सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी तुरंत लागू नहीं कर पाएगी सरकार: OBC क्रीमी लेयर का पूरा विवाद क्या है?

24 सितंबर को केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत के समक्ष कहा कि फैसले को लागू करने के लिए सरकार को कम से कम दो साल का समय दिया जाना चाहिए। सरकार का तर्क है कि फैसले को तत्काल पिछली या वर्तमान भर्ती प्रक्रियाओं पर लागू करने से कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।;

Update: 2026-09-25 10:43 GMT

नई दिल्ली: OBC क्रीमी लेयर के निर्धारण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने को लेकर केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत का रुख किया है। केंद्र ने अदालत से अनुरोध किया है कि 11 मार्च 2026 के फैसले को भविष्य की तारीख से लागू किया जाए, ताकि पहले से चल रही और पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं पर इसका तत्काल प्रभाव न पड़े। सरकार ने इसे लागू करने के लिए दो साल या उससे अधिक का समय देने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र की इस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। मामले में अदालत अब यह देखेगी कि फैसले को किस तरीके और किस समयसीमा के साथ लागू किया जाए।

11 मार्च के फैसले में क्या कहा गया था?

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को Union of India बनाम रोहित नाथन मामले में OBC क्रीमी लेयर से जुड़े महत्वपूर्ण पहलू पर फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि PSU या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की केवल सैलरी के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उनका बच्चा OBC क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में माता-पिता के पद, सामाजिक स्थिति और अन्य प्रासंगिक मानदंडों पर भी विचार करना जरूरी है। यानी आय को अकेले आधार बनाकर किसी उम्मीदवार को OBC आरक्षण के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता।

UPSC उम्मीदवारों को मिली थी राहत

यह मामला उन UPSC उम्मीदवारों से जुड़ा था, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल की थी, लेकिन उनके माता-पिता की आय को आधार बनाकर उन्हें OBC क्रीमी लेयर में रख दिया गया था। इसके कारण उन्हें नियुक्ति का लाभ नहीं मिल सका। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत अभिभावकों के मामले में उनके पद की सरकारी सेवा में समकक्षता यानी ‘पोस्ट इक्विवेलेंस’ का पहलू भी देखा जाना चाहिए। अदालत ने केवल वेतन को आधार बनाने की प्रक्रिया को उचित नहीं माना।

केंद्र ने क्यों मांगा दो साल का समय?

24 सितंबर को केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत के समक्ष कहा कि फैसले को लागू करने के लिए सरकार को कम से कम दो साल का समय दिया जाना चाहिए। सरकार का तर्क है कि फैसले को तत्काल पिछली या वर्तमान भर्ती प्रक्रियाओं पर लागू करने से कई व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। विशेष रूप से उम्मीदवारों की नियुक्ति, वरिष्ठता और कैडर आवंटन प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। केंद्र के मुताबिक, ऐसी भर्ती प्रक्रियाओं में कई ऐसे उम्मीदवार भी शामिल हैं जो मूल मुकदमे में पक्षकार नहीं थे। इसलिए फैसले को तुरंत पूर्वव्यापी तरीके से लागू करने से उनके अधिकारों और नियुक्ति की स्थिति पर असर पड़ सकता है।

हाई कोर्ट में भी लंबित हैं मामले

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि फैसले से संबंधित याचिकाएं अलग-अलग हाई कोर्ट में दाखिल की गई हैं। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष केंद्र ने इस स्थिति का उल्लेख किया। केंद्र सरकार ने विभिन्न हाई कोर्ट में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट या किसी एक हाई कोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए भी याचिका दायर की है। सरकार का उद्देश्य इस मुद्दे पर अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग प्रक्रियाओं और संभावित विरोधाभासी आदेशों की स्थिति से बचना है।

फैसले को भविष्य से लागू करने की मांग

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से 11 मार्च के फैसले को सीमित दायरे में और भविष्य की तारीख से लागू करने का अनुरोध किया है। सरकार का कहना है कि इससे मौजूदा भर्ती प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक समय मिल सकेगा और पहले से चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति तथा वरिष्ठता जैसी व्यवस्थाओं में अचानक बदलाव नहीं करना पड़ेगा। अब शीर्ष अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि उसके मार्च के फैसले को किस समय से प्रभावी माना जाए और पहले से चल रही भर्ती प्रक्रियाओं पर उसका क्या असर होगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट के आगे के आदेश से केंद्र और विभिन्न भर्ती एजेंसियों के लिए स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।

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