फिल्म रिव्यु पंगा
एक महिला जब तक लड़की होती है उसके सपने अलग होते है, लेकिन वहीँ लड़की जब पत्नी और माँ बन जाती है तो उसके सपने कहीं खो जाते है वो अपनी पहचान तक को भूलकर घर परिवार का ख्याल रखती है और उसके लिए उसकी परिवार
एक महिला जब तक लड़की होती है उसके सपने अलग होते है, लेकिन वहीँ लड़की जब पत्नी और माँ बन जाती है तो उसके सपने कहीं खो जाते है वो अपनी पहचान तक को भूलकर घर परिवार का ख्याल रखती है और उसके लिए उसकी परिवार की ज़रूरत सबसे ऊपर हो जाती है, यानि एक भारतीय महिला के सारे सपने सिमट जाते है,लेकिन आत्ममंथन किया जाए तो क्या औरत की पहचान उसके परिवार से है ? उसकी अपनी कोई ख्वाहिश, अपने कोई सपने या अपनी कोई उड़ान नहीं है यही दिखाती है निर्देशक अश्वनी अय्यर तिवारी की फिल्म 'पंगा', जिसमें है कंगना रनौत जिन्होंने जबसे फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा है तभी से वो पंगा लिए जा रही है हर किसी से। यह फिल्म कंगना रनौत पर फिट बैठती है क्योंकि उन्होंने जो पहचान बनाई है वो किसी से छुपी हुई नहीं है। पंगा के साथ रिलीज़ हुई है
कलाकार - कंगना रनौत, जस्सी गिल, रिचा चड्ढा, नीना गुप्ता और यज्ञ भसीन
कहानी - सबसे पहले बात करते है फिल्म 'पंगा' की, इस फिल्म में वुमन पावर को दिखाने की कोशिश की गयी है और एक औरत के सपनों को पुनर्जीवित करने के लिए जो जद्दोजेहद होती है वो इस फिल्म में दिखाई गयी है। जया निगम यानि कंगना रनौत जोकि कबड्डी की नेशनल प्लेयर और कैप्टन रह चुकी है, वो चाहती है की दुनियां उसे पहचाने और वो इस खेल को आगे तक लेकर जाए, मगर उसकी शादी प्रशांत यानि जस्सी गिल से हो जाती है और अब उसका सात साल का बेटा आदि यानि यज्ञ भसीन है, वो अपनी इस छोटी सी दुनियां में खुश है लेकिम कहीं कहीं उसको अपने सपने कचोटते है वो अपने पति से कहती है की तुम सबको देखकर में खुश हूँ लेकिन मैं चाहकर भी खुद को खुश नहीं रख पाती। कबड्डी की नेशनल प्लेयर होने के कारण उसे रेलवे में नौकरी मिली हुई है जिसके कारण वो अपने परिवार को अच्छे से चला रही है। कभी कभी उसे बड़ा अजीब लगता है की नेशनल प्लेयर होने बावजूद लोग उसे नहीं पहचानते, इसी बीच घर में कुछ ऐसी बात हो जाती है जिसकी वजह से उसका बेटा आदि उसे कबड्डी में दोबारा खेलने के लिए कहता है। 32 साल की जया सिर्फ अपने बेटे की ख़ुशी के लिए प्रशांत के साथ मिलकर प्रैक्टिस शुरू कर देती है। लेकिन यह प्रैक्टिस उसके सपने को दोबारा जगाने लगती है इसीलिए वो दोबारा कबड्डी की नेशनल टीम में कमबैक करती है, जिसमें उसका बेटा और पति तो साथ है ही साथ है उसकी माँ नीना गुप्ता और उसकी बेस्ट फ्रेंड मीनू यानि ऋचा चड्ढा, मीनू जोकि उसके साथ प्लेयर भी रही है और अब कबड्डी टीम की कोच भी है, वो उसका पूरा सहयोग देते है और आगे बढ़ने के लिए बढ़ावा देते है। यहाँ परेशानी आती है जया को क्योंकि टीम में अब सब यंग और नए बच्चे है, उनके साथ तालमेल बैठा पाना बड़ी बात है फिर क्या होता है यह तो फिल्म देखकर ही पता चलेगा,वो अपनी पहचान और स्वप्न को किस तरह पूरा करती है।
निर्देशन - निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी का मानना है की एक औरत की अपनी ज़िन्दगी होती है और अपनी एक चॉइस होती है जिसके साथ उसको पंगा लेने का पूरा अधिकार है और यही इस फिल्म में मैंने दिखाने की कोशिश की है। कंगना मेरी पहली और आखिरी चॉइस थी इस फिल्म के लिए और उन्होंने अपने किरदार को बहुत ख़ूबसूरती से निभाया है। फिल्म के संवाद भी अविनाश और निखिल मल्होत्रा ने लिखे है जो काफी प्रभावी है जो आपके मानसपटल पर अंकित हो जाते है।
एक्टिंग - जहाँ तक अदाकारी की बात है तो यह पूरी फिल्म कंगना के कंधो पर है जिन्होंने छोटे से शहर भोपाल में रहने वाली एक कामकाजी महिला के किरदार को बहुत ख़ूबसूरती से निभाया है और फिल्म देखकर यह कहना गलत नहीं होगा की यह फिल्म कंगना के लिए ही बनी थी, उनकी बॉडी लैंग्वेज और उनके इमोशनल सीन या उनके अंदर की टीस को उन्होंने जिस तरह पर्दे पर उतारा है फिल्म देखते वक़्त दर्शकों की आँखे नम हो जाएंगी। जस्सी गिल ने भी अपने किरदार को बहुत अच्छे से जिया है और वहीँ उनका बेटा बने यज्ञ भसीन ने भी दर्शको के दिल में प्यारी सी जगह बनाई है तो नीना गुप्ता भी फिल्म में अपनी मौजूदगी दर्ज कर जाती है छोटे से किरदार में। अगर आपके पास वक़्त नहीं है तो भी वक़्त निकालकर इस फिल्म को ज़रूर देखें।
फिल्म समीक्षक
सुनील पाराशर