दिल्ली हाईकोर्ट ने कोर्ट में 'झूठा' बयान देने पर छह सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का दिया आदेश

दिल्ली उच्च न्यायालय ने छह सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक आईआरएस अधिकारी की बर्खास्तगी को चुनौती देने के प्रस्तावित मामले में प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार के संबंध में अदालत के समक्ष जानबूझकर झूठा बयान दिया था।;

Update: 2026-10-08 06:39 GMT

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने छह सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया है। इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक आईआरएस अधिकारी की बर्खास्तगी को चुनौती देने के प्रस्तावित मामले में प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार के संबंध में अदालत के समक्ष जानबूझकर झूठा बयान दिया था।

न्यायमूर्ति मधु जैन की एकल पीठ ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल द्वारा दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश पारित किया। अग्रवाल ने राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संबंधित सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 के तहत कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया गया था।

उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश को सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ आईपीसी की धारा 191 और धारा 193 तथा धारा 209 के तहत दंडनीय अपराधों के कथित कृत्य के लिए लिखित शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया।

शिकायत को निर्णय प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का निर्देश दिया गया है। यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई द्वारा अग्रवाल के खिलाफ चलाए गए अभियोजन से संबंधित है। अभियोजन 26 नवंबर 2002 को पारित एक स्वीकृति आदेश पर आधारित था।

जनवरी 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंजूरी को अमान्य घोषित कर दिया था, जिसके बाद विशेष न्यायाधीश ने मार्च 2016 में अग्रवाल को बरी कर दिया। इसके बाद सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में फैसले को चुनौती देने पर विचार किया। 8 जून 2016 को विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा दी गई कानूनी राय में कहा गया था कि इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाने का कोई उचित आधार नहीं है।

यह राय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के माध्यम से 1 जुलाई, 2016 को सीबीआई को सूचित की गई थी। इसके बाद अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों को जारी करने की मांग की।

सीबीआई ने 2 अगस्त, 2016 को दायर अपने जवाब में कुछ दस्तावेजों को जारी करने का विरोध करते हुए कहा कि "इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के संबंध में प्रशासनिक मंत्रालय के साथ पत्राचार चल रहा है।"

इसके बाद विशेष न्यायाधीश ने सीबीआई को एक स्पष्ट जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह खुलासा किया जाए कि क्या कोई अपील या पुनरीक्षण याचिका दायर की गई है या लंबित है।

इसके बाद अग्रवाल ने 8 अगस्त, 2016 को सीआरपीसी की धारा 340 के तहत एक आवेदन दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था, क्योंकि उस समय प्रशासनिक मंत्रालय के साथ कोई वास्तविक पत्राचार नहीं हुआ था और सीबीआई को पहले ही कानून और न्याय मंत्रालय से इस मामले को उच्च मंच के समक्ष आगे न बढ़ाने की राय मिल चुकी थी।

उच्च न्यायालय ने पाया कि सीबीआई ने 8 अगस्त को ही डीओपीटी को मामले पर पुनर्विचार और आगे की कानूनी राय मांगने का प्रस्ताव भेजा था।

9 अगस्त को दायर किए गए एक अतिरिक्त जवाब में, सीबीआई ने कहा कि उसने सैद्धांतिक रूप से जनवरी 2016 के फैसले को चुनौती देने का फैसला किया था और यह प्रस्ताव 8 अगस्त को विभाग को भेज दिया गया था।


Tags:    

Similar News