ट्रंप के दखल से अमेरिकी खिलाड़ी का रेड कार्ड रद्द? फीफा के फैसले पर उठे निष्पक्षता के सवाल

25 वर्षीय फोलारिन बालोगुन को पिछले नॉकआउट मुकाबले में बोस्निया के खिलाफ रेड कार्ड दिखाया गया था। सामान्य परिस्थितियों में उन्हें अगले मैच से निलंबित रहना चाहिए था, लेकिन अनुशासनात्मक समीक्षा के बाद फीफा ने उन्हें बेल्जियम के खिलाफ खेलने की मंजूरी दे दी।;

Update: 2026-07-07 07:41 GMT

वॉशिंगटन/ज्यूरिख। फीफा विश्व कप के दौरान अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन का रेड कार्ड रद्द किए जाने को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से बातचीत कर बालोगुन पर लगे एक मैच के प्रतिबंध की समीक्षा करने का आग्रह किया था। इसके बाद फीफा ने उन्हें बेल्जियम के खिलाफ प्री-क्वार्टर फाइनल (राउंड ऑफ-16) मुकाबले में खेलने की अनुमति दे दी। हालांकि, इस मामले में ट्रम्प द्वारा "धमकाने" के आरोप और फीफा के निर्णय से जुड़े दावे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुए हैं। फीफा ने अपने फैसले को नियमों के अनुरूप बताया है।

बोस्निया के खिलाफ मिला था रेड कार्ड

25 वर्षीय फोलारिन बालोगुन को पिछले नॉकआउट मुकाबले में बोस्निया के खिलाफ रेड कार्ड दिखाया गया था। सामान्य परिस्थितियों में उन्हें अगले मैच से निलंबित रहना चाहिए था, लेकिन अनुशासनात्मक समीक्षा के बाद फीफा ने उन्हें बेल्जियम के खिलाफ खेलने की मंजूरी दे दी। बालोगुन ने पूरे टूर्नामेंट में तीन गोल किए थे, लेकिन उनकी मौजूदगी के बावजूद अमेरिकी टीम बेल्जियम से 1-4 से हार गई और विश्व कप से बाहर हो गई।

ट्रंंप ने समीक्षा की मांग करने की बात स्वीकार की

प्री-क्वार्टर फाइनल से पहले व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्वीकार किया कि उन्होंने बालोगुन के मामले में फीफा से बात की थी। उनके अनुसार उन्होंने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो से अनुरोध किया कि रेड कार्ड और एक मैच के प्रतिबंध की दोबारा समीक्षा की जाए। ट्रम्प ने कहा कि बातचीत के दौरान उन्हें बताया गया कि संबंधित फाउल को लेकर अलग-अलग राय थीं। बाद में फीफा ने खिलाड़ी को खेलने की अनुमति दी। ट्रम्प ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि उनके अनुसार यह सही निर्णय था।

फीफा ने कहा- फैसला नियमों के तहत लिया गया

फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फेंटिनो ने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि बालोगुन के मामले में निर्णय फीफा की अनुशासन समिति ने स्वतंत्र रूप से लिया। उन्होंने कहा कि हर मामले का मूल्यांकन उपलब्ध तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर किया जाता है तथा किसी भी फैसले में स्थापित प्रक्रिया का पालन किया जाता है। फीफा ने यह नहीं कहा कि निर्णय किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण लिया गया।

बेल्जियम फुटबॉल संघ ने जताई आपत्ति 

फीफा के फैसले के बाद बेल्जियम फुटबॉल महासंघ ने इस निर्णय पर आपत्ति दर्ज कराई और अपील भी दायर की। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह अपील स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद यूरोपीय फुटबॉल जगत में भी इस मामले को लेकर बहस तेज हो गई। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी खिलाड़ी का निलंबन अपवादस्वरूप हटाया जाता है, तो उसकी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए ताकि प्रतियोगिता की निष्पक्षता पर सवाल न उठें।

खेल और राजनीति के रिश्ते पर फिर छिड़ी बहस

फीफा लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि उसके निर्णय राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं। ऐसे में किसी राष्ट्राध्यक्ष द्वारा सार्वजनिक रूप से किसी खिलाड़ी के मामले में हस्तक्षेप स्वीकार किए जाने के बाद खेल प्रशासन की निष्पक्षता पर नई बहस शुरू हो गई है। हालांकि, अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो कि फीफा का अंतिम निर्णय सीधे राजनीतिक दबाव का परिणाम था।

1962 में भी सामने आया था ऐसा मामला

विश्व कप इतिहास में रेड कार्ड या अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर विवाद पहले भी सामने आ चुके हैं। वर्ष 1962 के विश्व कप में ब्राजील के दिग्गज खिलाड़ी गरिंचा को सेमीफाइनल में चिली के खिलाफ मैदान से बाहर भेजा गया था, लेकिन बाद में उन्हें फाइनल खेलने की अनुमति मिल गई थी। उस समय मौजूदा निलंबन प्रणाली लागू नहीं थी और अनुशासनात्मक समिति उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अंतिम फैसला करती थी। उस निर्णय पर भी राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगे थे।

पारदर्शिता पर उठे नए सवाल

हाल के वर्षों में भी विश्व कप के दौरान रेफरी और अनुशासनात्मक फैसलों पर विवाद होते रहे हैं। 2018 विश्व कप और 2002 विश्व कप के दौरान भी कुछ निर्णयों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं, लेकिन उन मामलों में फीफा ने अपने फैसलों में बदलाव नहीं किया था। बालोगुन प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक खेल संस्थाओं को न केवल निष्पक्ष निर्णय लेने चाहिए, बल्कि उनकी निर्णय प्रक्रिया भी पूरी तरह पारदर्शी दिखाई देनी चाहिए। वहीं, इस मामले से जुड़े कई दावे अभी सार्वजनिक रिपोर्टों पर आधारित हैं और उनके संबंध में आधिकारिक स्तर पर सीमित जानकारी ही उपलब्ध है।

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