोरियों के लिए शिक्षा और कौशल विकास के अवसर बढ़ाने, 'मिशन शक्ति' समूहों को सक्रिय करने और युवाओं को जागरूकता अभियानों से जोड़ने पर है।"

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