आईपीसीसी की जलवायु संबंधी रिपोर्टों पर तीन साल से जारी है वाद-विवाद

जलवायु परिवर्तन, अप्रत्याशित और गंभीर नतीजे दिखा रहा है. लेकिन नीति निर्माताओं के पास इससे जुड़ी बासी रिपोर्टें हैं.;

Update: 2026-10-09 11:35 GMT

जलवायु परिवर्तन, हर साल अप्रत्याशित और गंभीर नतीजे दिखा रहा है. लेकिन नीति निर्माताओं के पास इससे जुड़ी बासी रिपोर्टें हैं. नई रिपोर्टें, देशों की खींचतान के कारण नहीं आ पा रही हैं.

जलवायु परिवर्तन पर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संस्था, आईपीसीसी (IPCC) को आमतौर पर अपनी रिपोर्टों की समयसीमा तय करने में कुछ मिनट लगते हैं. लेकिन इस बार लगभग तीन साल की चर्चा के बाद भी सदस्य देश इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि अगली वैश्विक जलवायु समीक्षा रिपोर्ट कब प्रकाशित की जाए.

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आईपीसीसी की रिपोर्टें बीते तीन दशकों से संयुक्त राष्ट्र के लगभग हर बड़े जलवायु समझौते की वैज्ञानिक नींव रही हैं. लेकिन अब समयसीमा पर पैदा हुआ गतिरोध ये आशंका पैदा कर रहा है कि 2028 की अहम जलवायु वार्ता से पहले नई वैज्ञानिक रिपोर्टें उपलब्ध नहीं होंगी. समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने यह दावा आईपीसी के कई वर्तमान व पूर्व अधिकारियों, सरकारी वार्ताकारों और पर्यवेक्षकों से इंटरव्यू करने के बाद किया है.

जलवायु वार्ता के लिए क्यों अहम मानी जाती हैं ये रिपोर्टें

12 अक्टूबर से इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा में आईपीसीसी के 195 सदस्य देशों की बैठक होने जा रही है. कई विशेषज्ञों को लगता है कि 2028 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन से पहले रिपोर्टों की समयसीमा तय करने पर शायद इसमें सहमति बन सके. 2028 में सदस्य देशों की सरकारें 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों की समीक्षा करेंगी. इन्हीं चर्चाओं के आधार पर जलवायु फाइनेंसिंग, उत्सर्जन कटौती और भविष्य की नीतियों पर फैसले किए जाएंगे.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम बार बार चेतावनी दे चुका है कि मौजूदा कोशिशें वैश्विक तापमान वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए काफी नहीं हैं. दुनिया भर में बढ़ती तपिश को रोकने के लिए तेजी के साथ बड़े स्तर पर उत्सर्जन में कटौती करने की जरूरत है. जलवायु वैज्ञानिकों का दावा है कि यूरोप में विकराल होती जंगलों की आग और नेपाल-तिब्बत में आई भीषण बाढ़ में जलवायु परिवर्तन ने अहम भूमिका निभाई है. दुनिया कई कई हिस्सों में चरम मौसमी बदलाव महसूस किए जा रहे हैं.

आईपीसीसी के भीतर विवाद की जड़ कहां है?

असल में आईपीसीसी को तीन अहम रिपोर्टें जारी करनी है. इनमें जलवायु परिवर्तन के कारणों और उसके वैज्ञानिक प्रमाणों की रिपोर्ट, देशों की संवेदनशीलता और अनुकूलन क्षमता पर रिपोर्ट और तापमान वृद्धि को रोकने के उपायों पर रिपोर्टें शामिल हैं. रिपोर्टों की तैयारी कर रहे वैज्ञानिक चाहते हैं कि तीनों रिपोर्टें सितंबर 2028 तक तैयार हो जाएं.

लेकिन भारत, चीन, सऊदी अरब, रूस और केन्या सहित कुछ देश चाहते हैं कि कम से कम दूसरी और तीसरी रिपोर्ट 2029 तक टाल दी जाए. इन देशों का तर्क है कि विकासशील देशों के वैज्ञानिकों को पर्याप्त समय नहीं मिलता. उनके पास शोध प्रकाशित करने और आईपीसीसी की लंबी समीक्षा प्रक्रिया में शामिल होने के लिए सीमित संसाधन होते हैं. केन्या का प्रतिनिधित्व करने वाली जलवायु वैज्ञानिक जॉयस किमुताई के मुताबिक, यदि प्रक्रिया बहुत तेजी से चलेगी तो वह समावेशी नहीं रह जाएगी.

विकास पर हो रही राजनीति एक बड़ी वजह

कई वैज्ञानिकों और पर्यवेक्षकों का कहना है कि विवाद सिर्फ वैज्ञानिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी है. कुछ देशों का आरोप है कि बड़े तेल उत्पादक देश अधिक समय मांगकर कार्बन उत्सर्जन कम करने के दबाव को टालना चाहते हैं. स्वीडन की आईपीसीसी संपादक लीजा शिपर कहती हैं, "सबसे बड़ा मुद्दा राजनीति है." उनके मुताबिक कुछ देश समयसीमा पर बहस को देरी कराने के लिए रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

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रूस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि देरी को तेल उत्पादक देशों के मत्थे मढ़ना, तथ्यों का गलत आकलन है. विकासशील देश लंबे समय से कहते रहे हैं कि आईपीसीसी की रिपोर्टों में उनके दृष्टिकोण को पर्याप्त जगह नहीं मिलती.

एशिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था भारत का कहना है कि जिन विकसित देशों ने सदियों तक जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल करके आर्थिक विकास किया, उन्हें उत्सर्जन में सबसे बड़ी कटौती करनी चाहिए. भारतीय वैज्ञानिक त्यागराजन जयरमण के मुताबिक, समानता और समावेश जैसे मुद्दों को अक्सर इस बहस में समुचित महत्व नहीं दिया जाता है.

कई विकसित देश चाहते हैं कि भारत और चीन जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी उत्सर्जन में व्यापक कटौती करें, क्योंकि वे अब दुनिया के सबसे बड़े उत्सर्जकों में शामिल हैं.

रिपोर्टें समय पर प्रकाशित नहीं हुईं तो क्या होगा?

कई विशेषज्ञों को चिंता है कि अगर नई रिपोर्टें 2028 तक तैयार नहीं हुईं तो नीति निर्माता 2021-22 में प्रकाशित पुरानी रिपोर्टों के भरोसे रहेंगे. लेकिन इस बीच दुनिया काफी बदल चुकी है. 2024 में पहली बार वैश्विक औसत तापमान, औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा.

ताजा रिपोर्टों से यह समझने में मदद मिलेगी कि 1.5 डिग्री की सीमा पार होने के क्या नतीजे हो सकते हैं. साथ ही इन रिपोर्टों से यह भी पता चल सकेगा कि वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने जैसी तकनीकों का असर किस तरह का है.

अदीस अबाबा में होने वाली बैठक को जलवायु विज्ञान और वैश्विक राजनीति, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अगर वहां रिपोर्टों के प्रकाशन पर सहमति नहीं बनी, तो 2028 की जलवायु वार्ता, बासी जानकारी के आधार पर बदल चुकी जलवायु के लिए नीतियां बनाने पर बाध्य होगी.

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