हलाला के बाद पूर्व पति से दोबारा शादी से इनकार पर झारखंड HC का बड़ा फैसला, कही यह बात

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े संदर्भों में 'हलाला' शब्द उस स्थिति के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब तलाक के बाद पूर्व पति-पत्नी के दोबारा विवाह की संभावना के संदर्भ में महिला का किसी अन्य पुरुष से विवाह और उसके बाद उस विवाह के समाप्त होने जैसी शर्तों की चर्चा होती है।;

Update: 2026-09-10 07:25 GMT

रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने मुस्लिम दंपती के वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि तलाक के बाद हलाला की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद यदि पूर्व पति दोबारा निकाह करने से इनकार करता है, तो उसे विवाह के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि केवल दोबारा शादी से इनकार करना अपने आप में ऐसा कृत्य नहीं है, जिसके आधार पर संज्ञेय अपराध का मामला बनाया जा सके। गिरिडीह जिले के धनवार क्षेत्र से जुड़े इस मामले की सुनवाई जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत में हुई। कोर्ट ने मामले में आरोपी इमरान हुसैन को अग्रिम जमानत भी दे दी।

तलाक के बाद दोबारा निकाह को लेकर विवाद

मामला गिरिडीह के धनवार थाना क्षेत्र का है, जहां एक मुस्लिम दंपती के बीच वैवाहिक संबंध को लेकर विवाद सामने आया था। आरोपी इमरान हुसैन ने गिरफ्तारी की आशंका के चलते झारखंड हाई कोर्ट का रुख करते हुए अग्रिम जमानत की मांग की थी। उसके खिलाफ धनवार थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धाराएं लगाए जाने की बात सामने आई थी।

पहले भी दर्ज हुआ था मामला

इमरान की ओर से अदालत में बताया गया कि दोनों के बीच विवाद का सिलसिला नया नहीं था। इससे पहले भी वर्ष 2020 में इसी तरह के आरोपों को लेकर मामला दर्ज कराया गया था। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था। इसके बाद पति-पत्नी का तलाक हो गया। महिला ने बाद में किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर लिया। इसी बीच पूर्व पति से दोबारा विवाह नहीं करने को लेकर नया विवाद खड़ा हुआ और इमरान के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई। बाद में इसी शिकायत को प्राथमिकी में तब्दील कर दिया गया।

महिला पक्ष ने किया विरोध

महिला की ओर से आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया गया। उसके पक्ष की ओर से अदालत को बताया गया कि पहले हुए समझौते के दौरान इमरान ने दोबारा शादी करने का आश्वासन दिया था। महिला पक्ष का आरोप था कि बाद में इमरान ने अपने कथित वादे से पीछे हटते हुए दोबारा विवाह करने से इनकार कर दिया। इसी आधार पर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद परिस्थितियों पर भी गौर किया। रिकॉर्ड से यह तथ्य सामने आया कि दोनों के बीच तलाक हो चुका था और महिला बाद में दूसरे व्यक्ति से विवाह कर चुकी थी।

‘इनकार करना अपराध नहीं’

हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए यह स्पष्ट किया कि तलाक और उसके बाद सामने आए वैवाहिक घटनाक्रम के आधार पर पूर्व पति को दोबारा विवाह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत के मुताबिक, हलाला की प्रक्रिया से जुड़ी स्थिति होने मात्र से पूर्व पति पर दोबारा निकाह करने की कानूनी बाध्यता नहीं बनती। यदि वह विवाह से इनकार करता है, तो केवल इस इनकार को अपने आप में संज्ञेय अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने इसी आधार पर आरोपी इमरान हुसैन को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी। हालांकि, अदालत का आदेश मामले में लगाए गए अन्य आरोपों के अंतिम निपटारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

हलाला को लेकर क्या है विवाद?

मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े संदर्भों में 'हलाला' शब्द उस स्थिति के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब तलाक के बाद पूर्व पति-पत्नी के दोबारा विवाह की संभावना के संदर्भ में महिला का किसी अन्य पुरुष से विवाह और उसके बाद उस विवाह के समाप्त होने जैसी शर्तों की चर्चा होती है। यह विषय लंबे समय से सामाजिक, धार्मिक और कानूनी बहस का हिस्सा रहा है। ऐसे मामलों में व्यक्तिगत कानून, वैवाहिक अधिकार और आपराधिक कानून के प्रावधानों को लेकर अलग-अलग कानूनी प्रश्न उठते रहे हैं। झारखंड हाई कोर्ट के इस मामले में अदालत ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि क्या पूर्व पति को दोबारा विवाह के लिए बाध्य किया जा सकता है और क्या केवल विवाह से इनकार करने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।

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