नई दिल्ली: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल को लेकर चल रही कानूनी चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अहम निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि नए पदाधिकारियों के चुनाव तक मिश्रा की भूमिका ‘प्रोटेम’ यानी अस्थायी मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि बीसीआई के पुनर्गठन तक मौजूदा व्यवस्था रोजमर्रा के कामकाज को संभाल सकती है, लेकिन कोई नीतिगत फैसला अटॉर्नी जनरल (AG) और सॉलिसिटर जनरल (SG) की सक्रिय भागीदारी के बिना नहीं लिया जाएगा। यह आदेश मनन कुमार मिश्रा के लंबे कार्यकाल की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया।
नए प्रतिनिधियों के चुनाव का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नवगठित राज्य बार काउंसिलों को अपनी को-आप्शन प्रक्रिया पूरी करनी होगी और इसके बाद बीसीआई के लिए नए प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाएगा। अदालत के निर्देश के मुताबिक, नई राज्य बार काउंसिलें अपने गठन की अधिसूचना जारी होने के तीन सप्ताह के भीतर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अन्य पदाधिकारियों और बीसीआई के एक प्रतिनिधि का चुनाव करेंगी। इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद बीसीआई के पुनर्गठन का रास्ता साफ होगा। मामले में अगली सुनवाई 23 सितंबर को होगी।
पांच साल के कार्यकाल पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान सबसे अहम मुद्दा बीसीआई की ओर से वर्ष 2025 में जारी अधिसूचनाओं का रहा। इन अधिसूचनाओं के जरिये अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा और उपाध्यक्ष एस. प्रभाकरण के कार्यकाल को पांच साल तक बढ़ाने की बात सामने आई थी। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि बीसीआई के नियम 12(2) में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल दो साल निर्धारित है। उनके मुताबिक, 9 जनवरी 2025 को पारित एक प्रस्ताव के जरिए दोनों पदों का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पांच साल कर दिया गया। याचिका के अनुसार, मनन कुमार मिश्रा का मौजूदा कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से 16 अप्रैल 2030 तक बताया गया है। इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि जब नियमों में दो साल का कार्यकाल निर्धारित है तो उसे इस तरह बढ़ाने का कानूनी आधार क्या है।
ट्रस्ट के गठन पर भी अदालत की नजर
सुनवाई के दौरान वकील गोपाल शंकरनारायण ने बीसीआई से जुड़े एक नवगठित ट्रस्ट का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि ट्रस्ट में 11 स्थायी मैनेजिंग ट्रस्टी बनाए गए हैं, जिनमें बीसीआई के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं। इस दौरान बीसीआई की संपत्ति और आय को ट्रस्ट में स्थानांतरित किए जाने का आरोप भी सामने आया। अदालत ने इस पर सवाल किया कि जब बीसीआई एक वैधानिक संस्था है तो निर्वाचित पदाधिकारी अपने कार्यकाल से परे खुद को स्थायी ट्रस्टी कैसे बना सकते हैं।
नालसर विवाद के बाद फिर चर्चा में बीसीआई
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश ऐसे समय आया है जब हाल ही में नालसर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के छात्रों से जुड़े विवाद में बीसीआई की भूमिका पर अदालत ने सवाल उठाए थे। विवाद छात्रों के दीक्षा समारोह से जुड़ा था। छात्रों द्वारा प्रधान न्यायाधीश को समारोह में आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताने के बाद बीसीआई की ओर से राज्य बार काउंसिलों को छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश दिया गया था। बाद में बीसीआई ने नामांकन पर लगाई गई रोक वापस ले ली और छात्रों के खिलाफ कार्रवाई भी बंद कर दी। इसके बाद मनन कुमार मिश्रा ने अपने शब्दों या बीसीआई की कार्रवाई से छात्रों को हुई परेशानी के लिए माफी मांगी थी।
लंबे समय से अध्यक्ष पद पर रहे हैं मिश्रा
याचिका में मनन कुमार मिश्रा के बीसीआई अध्यक्ष के तौर पर लंबे कार्यकाल पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका के मुताबिक, मिश्रा पहली बार 2012 तक के लिए बीसीआई अध्यक्ष चुने गए थे। हालांकि, 2014 में उन्होंने कुछ समय के लिए पद छोड़ा, लेकिन उसी साल नवंबर में दोबारा अध्यक्ष बन गए और तब से इस पद पर बने हुए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद बीसीआई में नए प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों के चुनाव की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है। 23 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत इस मामले से जुड़े अन्य कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर आगे विचार कर सकती है।