नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग के कई फैसले चर्चा में हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने और दावे-आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर विवाद सामने आए हैं। पिछले करीब एक महीने में आयोग ने कुछ प्रक्रियाओं में बदलाव किए हैं और पात्र मतदाताओं को राहत देने के लिए कदम उठाए हैं। कहीं छूटे हुए नामों को शामिल करने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है, तो कहीं आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाने और अनावश्यक आपत्तियों पर अंकुश लगाने की व्यवस्था की गई है। इन घटनाक्रमों को आयोग की कार्यप्रणाली में लचीलेपन के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि हर बदलाव को पुराने फैसले की वापसी कहना उचित नहीं होगा।
दिल्ली में 33 लाख मामलों की जांच, 20 लाख का निपटारा
दिल्ली में SIR के दौरान मतदाता रिकॉर्ड में करीब 33 लाख विसंगतियों की पहचान की गई। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, इनमें से लगभग 20 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका है। इन मामलों में रिकॉर्ड से जुड़ी गड़बड़ियां और वर्ष 2002 की मतदाता सूची से नाम का मिलान नहीं होने जैसी समस्याएं शामिल थीं। शेष मामलों को सुलझाने के लिए अभियान जारी है। मतदाताओं की सहायता के लिए 18 और 25 अक्टूबर को विशेष शिविर आयोजित किए जाएंगे। आयोग ने कहा है कि पात्र मतदाता को सूची से बाहर नहीं रहने दिया जाएगा। नाम या रिकॉर्ड से जुड़ी परेशानी होने पर लोग बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) अथवा निर्वाचन अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में छूटे नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से छूटे पात्र लोगों के नाम शामिल कराने का मुद्दा महत्वपूर्ण बन गया है। नए मतदाताओं के नाम दर्ज करने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 के माध्यम से ऐसे लोग आवेदन कर सकते हैं, जो किसी कारण से सूची में शामिल नहीं हो पाए। भारत निर्वाचन आयोग के निर्देश पर राज्य के सभी 24 जिला निर्वाचन अधिकारियों ने विशेष अभियान शुरू किया है। इसके तहत अलग-अलग स्थानों पर शिविर लगाकर लोगों को नाम जांचने, आवेदन प्रक्रिया समझने और रिकॉर्ड से जुड़ी समस्याएं दूर करने में मदद दी जा रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित न रहे।
फॉर्म-6 के अतिरिक्त घोषणापत्र पर विवाद
फॉर्म-6 को लेकर विवाद उस समय बढ़ा, जब SIR के दौरान ऑनलाइन आवेदन के साथ अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया। इसमें पुरानी मतदाता सूची और परिवार के सदस्यों के नाम से संबंधित अतिरिक्त जानकारी मांगी जा रही थी। इस व्यवस्था पर सवाल उठने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 5 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 के संशोधित प्रारूप को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद आयोग ने कहा कि मूल फॉर्म-6 में बदलाव नहीं किया गया था, बल्कि SIR के लिए अलग घोषणापत्र जोड़ा गया था। विवाद के बाद जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, वहां ऑनलाइन पोर्टल से यह अतिरिक्त घोषणापत्र हटा दिया गया। इससे सामान्य आवेदन प्रक्रिया जारी रखने का रास्ता साफ हुआ।
फॉर्म-7 पर सीमा, नाम हटाने की प्रक्रिया होगी नियंत्रित
मतदाता सूची में किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने की मांग के लिए फॉर्म-7 इस्तेमाल होता है। आयोग ने इसके इस्तेमाल को लेकर सीमा तय की है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, SIR के दौरान एक मतदाता अधिकतम 10 फॉर्म-7 जमा कर सकेगा, जबकि सामान्य दिनों में एक महीने में अधिकतम पांच फॉर्म जमा किए जा सकेंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल कर मतदाताओं के नाम हटवाने की संभावित कोशिशों पर अंकुश लगाना है। नाम हटाने से पहले संबंधित अधिकारियों को आवेदन की जांच करनी होगी और जरूरत पड़ने पर प्रभावित मतदाता को अपना पक्ष रखने का अवसर देना होगा।
नोटिस पाने वालों के घर जाएंगे BLO
आयोग ने रिकॉर्ड में गड़बड़ी के कारण नोटिस पाने वाले मतदाताओं की परेशानी कम करने के लिए भी कदम उठाया है। 26 सितंबर को घोषित व्यवस्था के तहत BLO संबंधित मतदाताओं के घर जाकर आवश्यक दस्तावेज जुटाएंगे और उन्हें ECINet पोर्टल पर अपलोड करेंगे। इसके बाद निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) मामले पर फैसला करेंगे। हर मतदाता को सुनवाई के लिए कार्यालय बुलाना जरूरी नहीं होगा। जरूरत पड़ने पर सुनवाई की जाएगी और उसे प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन कराने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे बुजुर्गों और सरकारी दफ्तरों तक पहुंचने में कठिनाई का सामना करने वाले लोगों को राहत मिल सकती है।
आयोग के फैसलों पर बनी हुई है नजर
SIR को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग के सामने मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने और पात्र नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की दोहरी चुनौती है। हालिया बदलावों से आवेदन और दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया आसान बनाने की कोशिश दिखती है। हालांकि, इन कदमों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जमीनी स्तर पर उनका कितना प्रभावी क्रियान्वयन होता है।