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Supreme Court: अदालत में बोलीं सीएम ममता बनर्जी- सिर्फ नाम काटने के लिए हो रहा SIR, 32 लाख नाम सूची से बाहर होने का दावा

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अदालत में कहा कि वह ठोस उदाहरण दे सकती हैं और प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित तस्वीरें भी दिखा सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का उपयोग केवल नाम हटाने के लिए किया जा रहा है।

Supreme Court: अदालत में बोलीं सीएम ममता बनर्जी- सिर्फ नाम काटने के लिए हो रहा SIR,  32 लाख नाम सूची से बाहर होने का दावा
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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं अदालत में मौजूद रहीं और राज्य सरकार की ओर से उठाए जा रहे सवालों का समर्थन किया। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत में कानूनी दलीलों के साथ-साथ भाषा, उच्चारण और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर भी दिलचस्प बहस देखने को मिली। अदालत ने मामले में व्यावहारिक समाधान तलाशने के संकेत दिए और अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की।

‘सूची ही एकमात्र माध्यम नहीं’

सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उन्हें पश्चिम बंगाल के अपने दो साथी न्यायाधीशों से पास प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया की जानकारी मिली थी और उसी समझ के आधार पर कुछ बिंदुओं को शामिल किया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश हुए, ने बताया कि अदालत ने पहले तार्किक विसंगतियों की सूची प्रदर्शित करने का निर्देश दिया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अदालत को सूचित किया गया है कि केवल सूची के माध्यम से ही संचार नहीं किया जा रहा, बल्कि संबंधित व्यक्तियों को व्यक्तिगत नोटिस भी जारी किए जा रहे हैं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रक्रिया में कोई व्यावहारिक कठिनाई है तो उसका समाधान निकाला जाना चाहिए।

32 लाख नाम सूची से बाहर

राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को बताया कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को पूरा करने के लिए केवल चार दिन शेष हैं। उन्होंने कहा कि 32 लाख मतदाता सूचीबद्ध नहीं हैं, 1.36 करोड़ नाम तार्किक विसंगति सूची में हैं, 63 लाख मामलों की सुनवाई लंबित है।

दीवान ने यह भी कहा कि 8,300 सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की गई है, जो संविधान के तहत परिकल्पित श्रेणी नहीं है। उनके अनुसार, निवास प्रमाण पत्र, आधार कार्ड और ओबीसी प्रमाण पत्र जैसे मान्य दस्तावेजों को भी कई जगह अस्वीकार किया जा रहा है, जिससे लोगों को चार से पांच घंटे तक कतार में खड़ा रहना पड़ रहा है। उन्होंने अदालत से याचिकाकर्ता के संक्षिप्त नोट पर विचार करने का आग्रह किया और कहा कि समय की कमी के कारण मतदाताओं को गंभीर असुविधा हो रही है।

नामों के उच्चारण पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने एक दिलचस्प टिप्पणी करते हुए कहा कि बंगाल में ‘द्विवेदी’ का उच्चारण ‘दिबेदी’ होगा, क्योंकि बंगाली भाषा में ‘वा’ की ध्वनि नहीं होती। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने हल्के अंदाज में कहा कि कम से कम उनके नाम का उच्चारण तो सही होगा। इस टिप्पणी पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ऐसा नहीं होगा। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि नाम संबंधी विसंगतियों के कारण सीमित समय का बड़ा हिस्सा नष्ट हो रहा है और यह समस्या केवल बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में स्थानीय बोलियों और उच्चारण के अंतर के कारण उत्पन्न होती है। मुख्य न्यायाधीश ने निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से इस पर जवाब मांगा।

‘SIR का इस्तेमाल नाम हटाने के लिए’: ममता बनर्जी

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अदालत में कहा कि वह ठोस उदाहरण दे सकती हैं और प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित तस्वीरें भी दिखा सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया का उपयोग केवल नाम हटाने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के बाद जब कोई महिला अपने पति का उपनाम अपनाती है तो उस पर सवाल उठाए जा रहे हैं और कई महिलाओं के नाम एकतरफा तरीके से सूची से हटा दिए गए हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फ्लैट खरीदने या निवास स्थान बदलने वाले गरीब लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं, कई जीवित व्यक्तियों को मृत घोषित कर दिया गया है, फॉर्म 6 भरने की अनुमति नहीं दी जा रही, ईआरओ (मतदाता पंजीकरण अधिकारी) के अधिकार 8,300 सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की तैनाती से प्रभावी रूप से कम कर दिए गए हैं। ममता बनर्जी ने कहा कि ये सूक्ष्म पर्यवेक्षक कार्यालयों में बैठे-बैठे बिना उचित सत्यापन के नाम हटा रहे हैं। उन्होंने इन कार्रवाइयों को महिला विरोधी करार दिया।

‘व्हाट्सएप आयोग’ टिप्पणी

सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को ‘व्हाट्सएप आयोग’ कहकर संबोधित किया। उनका आरोप था कि आयोग व्हाट्सएप के माध्यम से अनौपचारिक आदेश जारी कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, तो 24 साल बाद अचानक तीन महीने के भीतर इतनी जल्दबाजी में यह प्रक्रिया क्यों चलाई जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह फसल कटाई और यात्रा का मौसम है, कई लोग बाहर हैं, और इस दौरान 100 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने दावा किया कि बीएलओ की भी मौत हुई है और कई लोग अस्पताल में भर्ती हैं।

उन्होंने यह भी पूछा कि यदि यह प्रक्रिया आवश्यक है तो असम में इसे क्यों नहीं लागू किया जा रहा। उनके अनुसार, 58 लाख नाम काट दिए गए, और प्रभावित लोगों के पास अपील का कोई प्रभावी विकल्प नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि केवल बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है।

अदालत का रुख: संवेदनशीलता बरतने की सलाह

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद संभव है कि सूक्ष्म पर्यवेक्षकों की आवश्यकता न रहे। उन्होंने निर्वाचन आयोग से कहा कि अपने अधिकारियों को संवेदनशील रहने का निर्देश दें और अनावश्यक नोटिस जारी न करें। पीठ ने कहा कि एक व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह सोमवार तक उन ग्रुप बी अधिकारियों की सूची प्रस्तुत करे जिन्हें कार्यमुक्त कर उपलब्ध कराया जा सकता है।

साथ ही, दोनों याचिकाओं पर नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि एक अन्य संबंधित याचिका में निर्वाचन आयोग पहले ही हलफनामा दाखिल कर चुका है। अदालत ने निर्देश दिया कि उस मामले को भी सोमवार को सुना जाएगा और संबंधित सभी मुद्दों पर एक साथ विचार किया जाएगा।

9 फरवरी को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को तय की है। उस दिन अदालत सभी लंबित मुद्दों पर विस्तृत सुनवाई करेगी। सुनवाई के अंत में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अदालत से जनता के अधिकारों की रक्षा करने का आग्रह किया और पीठ के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जब न्याय “बंद दरवाजों के पीछे पुकार रहा होता है”, तो लोगों को लगता है कि उन्हें कहीं न्याय नहीं मिलेगा। अब निगाहें 9 फरवरी की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर अदालत क्या दिशा-निर्देश जारी करती है और मतदाताओं की कथित शिकायतों पर क्या रुख अपनाया जाता है।


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