सरोगेसी पर मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, इस वर्ष की महिला मानी जाएगी पात्र

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि 50 वर्ष की महिला, जब तक वह 51 वर्ष की नहीं हो जाती, सरोगेसी के लिए पात्र मानी जाएगी। कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश रद्द करते हुए सरोगेसी कानून की उद्देश्यपरक व्याख्या पर जोर दिया।;

Update: 2026-06-29 06:34 GMT

नई दिल्ली: सरोगेसी से जुड़े मामलों में मद्रास हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि 50 वर्ष की आयु पूरी कर चुकी महिला केवल इस आधार पर सरोगेसी के लिए अपात्र नहीं मानी जा सकती। अदालत ने कहा कि जब तक महिला 51 वर्ष की नहीं हो जाती, तब तक उसे 50 वर्ष की आयु श्रेणी में ही माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरोगेसी (रेगुलेशन) अधिनियम, 2021 की व्याख्या उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए, न कि अत्यधिक तकनीकी आधार पर। यह फैसला उन दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो उम्र संबंधी प्रावधानों को लेकर असमंजस में रहते हैं। साथ ही, यह भविष्य में सरोगेसी कानून की व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।

निचली अदालत का आदेश हाई कोर्ट ने किया रद्द

यह फैसला न्यायमूर्ति शमीम अहमद ने 25 जून को नंदिनी देवी की याचिका पर सुनाया। हाई कोर्ट ने उस निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला की आयु 50 वर्ष 9 महीने होने के आधार पर उसे सरोगेसी के लिए अयोग्य ठहराया गया था। हाई कोर्ट ने कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकरण पहले ही महिला को पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर चुका था। ऐसे में मजिस्ट्रेट के लिए उस पात्रता पर दोबारा सवाल उठाना उचित नहीं था।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु के नमक्कल जिले के एक दंपती से जुड़ा है। दोनों की शादी वर्ष 2005 में हुई थी और 2008 में उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ। नवंबर 2024 में हृदयाघात के कारण बेटे की मृत्यु हो गई। इसके बाद दंपती ने दोबारा संतान प्राप्त करने का निर्णय लिया। हालांकि, चिकित्सकीय कारणों से महिला का गर्भाशय पहले ही निकाला जा चुका था, जिसके कारण वह प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर सकती थीं। ऐसे में उन्होंने सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के तहत सरोगेसी का विकल्प चुना। संबंधित प्राधिकरण ने उन्हें पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर दिया था और परिवार की एक रिश्तेदार महिला सरोगेट मां बनने के लिए भी तैयार हो गई थी।

किन आधारों पर याचिका हुई थी खारिज?

निचली अदालत ने दंपती की याचिका दो कारणों से खारिज कर दी थी। पहला, अदालत ने माना कि महिला की आयु 50 वर्ष 9 महीने होने के कारण वह निर्धारित आयु सीमा से बाहर है। दूसरा, सरोगेट मां के पति की गवाही रिकॉर्ड नहीं की गई थी। हाई कोर्ट ने दोनों आधारों को अस्वीकार करते हुए कहा कि ये कानून की सही व्याख्या नहीं हैं।

आयु सीमा की कोर्ट ने कैसे की व्याख्या?

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कानून में 23 से 50 वर्ष की आयु सीमा का अर्थ यह नहीं है कि महिला 50 वर्ष पूरा करते ही स्वतः अयोग्य हो जाएगी। अदालत के अनुसार, सामान्य कानूनी व्याख्या के तहत जब तक कोई महिला 51 वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेती, तब तक उसे 50 वर्ष की श्रेणी में ही माना जाएगा। इसलिए केवल 50 वर्ष 9 महीने की आयु के आधार पर पात्रता समाप्त नहीं की जा सकती।

मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कोर्ट ने दिए निर्देश

हाई कोर्ट ने सरोगेसी से जुड़े मामलों में मजिस्ट्रेट की भूमिका को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यदि सक्षम प्राधिकरण पहले ही पात्रता प्रमाणपत्र जारी कर चुका है, तो मजिस्ट्रेट उसके निर्णय की वैधता की समीक्षा नहीं कर सकता। इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि सरोगेट मां के पति की अलग से गवाही लेना कानून की अनिवार्य शर्त नहीं है, क्योंकि उसकी सहमति संबंधित दस्तावेजों में पहले से दर्ज रहती है।

सरोगेसी कानून का उद्देश्य बाधाएं खड़ी करना नहीं

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021 के उद्देश्य पर विशेष जोर दिया। अदालत ने कहा कि यह एक कल्याणकारी कानून (Beneficial Legislation) है, जिसका उद्देश्य भारत में सरोगेसी को कानूनी, नैतिक और सुरक्षित ढंग से विनियमित करना है। साथ ही, यह कानून उन दंपतियों को माता-पिता बनने का अवसर प्रदान करता है, जो चिकित्सकीय कारणों से प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्त नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में न्यायपालिका को कानून की भावना के अनुरूप निर्णय देना चाहिए। केवल तकनीकी कमियों या संकीर्ण व्याख्या के आधार पर किसी दंपती को माता-पिता बनने के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यह फैसला भविष्य में सरोगेसी से जुड़े मामलों में न्यायालयों और संबंधित अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

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