हिमंत का बड़ा दावा, सोनिया गांधी ने 2014 में शपथ की तारीख तय करने को कहा था, राहुल के फोन से पलट गई बाजी

साल 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने असम में सत्ता बरकरार रखी थी और तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने रहे। लेकिन चुनाव के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की खबरें सामने आने लगीं। कांग्रेस के कई विधायकों का मानना था कि लंबे समय से मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई की जगह नए नेतृत्व को मौका दिया जाना चाहिए।

Update: 2026-02-17 10:24 GMT
गुवाहाटी। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने एक अहम राजनीतिक खुलासा करते हुए दावा किया है कि वर्ष 2014 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वयं उन्हें असम का मुख्यमंत्री बनने के लिए शपथ ग्रहण की तारीख तय करने को कहा था। सरमा के मुताबिक, उस समय राज्य के 58 कांग्रेस विधायक उनके समर्थन में थे और वे मुख्यमंत्री पद संभालने की स्थिति में थे। हालांकि, उनके अनुसार घटनाक्रम अचानक बदला और अंततः उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। यह बयान असम की राजनीति के उस दौर की अंदरूनी उठापटक पर नई रोशनी डालता है।

2011 के बाद कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी खींचतान

पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। साल 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने असम में सत्ता बरकरार रखी थी और तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने रहे। लेकिन चुनाव के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की खबरें सामने आने लगीं। कांग्रेस के कई विधायकों का मानना था कि लंबे समय से मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई की जगह नए नेतृत्व को मौका दिया जाना चाहिए। उस समय हिमंत बिस्व सरमा राज्य सरकार में एक प्रभावशाली मंत्री थे और संगठन व प्रशासन दोनों पर उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी। सरमा का दावा है कि अधिकांश विधायक उनके साथ थे और नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में थे। उनके मुताबिक, पार्टी के भीतर बहुमत समर्थन होने के कारण वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार बन चुके थे।

“शपथ की तारीख तय कर लीजिए”

हिमंत बिस्व सरमा ने कहा है कि उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उनसे कहा था कि वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की तारीख तय कर लें। सरमा के अनुसार, उन्होंने मन बना लिया था कि जून 2014 में कामाख्या मंदिर के अंबुबाची मेले के बाद शपथ ग्रहण करेंगे। उन्होंने इसे शुभ समय मानते हुए तैयारी भी शुरू कर दी थी। यह दावा उस समय के राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ सकता है, क्योंकि सार्वजनिक रूप से उस दौर में नेतृत्व परिवर्तन की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई थी।

राहुल गांधी की दखल से बदला समीकरण?

सीएम सरमा का कहना है कि घटनाक्रम अचानक बदल गया। उनके अनुसार, उस समय राहुल गांधी अमेरिका में थे और वहीं से उन्होंने कांग्रेस नेताओं से संपर्क किया। सरमा का आरोप है कि इसके बाद पार्टी के भीतर माहौल पूरी तरह बदल गया और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया और तरुण गोगोई ही पद पर बने रहे। हालांकि, कांग्रेस की ओर से इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। पार्टी के कई नेताओं का मानना है कि उस समय नेतृत्व परिवर्तन का कोई औपचारिक निर्णय नहीं हुआ था।

2015 में कांग्रेस से इस्तीफा, भाजपा में शामिल

इस घटनाक्रम के बाद हिमंत बिस्व सरमा और कांग्रेस नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ती गई। अंततः वर्ष 2015 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। भाजपा में शामिल होने के बाद सरमा ने असम और पूर्वोत्तर की राजनीति में अहम भूमिका निभाई। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहली बार असम में सरकार बनाई। उस जीत के पीछे सरमा की रणनीतिक भूमिका को निर्णायक माना गया। उन्होंने न केवल असम में बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में भाजपा के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सरमा का कांग्रेस से भाजपा में जाना असम की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

2021 में बने मुख्यमंत्री

भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल में सरमा ने वित्त, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दोबारा जीत दर्ज की। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने उन्हें असम का मुख्यमंत्री नियुक्त किया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सुधार, बुनियादी ढांचे के विकास और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई है। वे अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों पर भी मुखर रहते हैं और पार्टी के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में गिने जाते हैं।“उस वक्त दुख हुआ था, अब लगता है अच्छा हुआ”

हिमंत बिस्व सरमा ने अपने ताजा बयान में स्वीकार किया कि 2014 में मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर उन्हें दुख हुआ था। लेकिन अब वे मानते हैं कि जो हुआ, वह उनके राजनीतिक जीवन के लिए बेहतर साबित हुआ। उनका कहना है कि भाजपा में आने के बाद उन्हें असम और सनातन धर्म की सेवा करने का अवसर मिला, जिसे वे अपने जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि वे कभी आत्मकथा या किताब लिखेंगे तो उस समय के पूरे घटनाक्रम का विस्तार से खुलासा करेंगे।

राजनीतिक मायने क्या?

सरमा का यह दावा ऐसे समय आया है जब देश में राजनीतिक बयानबाजी तेज है और अतीत के घटनाक्रमों को लेकर नए-नए खुलासे सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान न केवल असम कांग्रेस के पुराने नेतृत्व विवाद को फिर से चर्चा में लाता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि यह सरमा का व्यक्तिगत पक्ष है और कांग्रेस की ओर से आधिकारिक पुष्टि या खंडन अभी तक सामने नहीं आया है।

अहम अध्याय

हिमंत बिस्व सरमा का दावा असम की राजनीति के एक अहम अध्याय को फिर से चर्चा में ले आया है। 2014 में मुख्यमंत्री बनने से चूकने की कहानी, 2015 में कांग्रेस से विदाई और भाजपा में नई पारी—इन सबने मिलकर उनके राजनीतिक सफर को नई दिशा दी। अब जब वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं, तो अतीत की घटनाओं को लेकर उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में बहस का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में यदि वे इस पर विस्तृत खुलासा करते हैं, तो असम की राजनीति के कई अनछुए पहलू सामने आ सकते हैं।

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