भ्रष्टाचार मामले में फैसला: एफआईआर होगी दर्ज पर कार्रवाई पर रहेगी रोक, पंजाब सरकार को सुप्रीम कोर्ट से राहत

जस्टिस एमएम सुंदेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने एफआईआर पर रोक लगाने और दंडात्मक कार्रवाई रोकने के बीच अंतर स्पष्ट किया।;

Update: 2026-10-12 09:43 GMT

नई दिल्ली: पंजाब सरकार से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कहा कि वह फिलहाल इस मामले में पंजाब सरकार से जुड़े लोगों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करे। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी (एफआईआर) पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इस आदेश से पंजाब सरकार को अंतरिम राहत मिली है, जबकि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच का रास्ता खुला रहेगा। यह मामला पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई को आरोपों की जांच करने और दो महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया था। पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और जांच एजेंसियों को जारी किया नोटिस

जस्टिस एमएम सुंदेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने एफआईआर पर रोक लगाने और दंडात्मक कार्रवाई रोकने के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा, “हम एफआईआर पर रोक नहीं लगा रहे हैं। हम कह रहे हैं कि कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।” इस मामले में पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि जांच और प्राथमिकी दर्ज करने से संबंधित निर्देशों पर कानूनी पहलुओं के आधार पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है।

ट्रांसफर और नीतिगत फैसलों में कथित लेन-देन के आरोप

मामले की शुरुआत वकील निखिल सराफ की याचिका से हुई थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पंजाब में अधिकारियों के तबादलों और मनमुताबिक नीतियां बनवाने के लिए कथित तौर पर पैसे का लेन-देन हुआ। इन आरोपों को राज्य सरकार के कामकाज और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता से जोड़कर देखा गया। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्रवर्तन निदेशालय ने आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार को इस मामले से संबंधित जानकारी भेजी थी, लेकिन इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। याचिका में कहा गया कि आरोप गंभीर हैं और उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि तथ्यों का पता लगाया जा सके। हाई कोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के साथ पंजाब पुलिस और राज्य सरकार को संबंधित दस्तावेज केंद्रीय एजेंसी को उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया था। इसके अलावा, जांच पूरी कर दो महीने में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था।

पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को क्यों दी चुनौती?

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में हाई कोर्ट के फैसले को कई कानूनी आधारों पर चुनौती दी है। राज्य सरकार का तर्क है कि फैसले में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 66(2) के तहत दी गई जानकारी की व्याख्या इस तरह की गई, मानो उसके आधार पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य हो। याचिका में दलील दी गई कि यह दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2022 के विजय मदनलाल चौधरी फैसले के अनुरूप नहीं है। सरकार का कहना है कि संबंधित कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते समय निर्धारित प्रक्रिया और अधिकारों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

भ्रष्टाचार निवारण कानून की मंजूरी का मुद्दा भी उठा

राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A का भी हवाला दिया है। याचिका के मुताबिक, सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक फैसलों, तबादलों, टेंडर और नीतिगत निर्णयों से संबंधित आरोपों की जांच के लिए कानून के तहत निर्धारित पूर्व मंजूरी की शर्त लागू हो सकती है। पंजाब सरकार ने यह सवाल भी उठाया कि हाई कोर्ट ने अधिकारियों को जांच में शामिल नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई, जबकि आवश्यक मंजूरी के अभाव में संबंधित अधिकारियों से पूछताछ करने की कानूनी सीमाएं हो सकती हैं।

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