कराटे के दम पर दुनिया में छा गई फलस्तीन की मरियम बशारत
वेस्ट बैंक की 17 वर्षीय मरियम बशारत ने मुश्किलों को हराकर कराटे में विश्व खिताब जीता है. अब वह जर्मनी में रहती हैं.;
इस्राएली कब्जे वाले वेस्ट बैंक में रहने वाले लोगों के लिए खेल के क्षेत्र में सफलता हासिल करना आसान नहीं है, लेकिन 17 साल की मरियम बशारत ने तमाम चुनौतियों को पीछे छोड़कर कराटे में विश्व चैंपियन का खिताब जीता है.
मरियम बशारत ने कहा, "जब रेफरी ने मेरा हाथ उठाकर बताया कि मैं अब दो बार की विश्व चैंपियन बन गई हूं, तो वह पल मेरे लिए बेहद भावुक कर देने वाला था. एक बार इतिहास रचना बड़ी बात है, लेकिन दूसरी बार ऐसा करना बिल्कुल अलग एहसास है. मैं बहुत खुश थी और मुझे बहुत राहत महसूस हुई. मैंने कितने त्याग किए और कितनी मुश्किलों का सामना किया, यह सिर्फ मैं जानती हूं.”
किसी बड़ी जीत के बाद खिलाड़ी अक्सर खुशी, राहत और इसके लिए किए गए त्याग का जिक्र करते हैं. लेकिन मरियम बशारत की कहानी इससे कहीं आगे है. उनके लिए यह सिर्फ नियमित अभ्यास और शारीरिक फिटनेस बनाए रखने की बात नहीं है. 17 साल की मरियम ने अक्टूबर में पोलैंड में फलस्तीन की राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व करते हुए अंडर-21 विश्व कराटे चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक दूसरी बार अपने नाम किया.
उन्होंने इस्राएली कब्जे वाले वेस्ट बैंक में गुजरे अपने बचपन के बारे में डीडब्ल्यू को बताया, "मेरे आस-पास लोगों का मारा जाना और घरों पर बमबारी होना, यह सब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था. मुझे कहीं आने-जाने में बहुत दिक्कत होती थी. मैं प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए दूसरे लोगों के साथ ट्रेनिंग करने के मकसद से एक शहर से दूसरे शहर नहीं जा पाती थी. मुझे जॉर्डन या मिस्र जैसे दूसरे देशों में जाना पड़ता था, जो मेरे लिए बहुत मुश्किल था. आर्थिक मदद भी उतनी नहीं मिलती थी, जितनी किसी शीर्ष स्तर के खिलाड़ी को जरूरत होती है.”
हिचकिचाहट भरी शुरुआत से लेकर सफलता का परचम लहराने तक का सफर
नाबलुस में बचपन बिताने वाली बशारत के लिए कामयाबी की राह आसान नहीं थी. शुरुआत में सबसे बड़ी बाधा उनकी अपनी हिचकिचाहट थी, जो उनके कराटे करियर को शुरू होने से पहले ही खत्म कर सकती थी.
बशारत 66 किलोग्राम (145 पाउंड) से कम वजन वाले फाइटर्स की कैटगरी में हिस्सा लेती हैं. वह बताती हैं, "जब मैं छोटी थी, तो मुझे यह खेल कुछ खास पसंद नहीं था. मैंने इस खेल में कदम इसलिए रखा, क्योंकि मेरा परिवार पहले से इससे जुड़ा हुआ था. मेरे पिता का कराटे प्रशिक्षण केंद्र था और मां भी इस खेल का अभ्यास करती थीं. मेरे भाई-बहन के अलावा चाचा-चाची और दूसरे रिश्तेदार भी कराटे करते थे. यह हमारे परिवार का हिस्सा था. शुरुआत में मैंने भी उन्हीं को देखकर कराटे शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे मेरी इसमें दिलचस्पी बढ़ने लगी.”
परिवार हमेशा से बशारत के लिए सहारा और प्रेरणा का स्रोत रहा है. उनके पिता ने मैनेजर और चाचा ने कोच की भूमिका निभाई है. पिछले साल जब उनकी मां और भाई-बहन बशारत के साथ जर्मनी के हैम्बर्ग चले गए, तो उनके पिता अपना डोजो (कराटे प्रशिक्षण केंद्र) और कारोबार संभालने के लिए फलस्तीन ही रुक गए. हालांकि, वह अक्सर अपनी बेटी से मिलने जाते हैं और प्रतियोगिताओं के दौरान उनके साथ रहने की कोशिश करते हैं. अपनी जर्मन मां से सीखी गई भाषा पर अच्छी पकड़ होने के कारण बशारत जर्मन माहौल में आसानी से घुल-मिल गईं.
अपने वतन को छोड़ने को लेकर बशारत के मन में मिली-जुली भावनाएं हैं. बशारत ने कहा, "मैं जर्मनी आकर खुश हूं और इसके लिए आभारी हूं, क्योंकि जर्मनी आने से मेरे लिए कई नए रास्ते खुले हैं. मुझे लगता है कि यहां मेरा भविष्य बेहतर हो सकता है. लेकिन फलस्तीन में रहना मेरी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था और मुझे वहां बहुत अच्छा लगता था. मेरा परिवार और दोस्त मेरे आसपास थे. वहां मैं खुद को सहज महसूस करती थी. जर्मनी आने के बाद मेरी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. मेरा मानना है कि हर बदलाव के साथ कुछ मुश्किलें भी आती हैं.”
अपने घरेलू देश की वजह से अलग तरह के दबाव का करना पड़ता है सामना
इस्राएली कब्जे वाले इलाके में रहने की रोजमर्रा की मुश्किलों के अलावा, वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी में रहने वाले खिलाड़ियों को कई खास चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. इनमें खेल सुविधाओं की कमी, यात्रा में परेशानी और सुरक्षा को लेकर लगातार बना रहने वाला डर शामिल है. यही वजह है कि फलस्तीनी क्षेत्रों से बहुत कम खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में अपनी पहचान बना पाते हैं. बशारत का कहना है कि इस वजह से उन पर ऐसी जिम्मेदारियां आ गई हैं, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए भारी हो सकती हैं. 17 साल की उम्र में इन जिम्मेदारियों को निभाना और भी मुश्किल है.
गाजा में भुखमरी संकट में जान बचाने की जद्दोजहद में फलस्तीनी
बशारत कहती हैं, "फलस्तीन में एक बड़े स्तर का खिलाड़ी बनना बेहद खास है. इसकी वजह यह है कि वहां हर किसी को ऐसा मौका नहीं मिल पाता. बहुत कम खिलाड़ी ऐसे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने में सफल होते हैं. इसलिए, पूरे देश, लोगों, परिवार और कोच का सारा दबाव मुझ पर होता है, क्योंकि मैं उनका प्रतिनिधित्व कर रही हूं और उनका झंडा ऊंचा कर रही हूं. कभी-कभी तो मैं अपने लिए लड़ना और अपने बारे में सोचना ही भूल जाती हूं.”
ओलंपिक पदक जीतने का सपना, लेकिन अलग तरह की है चुनौती
इन चुनौतियों के बावजूद बशारत ने कामयाबी हासिल की है. विश्व कराटे महासंघ (डब्ल्यूकेएफ) के मुताबिक, वह अपनी कैटेगरी में दुनिया में पहले नंबर पर हैं. अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) से फलस्तीन को मान्यता प्राप्त है. ऐसे में बशारत 2028 में लॉस एंजिलिस ओलंपिक में फलस्तीन का प्रतिनिधित्व करने की प्रबल दावेदार हो सकती थीं, लेकिन कराटे को 2024 में ही ओलंपिक खेलों से हटा दिया गया.
2024 में इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए डब्ल्यूकेएफ ने कहा था, "दुनिया भर का कराटे समुदाय इस बात पर कायम है कि ओलंपिक खेलों में कराटे को जगह मिलनी चाहिए. हमें उम्मीद है कि पेरिस 2024 और लॉस एंजिलिस 2028 में कराटे को शामिल न किए जाने की गलती को ब्रिस्बेन 2032 तक या उससे पहले सुधार लिया जाएगा.” हाल ही में सेनेगल में हुए यूथ गेम्स से भी कराटे को हटा दिया गया था.
अगर ब्रिस्बेन में कराटे की वापसी होती है, तो उस समय बशारत अपने करियर के सबसे बेहतरीन दौर में होंगी. इस बीच, वह 18 साल की होने पर सीनियर स्तर पर अपना सफर शुरू करने के लिए उत्सुक हैं, लेकिन वह बस यूं ही हाथ पर हाथ धरे बैठी नहीं रहना चाहती हैं. वह कहती हैं, "मेरा लक्ष्य सीनियर स्तर पर वर्ल्ड चैंपियन बनना है, जो कराटे में हासिल की जा सकने वाली सबसे कठिन और सबसे बड़ी उपलब्धि है. लेकिन ओलंपिक मेडल जीतना, ओलंपिक चैंपियन कहलाना या अपने देश के झंडे के साथ उसका प्रतिनिधित्व करना, यह सोच ही मुझे बेहद खुशी और गर्व से भर देती है.”