E20 पेट्रोल के साथ फिर मिले E10 का विकल्प, पुराने दोपहिया वाहनों को लेकर PM मोदी के आर्थिक सलाहकार ने जताई चिंता

नागेश्वरन ने अपने एक लेख में E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर किए जा रहे विभिन्न दावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि E20 के इस्तेमाल से वाहनों के इंजन को व्यापक नुकसान होने की आशंकाओं का समर्थन उपलब्ध वैज्ञानिक और परीक्षण संबंधी प्रमाण नहीं करते।;

Update: 2026-08-17 10:20 GMT

नई दिल्ली: भारत में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) वी. अनंत नागेश्वरन ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। उन्होंने कहा है कि पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ E10 पेट्रोल का विकल्प भी दोबारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, इससे पुराने दोपहिया वाहनों के मालिकों की चिंताएं कम होंगी और उन वाहनों को संभावित तकनीकी समस्याओं से बचाने में मदद मिल सकती है।

E20 को लेकर कई दावों पर सवाल

नागेश्वरन ने अपने एक लेख में E20 पेट्रोल को लेकर सोशल मीडिया पर किए जा रहे विभिन्न दावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि E20 के इस्तेमाल से वाहनों के इंजन को व्यापक नुकसान होने की आशंकाओं का समर्थन उपलब्ध वैज्ञानिक और परीक्षण संबंधी प्रमाण नहीं करते। उनके मुताबिक, भारत और अमेरिका में हुए परीक्षणों में ऐसे वाहनों में इंजन घिसाव या यांत्रिक क्षति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं मिली है, जो विशेष रूप से E20 के लिए प्रमाणित नहीं थे। हालांकि, उन्होंने पुराने वाहनों के एक बड़े हिस्से को लेकर अलग तरह की व्यावहारिक चिंता जताई है।

पुराने दोपहिया वाहनों की बड़ी संख्या

सीईए के अनुसार, भारत में करीब 7.5 से 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहन अब भी सड़कों पर चल रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे वाहनों की है, जो BS-IV मानकों से पहले बनाए गए थे और जिनमें कार्ब्यूरेटर तकनीक का इस्तेमाल होता है। ऐसे वाहनों के लिए E20 के लगातार इस्तेमाल को लेकर उन्होंने सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि पुराने वाहन बेड़े को अचानक उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल पर निर्भर करने के बजाय संक्रमण के लिए पर्याप्त समय और विकल्प मिलना चाहिए।

कार्ब्यूरेटर वाले इंजन में क्या दिक्कत?

नागेश्वरन के मुताबिक, कार्ब्यूरेटर एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में मौजूद अतिरिक्त ऑक्सीजन के अनुरूप खुद को उसी तरह समायोजित नहीं कर पाता, जिस तरह आधुनिक फ्यूल-इंजेक्शन सिस्टम करते हैं। इससे इंजन में ईंधन और हवा का अनुपात प्रभावित हो सकता है और इंजन अपेक्षाकृत अधिक गर्म होकर चल सकता है। इसके अलावा पुराने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रबर सील और अन्य पुर्जे लंबे समय तक एथेनॉल के संपर्क में रहने से प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि पुराने दोपहिया वाहनों के लिए कम एथेनॉल मिश्रण वाला विकल्प उपलब्ध रखना उपयोगी हो सकता है।

E20 से ईंधन दक्षता पर कितना असर?

सीईए ने E20 से जुड़ी ईंधन दक्षता की चिंता पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में लगभग दो-तिहाई ऊर्जा सामग्री होती है। इसलिए E20 के इस्तेमाल से वाहन की ईंधन दक्षता पर कुछ असर पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, उनके अनुसार यह प्रभाव करीब 7 प्रतिशत तक सीमित रह सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर किए जा रहे इससे कहीं बड़े नुकसान के दावों को उपलब्ध आंकड़ों से अलग बताया।

E10 की दोबारा उपलब्धता पर जोर

नागेश्वरन ने सुझाव दिया कि पेट्रोल पंपों पर E20 के साथ E10 पेट्रोल भी दोबारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इससे पुराने वाहनों के मालिकों को विकल्प मिलेगा, E20 को लेकर लोगों की चिंताएं कम होंगी और सरकार को पुराने वाहनों में जरूरी तकनीकी बदलाव या रेट्रोफिटिंग के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार के शुरुआती एथेनॉल मिश्रण रोडमैप में पुराने वाहनों के लिए कम मिश्रण वाले ईंधन की उपलब्धता का प्रावधान सोचा गया था, लेकिन समय के साथ यह विकल्प ज्यादातर पेट्रोल पंपों से लगभग गायब हो गया।

E20 से आगे बढ़ने से पहले व्यापक समीक्षा

मुख्य आर्थिक सलाहकार ने फिलहाल E20 के स्तर पर स्थिर रहने की सलाह दी है। उनके अनुसार, इससे आगे एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने से पहले विस्तृत लागत-लाभ विश्लेषण किया जाना चाहिए। इस मूल्यांकन में खाद्यान्न बनाम ईंधन की बहस, पानी की खपत, एथेनॉल और ईंधन की कीमत, कृषि नीति तथा खाद्य तेल से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया जाना चाहिए। इस तरह E10 को दोबारा विकल्प के रूप में उपलब्ध कराने का सुझाव केवल पुराने वाहनों की तकनीकी चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति और एथेनॉल अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

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