सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के तौर पर 'फांसी' पर रोक लगाने से इनकार किया
सुप्रीम कोर्ट ने देश में फांसी के जरिए मौत की सजा देने के तरीके पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को 'फांसी देकर मौत की सजा' के अलावा दूसरे व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से साबित विकल्पों पर चर्चा करने और उन्हें तलाशने की अनुमति दी।;
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को देश में फांसी के जरिए मौत की सजा देने के तरीके पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को 'फांसी देकर मौत की सजा' के अलावा दूसरे व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से साबित विकल्पों पर चर्चा करने और उन्हें तलाशने की अनुमति दी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 'फांसी देकर मौत की सजा' को बदलने के लिए कोई न्यायिक आदेश जारी करने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट सीनियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा की 2017 में दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (सीआरपीसी, जिसे अब बीएनएसएस से बदल दिया गया है) की धारा 354(5) में 'फांसी देकर मौत की सजा' के प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के उस पुराने फैसले पर फिर से विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें 'सबसे दुर्लभ मामलों' में दोषियों को दी गई मौत की सजा के लिए 'फांसी' को एक सही तरीका माना गया था।
याचिकाकर्ता ने 'दीना दयाल बनाम भारत सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट की 1983 की संविधान पीठ के फैसले की समीक्षा की मांग की थी, जिसमें फांसी को संवैधानिक रूप से सही ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि भविष्य में केंद्र सरकार 'फांसी देकर मौत की सजा' के विकल्पों पर विचार करने के लिए स्वतंत्र है, जिनसे मौत की सजा पाए कैदियों की गरिमा बनी रहे और उन्हें कम दर्द हो।
गरिमा के साथ मरने के अधिकार को जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा बताते हुए याचिकाकर्ता मल्होत्रा ने तर्क दिया कि फांसी देकर मौत की सजा क्रूर और बर्बर है।
याचिका में कहा गया है कि फांसी का इस्तेमाल अब मौत की सजा देने के तरीके के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए और इसकी जगह घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों को अपनाया जाना चाहिए, जैसा कि कुछ अन्य देशों में किया गया है।
मल्होत्रा ने कोर्ट से फांसी की जगह ज्यादा मानवीय विकल्प अपनाने को कहा, जिसमें मौत की सजा पाए कैदियों को सजा के तरीके को चुनने का विकल्प देना भी शामिल है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रोजेक्ट 39ए' से जुड़ी सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा की राय भी मांगी। यह प्रोजेक्ट एक क्रिमिनल जस्टिस प्रोग्राम है जो मौत की सजा पाए कैदियों को कानूनी मदद और प्रतिनिधित्व देता है।
अरोड़ा ने मामले को एक एक्सपर्ट कमेटी को सौंपने का सुझाव दिया क्योंकि घातक इंजेक्शन बहुत सफल नहीं पाया गया था।