Manarega Bachao Sammelan: राहुल गांधी ने कहा, मनरेगा पर नया बिल गरीबों के हक पर हमला, संसद से सड़क तक संघर्ष का ऐलान

कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर मनरेगा को कमजोर करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार जिस ‘वीबी–जीराम–जी’ बिल की बात कर रही है, वह महज एक जुमला है।

Update: 2026-01-22 13:07 GMT
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर मनरेगा को कमजोर करने का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार जिस ‘वीबी–जीराम–जी’ बिल की बात कर रही है, वह महज एक जुमला है और इसका असली उद्देश्य गरीबों से उनका अधिकार छीनना है। राहुल गांधी ने गरीबों और श्रमिकों से इस बिल के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। राहुल गांधी नई दिल्ली में आयोजित रचनात्मक कांग्रेस के राष्ट्रीय मनरेगा श्रमिक सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए मनरेगा मजदूरों ने भाग लिया और सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की।

गमछा, कुदाल और मिट्टी: प्रतीकात्मक विरोध

सम्मेलन के दौरान एक प्रतीकात्मक दृश्य भी देखने को मिला। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने सिर पर गमछा बांधा, कंधे पर कुदाल रखी और देशभर से आए मजदूरों द्वारा लाई गई मिट्टी को पौधों में डाला। इसे कांग्रेस ने ग्रामीण श्रम, अधिकार और जमीन से जुड़ाव का प्रतीक बताया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि मनरेगा और ग्रामीण रोजगार के भविष्य को बचाने का संकल्प है।

राहुल गांधी बोले: मनरेगा ने गरीब को अधिकार दिया

अपने संबोधन में राहुल गांधी ने कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि गरीबों का अधिकार था। उन्होंने कहा, “मनरेगा इसलिए लाई गई थी ताकि गरीब लोगों को काम करने का अधिकार मिले। यह कोई दया या कृपा नहीं थी। इसमें साफ लिखा था कि जरूरतमंद को काम मांगने पर काम देना सरकार की जिम्मेदारी है।” राहुल गांधी ने कहा कि यह योजना पंचायती राज व्यवस्था के जरिए लागू की गई थी, ताकि सत्ता का विकेंद्रीकरण हो और फैसले गांव के स्तर पर लिए जाएं।

‘अधिकार’ शब्द से डरती है भाजपा

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को “अधिकार” शब्द से समस्या है। उन्होंने कहा, “मनरेगा में गरीबों को अधिकार दिया गया था। यही बात भाजपा को पसंद नहीं है। भाजपा उस अवधारणा को खत्म करना चाहती है, जिसमें गरीब खुद तय करे कि उसे कब और कितना काम चाहिए।” उन्होंने दावा किया कि नए प्रस्तावित कानून में काम और पैसा देने का फैसला केंद्र सरकार करेगी, जिससे राज्यों और पंचायतों की भूमिका कमजोर हो जाएगी।

ठेकेदारों और अफसरों को मिलेगा फायदा

राहुल गांधी ने कहा कि नए ढांचे में मनरेगा मजदूरों के बजाय ठेकेदारों और अफसरों को ज्यादा लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा, “पहले जो पैसा मजदूरों की जेब में जाता था, वह अब बिचौलियों के पास जाएगा। भाजपा चाहती है कि संपत्ति कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में रहे और गरीब अडानी-अंबानी जैसे लोगों पर निर्भर रहें।” उन्होंने भाजपा के आर्थिक मॉडल पर हमला करते हुए कहा कि सरकार ऐसा भारत चाहती है जहां “राजा ही सब कुछ तय करे” और आम जनता सिर्फ आदेश माने।

कृषि कानूनों का उदाहरण दिया

राहुल गांधी ने अपने भाषण में तीन कृषि कानूनों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “कुछ साल पहले सरकार तीन काले कृषि कानून लाई थी। किसानों ने एकजुट होकर संघर्ष किया और आखिरकार सरकार को कानून वापस लेने पड़े। यही ताकत आज मनरेगा मजदूरों को दिखानी होगी।” राहुल ने कहा कि जब जनता संगठित होती है, तो सबसे ताकतवर सरकार को भी झुकना पड़ता है।

गांधी के नाम को मिटाने की कोशिश

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “मनरेगा को निरस्त करना केवल एक योजना को खत्म करना नहीं है, बल्कि महात्मा गांधी के नाम और विचारों को लोगों की स्मृति से मिटाने की कोशिश है।” खड़गे ने आरोप लगाया कि सरकार योजनाओं से गांधी का नाम हटाकर उनकी विरासत को कमजोर करना चाहती है।

बजट सत्र में उठेगा मुद्दा: खड़गे

खड़गे ने ऐलान किया कि कांग्रेस संसद के आगामी बजट सत्र में मनरेगा के मुद्दे को पूरी ताकत से उठाएगी। उन्होंने कहा, “हम संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह इस लड़ाई को लड़ेंगे। गरीबों का अधिकार छीना नहीं जाने देंगे।” खड़गे ने यह भी कहा कि मनरेगा ने देश के करोड़ों गरीब परिवारों को सम्मान के साथ रोजगार दिया और संकट के समय संबल बना।

‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ का देशव्यापी अभियान

कांग्रेस ने जानकारी दी कि उसने 10 जनवरी को 45 दिनों का राष्ट्रव्यापी अभियान ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ शुरू किया है। इस अभियान के तहत गांव-गांव जाकर मजदूरों से संवाद, जनसभाएं और धरने, राज्य और जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यह आंदोलन केवल पार्टी का नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के अस्तित्व की लड़ाई है।

नए कानून के खिलाफ विपक्ष की मांगें

विपक्षी दलों ने सरकार से मांग की है कि ‘विकसित भारत–रोजगार आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम’ को वापस लिया जाए। मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में बहाल किया जाए। काम करने के अधिकार और पंचायतों की शक्तियां बरकरार रखी जाएं। इसे एक अधिकार-आधारित कानून के रूप में लागू किया जाए। कांग्रेस का कहना है कि अगर सरकार ने मांगें नहीं मानीं, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

श्रमिकों की भागीदारी से बढ़ा आंदोलन का स्वर

सम्मेलन में शामिल मजदूरों ने अपने अनुभव साझा किए और कहा कि मनरेगा ने उन्हें संकट के समय गांव में ही रोजगार दिया। कई मजदूरों ने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में काम के दिन घटाए गए, भुगतान में देरी हुई। स्थानीय स्तर पर फैसलों का अधिकार छीना गया, कांग्रेस नेताओं ने भरोसा दिलाया कि पार्टी मजदूरों की आवाज को संसद तक पहुंचाएगी।

चुनाव से पहले गरमाएगा मुद्दा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मनरेगा का मुद्दा आने वाले समय में बड़ा सियासी मुद्दा बन सकता है। ग्रामीण भारत में इसकी व्यापक पहुंच और चुनावी प्रभाव को देखते हुए कांग्रेस इसे केंद्र सरकार के खिलाफ मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। राहुल गांधी के आक्रामक तेवर और खड़गे के संसद में संघर्ष के ऐलान से साफ है कि कांग्रेस इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है।

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