आखिर आत्महत्या क्यों कर रहे हैं भारत में विवाहित पुरुष
पारिवारिक कलह के साथ ही वित्तीय और सामाजिक दबाव के कारण भारत में आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की संख्या तेजी से बढ़ रही है;
पारिवारिक कलह के साथ ही वित्तीय और सामाजिक दबाव के कारण भारत में आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला पहलू सामने आया है.
एनसीआरबी की ओर से जारी 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024 (एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया)' शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या कर ली. वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुकाबले यह 0.4 फीसदी कम जरूर है. हालांकि इस दौरान शादीशुदी पुरुषों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है. इसकी वजह यह है कि ऐसी एक आत्महत्या सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे परिवार की बर्बादी होती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिवारिक कलह बढ़ती आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह (33.5 फीसदी) के तौर पर सामने आई है. इसके अलावा नशाखोरी, शादी संबंधित विवाद, दहेज, वित्तीय बदहाली और बेरोजगारी का स्थान है. छात्र-छात्राओं आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह परीक्षाओं में नाकाम रहना है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि आत्महत्या करने वाले शादीशुदा पुरुषों की तादाद लगातार बढ़ रही है. वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्या करने वालों में 67.5 फीसदी लोग विवाहित थे. पारिवारिक कारणों से विवाहित पुरुषों के आत्महत्या की बात जब सामने आती है तो कई बार उनकी पत्नियों की ओर उंगली उठती है. बीते सालों में दो तीन ऐसे मामले हुए जिसमें पत्नियों को जिम्मेदार बताया गया और ऐसे मामलों ने मीडिया की खूब सुर्खियां बटोरीं.
बढ़ते मामलों की वजह
हालांकि सवाल है कि क्या पारिवारिक कलह का मतलब सिर्फ पति-पत्नी विवाद है. महिला अधिकार कार्यकर्ता इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं. पश्चिम बंगाल राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लीना गांगुली डीडब्ल्यू से कहती हैं, "पारिवारिक कलह का दायरा व्यापक है. यह सिर्फ पति-पत्नी के बीच आपसी विवाद नहीं हैं. भाई-बहन, माता-पिता और रिश्तेदारों से विवाद भी पारिवारिक कलह के दायरे में आता है. ऐसे में शादीशुदा पुरुषों की आत्महत्या के लिए सिर्फ पत्नियों या महिलाओं को दोषी ठहराना उचित नहीं है."
उनका कहना है कि पुरुष शादी के बाद विभिन्न वजहों से मानसिक दबाव में रह सकते हैं. इसमें दफ्तर की राजनीति और नौकरी की दिक्कतों के अलावा आर्थिक मुश्किलों जैसे मुद्दे भी शामिल हैं.
कोलकाता की महिला अधिकार कार्यकर्ता सुष्मिता बारुई भी यही बात कहती हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "पारिवारिक कलह से होने वाली मौतों के लिए सीधे पत्नी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए. एनसीआरबी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा है. पारिवारिक कलह शब्द का दायरा बहुत बड़ा है. हमें तस्वीर के दूसरे पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए. देश में हर साल भारी तादाद में दहेज उत्पीड़न के कारण महिलाओं की मौत की खबरें भी आती हैं."
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सामाजिक स्थिति और कई अन्य वजहों से पुरुष ऐसी स्थिति में मन ही मन घुटते हुए मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है. महिलाओं के उलट ज्यादातर मामलों में किसी सहयोगी या परिजन से अपने मन की पीड़ा भी साझा नहीं कर पाता.
आत्महत्या पर कैसे लगे अंकुश?
मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में आत्महत्या एक मूक महामारी के तौर पर फैल रही है. लेकिन इस महामारी पर आखिर अंकुश कैसे लगाया जा सकता है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस संकट से निपटने के लिए व्यवहार में बदलाव के संकेतों को समय रहते पहचानने और मानसिक और भावनात्मक काउंसलिंग शुरू करने का सुझाव देते हैं.
उनका कहना है कि विवाहित पुरुष कई वजहों से ज्यादा संवेदनशील होते हैं. पुरुष पारंपरिक रूप से पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता या भावनात्मक समर्थन लेने में हिचकते हैं और मन ही मन घुटते रहते हैं. कोलकाता के मशहूर मनोचिकित्सक डा. अयन मुखर्जी ने डीडब्ल्यू से कहा, "पुरुष अमूमन अपनी मानसिक पीड़ा किसी और के सामने जाहिर नहीं करते. लंबे समय तक ऐसी स्थिति में रहने की वजह से वो मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं और किसी कमजोर पल में आत्महत्या का फैसला कर लेते हैं."
उनका कहना था कि ऐसी परिस्थिति के लिए सिर्फ दांपत्य जीवन के विवाद को दोष नहीं दिया जा सकता. एक पुरुष को जीवन में कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है. खासकर शादी के बाद उस पर जिम्मेदारियों का बोझ काफी बढ़ जाती है. ऐसे में मानसिक अवसाद की वजह कुछ भी हो सकती है. किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है.
कोलकाता के एक अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. मानसी घोष डीडब्ल्यू से कहती हैं, "कुछ मामलों में महिला सुरक्षा कानूनों के दुरुपयोग की आशंका भी पुरुष को आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है. लेकिन आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं के लिए यही अकेली या सबसे बड़ी वजह नहीं हो सकती."
मनोचिकित्सकों का कहना है कि विवाहित पुरुषों में अक्सर आत्महत्या से पहले कई संकेत मिलने लगते हैं. इनको समय रहते पहचान कर अवसाद के इलाज से इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है ताकि विभिन्न समस्याओं के कारण मानसिक अवसाद से जूझते पुरुष अपनी झिझक छोड़ कर समय रहते काउंसलिंग के लिए सामने आ सकें.