नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं। युवा क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी के शुरुआती कोच मनीष ओझा ने टीम प्रबंधन की रणनीति और खिलाड़ियों को मौका देने के तरीके पर नाराजगी जताई है। ओझा का आरोप है कि शानदार प्रदर्शन के बावजूद वैभव को लगातार अंतिम एकादश से बाहर रखा जा रहा है, जिससे युवा खिलाड़ी का मनोबल प्रभावित हो सकता है। उन्होंने गंभीर के रवैये को तानाशाही बताते हुए सवाल किया कि जब नई पीढ़ी को तैयार करने की जरूरत है, तो युवा खिलाड़ियों को मैदान पर उतरने का अवसर क्यों नहीं मिल रहा? ओझा ने गंभीर की उस नीति पर सवाल उठाए, जिसमें खिलाड़ियों को सही समय आने पर मौका देने की बात कही जाती है। उनके मुताबिक, प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को केवल टीम के साथ रखने के बजाय उन्हें अपनी क्षमता दिखाने का अवसर भी दिया जाना चाहिए।
वैभव को मौका नहीं मिलने पर उठाए सवाल
मनीष ओझा ने वैभव सूर्यवंशी के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में शानदार प्रदर्शन और जिंबाब्वे दौरे पर प्लेयर ऑफ द सीरीज का खिताब हासिल करने के बावजूद उन्हें खेलने का अवसर नहीं मिल रहा है। ओझा के अनुसार, इतनी कम उम्र में उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ी को लगातार बेंच पर बैठाए रखना उसके आत्मविश्वास पर असर डाल सकता है। उन्होंने सवाल किया कि जब रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे अनुभवी खिलाड़ी अपने करियर के अगले चरण में हैं, तब भारतीय टीम की अगली पीढ़ी तैयार करने की प्रक्रिया को कब प्राथमिकता दी जाएगी। उनका कहना है कि 14-15 साल के युवा क्रिकेटर टीम में केवल पानी पहुंचाने या मैच के दौरान बाहर बैठने के लिए नहीं आते। उन्हें प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में खेलने और अपनी प्रतिभा साबित करने के मौके मिलने चाहिए। हालांकि, किसी खिलाड़ी को अंतिम एकादश में शामिल करने का फैसला टीम की जरूरत, विपक्षी टीम की रणनीति और परिस्थितियों जैसे कई पहलुओं पर निर्भर करता है। ऐसे में वैभव को मौका नहीं मिलने पर उठे सवालों के बीच टीम प्रबंधन की रणनीति भी चर्चा का विषय बन गई है।
गंभीर और वीवीएस लक्ष्मण की कोचिंग में अंतर का दावा
ओझा ने गौतम गंभीर और वीवीएस लक्ष्मण की कोचिंग शैली की तुलना भी की। उनका दावा है कि लक्ष्मण के मार्गदर्शन में युवा खिलाड़ियों के लिए टीम में अवसर अधिक सहजता से बनते दिखाई देते हैं, जबकि गंभीर के कार्यकाल में युवाओं को मौके मिलने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने संजू सैमसन, शिवम दुबे और तिलक वर्मा जैसे खिलाड़ियों के प्रदर्शन तथा स्ट्राइक रेट में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी उदाहरण दिया। ओझा की दलील है कि खिलाड़ियों के प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखने के लिए उन्हें उचित भूमिका और नियमित अवसर मिलना जरूरी है।
रांची में वैभव को खेलते देखने पहुंचे थे ओझा
मनीष ओझा ने बताया कि रांची उनका घरेलू मैदान है और वह वैभव सूर्यवंशी को खेलते हुए देखने के लिए वहां पहुंचे थे। लेकिन जब वैभव को अंतिम एकादश में जगह नहीं मिली, तो उन्हें निराशा हुई। ओझा के मुताबिक, मैच के बाद उन्होंने वैभव से केवल संक्षिप्त मुलाकात की और वापस लौट गए। उनकी नाराजगी का मुख्य कारण यह है कि कम उम्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता दिखाने के अधिक अवसर मिलने चाहिए। ओझा का मानना है कि प्रतिभा को निखारने के लिए केवल अभ्यास और टीम के साथ रहना पर्याप्त नहीं, बल्कि बड़े मुकाबलों में खेलने का अनुभव भी जरूरी है।
युवा खिलाड़ियों के चयन पर फिर बहस
मनीष ओझा के बयान ने भारतीय टीम में युवाओं को अवसर देने और अनुभवी खिलाड़ियों के साथ संतुलन बनाने की बहस को फिर तेज कर दिया है। एक ओर युवा प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार करने की जरूरत है, तो दूसरी ओर टीम प्रबंधन को हर मैच के लिए उपयुक्त संयोजन चुनना होता है। अब देखना होगा कि आने वाले मुकाबलों में वैभव सूर्यवंशी को खेलने का अवसर मिलता है या नहीं। फिलहाल, गंभीर की कार्यशैली पर ओझा की टिप्पणी टीम चयन और युवा खिलाड़ियों के भविष्य को लेकर क्रिकेट जगत में चर्चा का विषय बन गई है।