आगरा : शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रिश्तों तथा संघ से राजनीति में गए नेताओं को लेकर कड़ा और बेबाक संदेश दिया। संघ के ब्रज क्षेत्र के पुनर्निर्मित कार्यालय ‘माधव भवन’ के लोकार्पण समारोह में संघ के शीर्ष पदाधिकारियों की मौजूदगी में उन्होंने कहा कि संघ से भाजपा में गए कई नेताओं को “हवा लग गई है” और वे जरूरत से ज्यादा उड़ने लगे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इसी तरह की प्रवृत्तियों के कारण संघ को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सवाल उठने लगे हैं।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब मंच पर आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल, अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल, आरएसएस कार्यकारिणी सदस्य डॉ. दिनेश और अखिल भारतीय गो संयोजक अजीत महापात्रा जैसे वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद थे। स्वामी राजराजेश्वराश्रम के इस तीखे संबोधन के दौरान मंच पर बैठे संघ नेताओं के चेहरे निर्विकार रहे और किसी तरह की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
‘हवा महल’ से जोड़कर दिया संदेश
लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने अपने वक्तव्य की शुरुआत प्रतीकात्मक अंदाज में की। उन्होंने कहा कि उनका ‘हवा महल’ से रिश्ता कभी टूटा नहीं है, क्योंकि जयपुर में उनका घर हवा महल के पास ही था। इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि माधव भवन में भी ऐसे झरोखे बनाए गए हैं, जिनसे हवा आती-जाती रहे। इसके बाद उन्होंने इसी ‘हवा’ के रूपक को संघ से भाजपा में गए नेताओं से जोड़ते हुए कहा, “संघ से भाजपा में गए कार्यकर्ताओं को भी हवा लग गई है। यह ठीक नहीं है।” उनके इस कथन को सत्ता के आसपास आने से पैदा होने वाले अहंकार और दूरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
संघ की साख पर अंतरराष्ट्रीय सवालों की बात
स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने कहा कि जब संघ से जुड़े लोग सत्ता में जाकर अपनी मर्यादा भूलने लगते हैं, तो इसका असर केवल संगठन तक सीमित नहीं रहता। उन्होंने कहा कि आज संघ जैसे बड़े सामाजिक संगठन पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रश्न उठने लगे हैं। उनके मुताबिक, संघ की पहचान अनुशासन, सेवा और समाज के प्रति समर्पण से रही है, लेकिन सत्ता के आकर्षण में आए कुछ लोग इस छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
साधु-संतों के राजनीति में आने पर कड़ी टिप्पणी
अपने संबोधन में स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने साधु-संतों के राजनीति में सक्रिय होने पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आजकल बाबाओं और संतों के चुनाव लड़ने का “फैशन” चल पड़ा है, जो उन्हें बेहद पीड़ा देता है। उन्होंने कहा, मुझे बैंक की लाइन में खड़े, रजिस्ट्री कराते और संसद या विधानसभा में बैठे साधुओं को देखकर अच्छा नहीं लगता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को चुनाव लड़ने के लिए अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है, तो फिर साधु-संत चुनाव लड़ते समय अपने भगवा वस्त्र क्यों नहीं उतारते। स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने साफ शब्दों में कहा कि अगर किसी साधु को राजनीति करनी है और चुनाव लड़ना है, तो उसे पहले अपना भगवा उतार देना चाहिए।
‘सत्ता समस्याओं की जड़ है’
स्वामी राजराजेश्वराश्रम ने सत्ता को समस्याओं की जड़ बताते हुए कहा कि सत्ता जोड़ने का काम नहीं करती, बल्कि तोड़ती है। उन्होंने कहा कि सत्ता का मोह इंसान को अंधा कर देता है और वह पागलों की तरह उसके पीछे दौड़ने लगता है। उनके अनुसार, साधु-संतों का मार्ग त्याग, सेवा और समाज को दिशा देने का है, न कि सत्ता की राजनीति में उलझने का।
संघ नेतृत्व की चुप्पी, बाद में आया संतुलित जवाब
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल ने अपने संबोधन में उनके विचारों और चिंताओं को संतुलित तरीके से समेटने की कोशिश की। डॉ. कृष्णगोपाल ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बड़े सामाजिक परिवर्तन के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज निर्माण है। उनके मुताबिक संघ के कार्यकर्ता समाज के हर क्षेत्र में जा रहे हैं और हिंदू धर्म, समाज और संस्कृति को सहेजते हुए मातृभूमि को गौरवशाली और वैभवशाली बनाना संघ का मूल लक्ष्य है।
माधव भवन को बताया बहुआयामी केंद्र
डॉ. कृष्णगोपाल ने माधव भवन के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह भवन केवल प्रचारकों के ठहरने का स्थान नहीं होगा, बल्कि इसे शिक्षा, शोध, स्वास्थ्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। उनके अनुसार, माधव भवन आने वाले समय में सामाजिक और वैचारिक गतिविधियों का अहम केंद्र बनेगा।
संघ–राजनीति रिश्तों पर फिर छिड़ी बहस
शारदा पीठाधीश्वर के इस खुले और सख्त संबोधन के बाद संघ और राजनीति के रिश्तों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। आरएसएस मंच से संघ से भाजपा में गए नेताओं और साधु-संतों की राजनीतिक भूमिका पर इस तरह की टिप्पणी को असाधारण माना जा रहा है। यह साफ है कि स्वामी राजराजेश्वराश्रम का संदेश केवल आलोचना नहीं, बल्कि आत्ममंथन और मर्यादा की याद दिलाने का प्रयास भी था।