रामजन्म भूमि मंदिर के लिए प्रयागराज व बलिया की अहम भूमिका 

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए अतीत में हुए संघर्षों में अनेक लोगों ने तरह-तरह से योगदान दिया है

Update: 2019-11-09 23:28 GMT

- रतिभान त्रिपाठी

लखनऊ। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए अतीत में हुए संघर्षों में अनेक लोगों ने तरह-तरह से योगदान दिया है। साधु-संतों से लेकर राजनेताओं और सामाजिक लोगों की अहमियत कम करके नहीं आंकी जा सकती  लेकिन अदालत और कानून के जरिए यह मुकदमा जीतने के लिए जो लोग मील का पत्थर बने उनमें प्रयागराज और बलिया की भूमिका अहम रही है।

रामलला विराजमान के मित्र की हैसियत से इन दो जिलों के रहने वाले ही श्रीराम के पैरोकार बने। इनमें हैं प्रयागराज के निवासी देवकी नंदन अग्रवाल और बलिया के निवासी त्रिलोकी नाथ पाण्डेय। रामलला के मित्र बनने की कहानी अयोध्या यानी तत्कालीन फैजाबाद और प्रयागराज यानी तत्कालीन इलाहाबाद के बीच शुरू होती है। प्रयागराज के कटरा मुहल्ला निवासी देवकी नंदन अग्रवाल का बचपन फैजाबाद में बीता। उनके पिता फैजाबाद में उन दिनों इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल थे। उनकी मां रामसखी भगवान श्रीराम की परमभक्त थीं। पूरा परिवार ही वैष्णव था।

राम मंदिर को लेकर तब भी प्राय: बातें चलती रहती थीं। तभी देवकी नंदन अग्रवाल की मां ने अपने बेटे के बालमन में यह बात डाल दी थी कि एक दिन ऐसा आएगा, जब तुम रामलला के मित्र बनकर उनका साथ दोगे। बड़े होकर देवकी नंदन अग्रवाल इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील बने और बाद में वहीं जज भी बन गए। जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल 1983 में जब रिटायर हुए तो  उनके मन में अपनी मां की कही हुई बात कौंधने लगी। वह फैजाबाद गए। वहां उन्होंने विवादित भूमि को रामलला की संपत्ति और जन्मभूमि साबित करने के लिए साक्ष्य जुटाने शुरू किए। सीपीसी की धारा 32 के मुताबिक, कोई भी स्थापित देवता अनंतकाल तक नाबालिग माने जाते हैं। ऐसे में उनसे संबंधित विवाद की पैरोकारी के लिए कोई भी उनका मित्र बन सकता है।

जस्टिस अग्रवाल ने इसी के तहत जुलाई 1989 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में अपनी अर्जी दाखिल की। उच्च न्यायालय ने राम जन्म भूमि और आस्थान जन्मभूमि की ओर से सिविल सूट नंबर 5 दाखिल किया जिसमें रामलला को वादी नंबर 1 बनाया गया था। 

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