हरीश साल्वे ने विपक्ष के प्रदर्शन पर उठाए सवाल, बोले- सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक औजार बनाना सरासर मूर्खता

हरीश साल्वे ने कहा कि विपक्षी दल हर दिन सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने INDIA गठबंधन के मार्च और मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात के प्रयास पर भी आपत्ति जताई।;

Update: 2026-10-13 03:50 GMT

नई दिल्ली : भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे (Harish Salve) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शनों और विपक्षी नेताओं की मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात की कोशिश पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने विपक्ष के इस कदम को ‘सरासर मूर्खता’ करार देते हुए आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्य हासिल करने के लिए किया जा रहा है। साल्वे के मुताबिक, संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून और स्थापित न्यायिक प्रक्रियाओं के दायरे में रहकर किया जाना चाहिए।

'सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक औजार बनाने की कोशिश'

सोमवार को एक साक्षात्कार में हरीश साल्वे ने कहा कि विपक्षी दल हर दिन सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने INDIA गठबंधन के मार्च और मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात के प्रयास पर भी आपत्ति जताई। साल्वे ने कहा कि विपक्षी दलों में कई वरिष्ठ वकील हैं। ऐसे में उन्हें न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विपक्ष को यह नहीं बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश प्रत्येक मामले की व्यक्तिगत रूप से सुनवाई नहीं करते। उनके अनुसार, किसी मामले को जिस पीठ के सामने सुनवाई के लिए रखा जाता है, वही पीठ उस पर विचार करती है और फैसला सुनाती है। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय मांगने और फिर उनके मिलने से इनकार किए जाने को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाना न्यायिक व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया को गलत तरीके से पेश करने जैसा है।

न्यायपालिका कर रही है अपने कर्तव्य का निर्वहन

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि अदालतें मानवाधिकार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार कर रही हैं। उनके मुताबिक, अदालत का काम इन अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करना है। साल्वे ने न्यायपालिका के हालिया आदेश को संतुलित बताते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी गतिविधि गैरकानूनी तरीके से नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अपने 45 साल से अधिक के वकालत के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने पहले इस तरह मुख्य न्यायाधीश से मिलने के प्रयासों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते नहीं देखा। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दलों का रवैया ऐसा प्रतीत होता है, मानो उन्हें संवैधानिक संस्थाओं और स्थापित प्रक्रियाओं पर भरोसा नहीं है।

भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात की आशंका जताई

साल्वे ने विरोध के अधिकार के नाम पर भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसी राजनीतिक उथल-पुथल पैदा करने की कोशिशों की आशंका भी जताई। उन्होंने कहा कि फिलहाल उन्हें देश में व्यापक जन-विद्रोह के स्पष्ट संकेत नहीं दिखाई देते। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ विदेशी ताकतें विरोध प्रदर्शनों के जरिए अशांति फैलाने में भूमिका निभा सकती हैं। साल्वे ने सरकार से विदेशी वित्तपोषण से जुड़े आरोपों की जांच करने और सबूत मिलने पर उचित कार्रवाई करने की मांग की।

विदेशी ताकतों की भूमिका को लेकर किया दावा

साल्वे ने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके विचार में इन घटनाओं के पीछे बाहरी ताकतों की भूमिका रही है। उन्होंने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने का उदाहरण देते हुए भी विदेशी हस्तक्षेप की आशंका जताई। हालांकि, इन घटनाओं में विदेशी ताकतों की भूमिका और भारत में प्रदर्शन के लिए विदेशी धन उपलब्ध कराए जाने संबंधी उनके दावों के समर्थन में साक्ष्य इस बयान में प्रस्तुत नहीं किए गए। 

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन से बढ़ा राजनीतिक विवाद

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के विरोध और न्यायपालिका से हस्तक्षेप की मांग ने राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि साल्वे ने आंदोलन के तरीके और न्यायिक संस्थाओं को राजनीतिक विवाद में शामिल करने पर आपत्ति जताई है। इस पूरे विवाद में एक ओर विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है, तो दूसरी ओर संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका तथा न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा पर बहस हो रही है। आने वाले दिनों में विपक्ष की कानूनी रणनीति और सरकार की प्रतिक्रिया इस मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना सकती है।

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