भारत की सड़कों पर मर्दानगी से जूझती महिलाएं
महिलाओं, और खासकर कि मोटरसाइकिल चलाने वाली महिलाओं के लिए सड़कें आज भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं;
महिलाओं, और खासकर कि मोटरसाइकिल चलाने वाली महिलाओं के लिए सड़कें आज भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं. ओवरटेकिंग, आक्रामक व्यवहार और पितृसत्तात्मक मानसिकता के बीच क्या हमारी सड़कें महिलाओं के लिए वाकई सुरक्षित हैं?
अगर आप एक पुरुष हैं और मोटरसाइकिल चलाते हैं तो मुमकिन है कि जब आप घर से बाहर निकलते होंगे तो जेहन में सिर्फ काम या बाहर जाने की वजह, हेलमेट, वॉलेट और घर की चाबी साथ होती होगी. आप एक निक्कर या हाफ पेंट पहन सकते हैं. सुकून भरा मौसम हो तो बिना बाह की शर्ट या टी शर्ट पहन सकते हैं. लेकिन अगर आप दोपहिया पर सफर करने वाली एक महिला हैं तो आपको कपड़ों से लेकर कई किस्म के अदृश्य भयों के बारे में भी सोचना पड़ता है.
भारत के जम्मू शहर की सोनाली डब चंडीगढ़ में एक ग्राफिक डिजाइनर और इलस्ट्रेटर के तौर पर काम करती हैं. उन्हें अपनी मोटरसाइकिल से देश को जानना पंसद है. डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया, "निकलने से पहले मैं किसी परिजन को अपनी लोकेशन भेजती हूं, उनसे अपना रूट साझा करती हूं और यह सुनिश्चित करती हूं कि रात में भी वह जगह आने जाने के लिए सुरक्षित है या नहीं.”
इतनी तैयारी के बावजूद कई महिलाओं को खासकर भारत की सड़कों पर अभद्र भाषा, आक्रामक ओवरटेक करने जैसे खतरनाक व्यवहार का सामना करना पड़ता है.
हाल ही में राजधानी नई दिल्ली से सटे गुरुग्राम की एक घटना सामने आई, जहां एक महिला राइडर को एक कार ड्राइवर ने ओवरटेक करके ऐसी टक्कर मारी कि वे मोटरसाइकिल से ही गिर गईं और भीड़ भाड़ से भरे ट्रैकिफ के बीच बाल बाल बचीं. इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ.
इस घटना में एक तरफ सड़क पर गुस्सा, आक्रामक ड्राइविंग और ट्रैफिक उल्लंघनों का मुद्दा है और दूसरी तरफ महिलाओं का सार्वजनिक स्थानों पर उत्पीड़न, असुरक्षा और उनकी आवाजाही का सवाल है. क्या सड़कें, रुतबा, मर्दानगी और हैसियत दिखाने मैदान बन गई हैं? या फिर से समाज के लिए सुरक्षित आवाजाही का जरिया हैं.
सड़क पर गुस्सा केवल पुरुषों की समस्या नहीं है
इंटरनेशनल जर्नल और सोशल साइकेट्री ने 'रोड रेज' नाम का पब्लिश किया है. 2013 के इस शोध में शोधकर्ताओं ने पाया कि दिल्ली में हॉर्न बजाना, गलत दिशा से ओवरटेक करना, तेज संगीत बजाना ड्राइविंग से जुड़े गुस्से को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल था. दिल्ली के 200 वाहन चालकों पर किए गए इस अध्ययन में गर्म और उमस भरे मौसम के साथ ही इन कारणों को अहमियत दी गई. ज्यादा गुस्सा महसूस करने वाले ड्राइवरों में आक्रामक तरीके से ओवरटेक करने, गाली देने, चिल्लाने, दूसरे ड्राइवरों को रास्ता न देने और यहां तक कि दूसरे वाहन चालकों से लड़ने या उन्हें टक्कर मारने जैसा व्यवहार ज्यादा दिखाई पड़ा.
हालांकि, पुरुषों को स्वाभाविक रूप से ज्यादा आक्रामक ड्राइवर मान लेना शोध से पूरी तरह साबित नहीं हुआ. भारत में रोड रेज पर प्रवीण जैन और उनके सहयोगियों ने भी 2022 में एक शोध किया. 282 प्रतिभागियों पर आधारित यह शोध यूरोपियन साइकेट्री में भी प्रकाशित हुआ. इसके शोधकर्ताओं को पुरुषों और महिलाओं के रोड रेज स्कोर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला. इसके बजाय कम उम्र के प्रतिभागियों में ड्राइविंग के दौरान गुस्से का स्तर अधिक पाया गया.
लेकिन इससे एक दूसरा सवाल खत्म नहीं होता. अगर भारत की सड़कों पर गुस्सा इतना आम हो चुका है तो क्या उसका इजहार महिलाओं के खिलाफ अलग तरीके से किया जाता है?
सड़क किसकी?
कल्पना विश्वनाथ भारत में एक सोशल एंटरप्रेन्योर हैं और 'सेफ्टीपिन' नाम की ऐप की को-फाउंडर और सीईओ हैं. सेफ्टीपिन शहरों के सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा का आकलन करता है जैसे रोशनी, दृश्यता, सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षा और पैदल चलने की सुविधाएं. यह आकलन डाटा के आधार पर किया जाता है. विश्वनाथ को लिंग-समावेशी शहरीकरण पर अच्छी पकड़ हासिल है. डीडब्ल्यू से बात करते हुए उन्होंने बताया "सड़क पुरुषों के लिए उनका अपना मैदान होता है जहां वो शोहरत, गाड़ी और रफ्तार की नुमाइश करते हैं. अब उसमें एक दोपहिया सवार महिला उनकी पितृसत्ता पर चोट करती है. वो सोचते हैं कि एक महिला कैसे इस रफ्तार से मोटरसाइकिल चला कर निकली?” विश्वनाथ कहती हैं कि यह गुस्सा, महिलाओं को उनकी जगह बताने पर आमादा हो जाता है.
प्रियंका कुल्लू से हैं और चंडीगढ़ में पत्रकारिता करती हैं. वे भी सोनाली की तरह ही मोटरसाइकिल चलाती हैं. उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें भी एक ऐसे व्यक्ति का सामना करना पड़ा जो उनकी मोटरसाइकिल स्टार्ट ना होने पर हॉर्न पर हॉर्न मारता रहा ताकि वो डर जाएं. उनका कहना है कि उनकी मोटरबाइक अचानक रुक गई थी क्योंकि वह व्यक्ति बहुत करीब आ गया था और उन्हें अचानक ब्रेक लगाने पड़े थे. ऐसी कई घटनाएं कई महिलाओं के साथ सड़कों पर हर रोज होती हैं.
सार्वजनिक जगह में महिलाओं की मौजूदगी
दिल्ली में युवा महिलाओं के अनुभवों पर 2014 में प्रकाशित एक अध्ययन में 18 से 30 वर्ष की 20 महिलाओं का इंटरव्यू किया गया. महिलाओं ने सड़क पर होने वाले उत्पीड़न के अलग-अलग रूपों और उसके कारण अपने जीवन में लगने वाली बंदिशों के बारे में बताया. अध्ययन में महिलाओं ने उत्पीड़न को महिलाओं के प्रति सामाजिक रवैये और कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन से भी जोड़ा.
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि सड़क पर किसी महिला का अनुभव सिर्फ यह नहीं है कि वह कितने सुरक्षित तरीके से वाहन चला रही है. उसके भीतर यह बेचैनी भी रहती है कि दूसरे लोग उसके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं.
भूगोल और जनसांख्यिकी का असर
शहरीकरण के संदर्भ में कल्पना विश्वनाथ बताती हैं कि जिस रोड पर गुरुग्राम हादसा हुआ, वह सिर्फ तेज चलने वाली गाड़ियों के लिए ही बनी है. उसके इर्द गिर्द न ज्यादा खाने पीने की जगहें हैं, और सभी ट्रैफिक लाइट्स भी हटा दी गई हैं. उन्होंने आगे कहा, "और यह इलाका उत्तरी भारत के हरियाणा राज्य में आता है, जहां ज्यादातर पुरुष पितृसत्ता और सामंती मानसिकता से आते हैं. इन जगहों पर इमारतें तो बन गईं लेकिन शहरीकरण के साथ चलने वाले मानदंडों को ठीक से व्यक्तिगत व्यवहार में नहीं अपनाया जा सका है.”
उत्तर भारत, खासकर दिल्ली और आसपास के शहरों में, सड़क पर होने वाली रोड रेज और महिलाओं की सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा को लेकर काफी चर्चा और शोध हुए हैं. लेकिन सिर्फ दर्ज किए गए मामलों की संख्या अधिक होने के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उत्तर भारत में रोड रेज या महिलाओं के खिलाफ सड़क पर होने वाली लैंगिक हिंसा देश के दक्षिणी हिस्से से अलग है. अब तक ऐसा कोई भी अध्ययन सामने नहीं आया है जो क्षेत्रीय व्यवहार से जुड़े आंकड़े सटीकता से सामने रख सके.
भारत में महिला सुरक्षा
सड़कें हैं या मर्दानगी का मंच
यहीं पर शहरी नियोजन और जेंडर के बीच का संबंध महत्वपूर्ण हो जाता है. सड़क पर वाहन चलाना सिर्फ तकनीकी काम नहीं है. ड्राइविंग, सड़क इस्तेमाल कर रहे बाकी लोगों के साथ एक तरह का सामंजस्य भी है. इसे प्रतिस्पर्धा या किसी किस्म की रेस बना लेना, दूसरों को हॉर्न बजा बजाकर बाध्य करना, पदयात्रियों को कुछ ना समझना या फिर सब्र और संयम के साथ दूसरों का सम्मान करते हुए सही मौके का इंतजार करना, इस पूरी प्रक्रिया में एक तरह की सामाजिक बातचीत जैसे हैं.
दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर यौन उत्पीड़न के हॉटस्पॉट को मैप करने वाले 2026 के एक अध्ययन ने भी यह दिखाया कि पर्यावरण और जगह की विशेषताएं रोड रेज के पैटर्न को समझने में महत्वपूर्ण हो सकती हैं. और शायद यही वह जगह है जहां सड़क का सवाल शहरी नियोजन और जेंडर के सवाल में बदल जाता है.