सदी का सबसे ताकतवर अल नीनो दे रहा है दस्तक
इस साल बहुत ही ताकतवर ‘अल नीनो’ मौसम चक्र की चेतावनी मिली है. इसका मतलब है कि हमें सूखे, बाढ़ और भीषण गर्मी जैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है. क्या हम इस बुरे दौर से निपटने के लिए खुद को पहले से तैयार कर सकते हैं;
इस साल बहुत ही ताकतवर ‘अल नीनो’ मौसम चक्र की चेतावनी मिली है. इसका मतलब है कि हमें सूखे, बाढ़ और भीषण गर्मी जैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है. क्या हम इस बुरे दौर से निपटने के लिए खुद को पहले से तैयार कर सकते हैं?
प्रशांत महासागर में तेजी से बन रही ताकतवर ‘अल नीनो' की परिस्थितियां आने वाले हफ्तों में वैश्विक जलवायु और मौसम चक्र को पूरी तरह प्रभावित कर सकती हैं. मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह इतिहास के अब तक के सबसे खतरनाक और बड़े अल नीनो में से एक हो सकता है. स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क, अल्बानी में मौसम और पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर पॉल राउंडी का कहना है, "इस बात की पूरी आशंका है कि यह पिछले 140 सालों का सबसे खतरनाक और सबसे ताकतवर अल नीनो हो सकता है.”
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) का मानना है कि बहुत जल्द अल नीनो के हालात बनने वाले हैं और यह कम से कम सर्दियों तक खिंचेगा. इसकी ताकत और समय को देखते हुए, ऐसी आशंका जताई जा रही है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी या भीषण गर्मी झेलनी पड़ेगी. यहां तक कि इससे कई देशों में खाने-पीने के सामान और पानी की भी किल्लत हो सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने कहा, "दुनिया को इसे जलवायु से जुड़ी एक जरूरी चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए. अल नीनो के ये हालात पहले से ही तप रही दुनिया की आग में घी डालने का काम करेंगे.”
अल नीनो है क्या?
अल नीनो कुदरती तौर पर होने वाला ऐसा जलवायु चक्र है जो हर दो से सात साल में अपने आप उभरता है. इसकी शुरुआत तब होती है जब उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाली ट्रेड विंड कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे प्रशांत महासागर में गर्म पानी जमा होने लगता है. हालांकि, गर्म होने वाले पानी का यह इलाका लगभग अमेरिका के बराबर होता है और यह सिर्फ एक ही क्षेत्र में होता है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया में महसूस किया जा सकता है.
पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाले ला नीना और अल नीनो क्या हैं?
नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के डायरेक्टर गेविन श्मिट ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब उष्णकटिबंधीय इलाकों के वायुमंडल में बदलाव आता है, तो उसकी वजह से बहुत दूर मध्य-अक्षांश वाले क्षेत्रों का मौसम भी बदल जाता है. यही कारण है कि हम इस पर इतना ध्यान देते हैं, भले ही हम इस घटना से संभावित रूप से हजारों-हजारों मील की दूरी पर क्यों न मौजूद हों.”
उन्होंने कहा, "इससे पूरी दुनिया में मौसम का एक ऐसा चेन रिएक्शन शुरू हो जाता है, जिसमें अल नीनो वायुमंडल का वह पहला ‘डोमिनो' साबित होता है, जो सबसे पहले गिरता है और बाकी सबको गिराता चला जाता है.”
जलवायु पर अल नीनो का कितना असर पड़ेगा?
इसका असर अलग-अलग इलाकों में बहुत अलग होता है. कुछ जगहों पर सूखा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है, तो कहीं बाढ़ आने का खतरा पैदा हो जाता है.
जिस साल अल नीनो की स्थिति बनती है उस साल मध्य अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई इलाके अक्सर ज्यादा गर्म और सूखे हो जाते हैं. इसकी वजह से पानी की जो किल्लत होती है, उसका सीधा असर खेती-बाड़ी, बिजली बनाने और पीने के पानी की आपूर्ति पर पड़ता है. होंडुरास की बात करें, तो वहां के अधिकारियों का अनुमान है कि करीब 75 नगर पालिकाओं को भीषण सूखे का सामना करना पड़ सकता है. यहां तक कि देश की राजधानी तेगुसिगाल्पा में तो अभी से पानी का आपातकाल घोषित कर दिया गया है.
दुनिया के दूसरे हिस्सों में हालात इसके उलट होते हैं. दक्षिण अमेरिका के प्रशांत तट के कुछ इलाकों में, अल नीनो की वजह से जबरदस्त बारिश और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है.
अल नीनो के बुरे नतीजे बारिश थमने या जलाशयों के सूखने के बहुत समय बाद तक पीछा नहीं छोड़ते. इसके कारण फसलें पूरी तरह बर्बाद हो जाती हैं और दुनिया को आर्थिक रूप से लाखों-करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ सकता है. उदाहरण के लिए, साल 2015-2016 में आए अल नीनो के दौरान फसलें इतनी खराब हुई थीं कि दुनिया भर के करोड़ों लोगों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया था और उन्हें मदद की जरूरत पड़ी थी.
जंगल की आग भी एक बड़ी चिंता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो से भीषण गर्मी और सूखे के हालात का खतरा बढ़ सकता है. इससे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और अमेजन के वर्षावनों में आग लगने की घटनाएं बढ़ सकती हैं.
आएगा तूफान और चक्रवातों का मौसम
उष्णकटिबंधीय तूफानों और चक्रवातों के आने में अल नीनो बहुत बड़ी भूमिका निभाता है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस साल अटलांटिक महासागर में आने वाले तूफानों का मौसम आम सालों के मुकाबले काफी शांत रहेगा. इसकी वजह यह है कि अल नीनो के हालात अटलांटिक के ऊपर तेज हवाओं की रफ्तार को बढ़ा देते हैं. इससे नए तूफानों का बनना और उनका खतरनाक रूप लेना बहुत मुश्किल हो जाता है.
मौसम वैज्ञानिक ब्रायन टैंग ने कहा, "मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का पानी अब गर्म होने लगा है. आमतौर पर जब अल नीनो का असर बढ़ता है, खासकर चक्रवातों के मौसम के दौरान, तो यह अटलांटिक महासागर में बादलों के बनने, बिजली कड़कने वाले तूफानों, बारिश और खतरनाक चक्रवातों को पैदा होने से रोकता है.
हालांकि, तूफानों की संख्या कम होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि खतरा टल गया है. एक बार जब कोई तूफान मजबूत होकर ‘हरीकेन' (महा-चक्रवात) का रूप ले लेता है, तो उसे रोकना या शांत करना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका मतलब यह है कि इस दौरान तूफान की इक्का-दुक्का स्थिति भी बनेगी, तो उससे भारी तबाही मच सकती है.
वहीं, प्रशांत महासागर की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है. वहां अल नीनो का असर एकदम उल्टा होता है, जो तूफानों को और ज्यादा हवा देता है. उन्हें बहुत ज्यादा ताकतवर और खतरनाक बना देता है. समुद्री जीव-जंतुओं और उनके पर्यावरण पर भी इस समय बहुत भारी दबाव है. अल नीनो की वजह से समुद्र का पानी गर्म होता है, जिससे मूंगे सफेद होकर मरने लगते हैं. इसे कोरल ब्लीचिंग भी कहा जाता है. यह उन रीफ के लिए एक और बड़ा झटका है जो जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार बढ़ने वाली गर्मी की मार से पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी हैं.
इसका सीधा असर खेती-बाड़ी पर भी पड़ रहा है. भारत में, आम की खेती करने वाले किसानों ने बताया है कि इस बार उनकी फसल में भारी गिरावट आई है. मौसम में आए अजीब और अचानक बदलावों की वजह से आम के पेड़ों पर बौर (फूल) आने और फल के बढ़ने का पूरा चक्र बिगड़ गया, जिससे न सिर्फ आम की सप्लाई कम हुई है, बल्कि किसानों की कमाई पर भी तगड़ी मार पड़ी है.
जलवायु परिवर्तन से कैसा रिश्ता है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बात का कोई साफ सबूत नहीं है कि जलवायु परिवर्तन खुद अल नीनो को और ज्यादा मजबूत या ताकतवर बना रहा है. लेकिन, जलवायु परिवर्तन इसके खतरनाक असर को कई गुना बढ़ा जरूर देता है. नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के सीनियर साइंटिस्ट माइकल मैकफैडेन ने कहा, "जलवायु परिवर्तन अल नीनो की वजह से पड़ने वाले एक भयंकर सूखे को भी बेहद विनाशकारी महा-सूखे में बदल सकता है.”
गर्म माहौल में ज्यादा नमी होती है. इससे बहुत ज्यादा बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है. ज्यादा तापमान मिट्टी को तेजी से सुखाकर सूखे की स्थिति को और गंभीर बना सकता है. चूंकि दुनिया का तापमान पहले से ही रिकॉर्ड स्तर के करीब है. इसलिए, अल-नीनो की वजह से तापमान आसानी से नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है.
क्या देश इससे निपटने की तैयारी कर सकते हैं?
अल नीनो का एक फायदा यह है कि यह बहुत धीरे-धीरे और कदम-दर-कदम आगे बढ़ता है. इसकी वजह से वैज्ञानिक कई महीने पहले से ही इस पर नजर रख सकते हैं और इसके आने का अंदाजा लगा सकते हैं.
वैज्ञानिक समुद्र के तापमान और मौसम की स्थितियों पर नजर रख सकते हैं, जिससे सरकारों और समुदायों को तैयारी करने का समय मिल जाता है. पहले से मिलने वाले अनुमानों की मदद से, सरकार और अधिकारी फसलों को बर्बाद होने से बचा सकते हैं, बाढ़ से निपटने की तैयारियों को मजबूत कर सकते हैं और समय से पहले चेतावनी देने वाले सिस्टम को और बेहतर बना सकते हैं.
मैकफैडेन ने बताया, "हमें पता है कि कहां बहुत ज्यादा बारिश होगी या कहां सूखा पड़ेगा. इन पूर्वानुमानों की मदद से, सबसे बुरे असर से बचाव के उपाय तैयार करने के लिए काफी समय मिल जाता है.