पीओके में हिंसा पर जेके स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने जताई चिंता, लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग
जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के रावलकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली, मीरपुर और अन्य क्षेत्रों में जारी हिंसा तथा लोगों की मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त की है;
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (जेकेएसए) ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के रावलकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली, मीरपुर और अन्य क्षेत्रों में जारी हिंसा तथा लोगों की मौतों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। एसोसिएशन ने प्रदर्शनकारियों पर कथित बल प्रयोग, संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और इंटरनेट बंद किए जाने की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र से निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।
एसोसिएशन के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुहामी ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के उस पार से सामने आ रही तस्वीरें और वीडियो बेहद दुखद और चिंताजनक हैं। उन्होंने कहा कि हर मानव जीवन अनमोल है और किसी भी राजनीतिक मतभेद या प्रशासनिक विवाद के कारण निर्दोष लोगों की जान नहीं जानी चाहिए। उनके अनुसार, हिंसा का लगातार जारी रहना लोगों के दुख, अविश्वास और अलगाव को और बढ़ाता है।
खुहामी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित अत्यधिक बल प्रयोग की निंदा करते हुए नागरिकों और सुरक्षा कर्मियों की मौत एवं घायल होने की घटनाओं पर शोक व्यक्त किया। उन्होंने संचार सेवाओं और इंटरनेट पर लगाए गए प्रतिबंधों पर भी चिंता जताई और कहा कि किसी भी नागरिक अशांति के दौरान पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना तक पहुंच बेहद जरूरी होती है।
एसोसिएशन ने पाकिस्तान सरकार से संयम बरतने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग तुरंत बंद करने और सभी पक्षों के साथ सार्थक संवाद शुरू करने की अपील की। बयान में कहा गया कि लोकतंत्र असहमति को दबाने से नहीं, बल्कि नागरिकों की बात सुनने, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान करने और संवैधानिक व लोकतांत्रिक तरीके से उनकी शिकायतों का समाधान करने से मजबूत होता है।
खुहामी ने कहा कि संवैधानिक सुधार, लोकतांत्रिक समानता, जवाबदेह शासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा की मांग को कभी अपराध नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों, युवाओं, श्रमिकों और वंचित वर्गों की चिंताओं को गंभीरता और सम्मान के साथ सुना जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का सबसे अधिक असर छात्रों और युवाओं पर पड़ता है। शैक्षणिक संस्थानों का कामकाज प्रभावित होता है, पढ़ाई बाधित होती है और इंटरनेट बंद होने से शिक्षा तथा संचार दोनों प्रभावित होते हैं।
एसोसिएशन ने कहा कि रावलकोट, मुजफ्फराबाद, कोटली और अन्य क्षेत्रों में हुई मौतें इस बात का संकेत हैं कि लोगों की शिकायतों का समाधान बल प्रयोग से नहीं हो सकता। स्थायी शांति केवल संवाद, न्याय, पारदर्शिता और मौलिक अधिकारों के सम्मान से ही संभव है।
खुहामी ने यह भी कहा कि यह विडंबना है कि जो पाकिस्तान अक्सर भारत को मानवाधिकारों पर उपदेश देता रहा है, वही अब नियंत्रण रेखा के उस पार मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार सार्वभौमिक हैं और उनका चयनात्मक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
एसोसिएशन ने संयुक्त राष्ट्र से सभी मौतों और हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच कराने की मांग की। साथ ही कहा कि यदि किसी भी प्रकार के गैरकानूनी बल प्रयोग या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप कार्रवाई की जानी चाहिए।
बयान के अंत में एसोसिएशन ने कहा कि हिंसा केवल विभाजन को बढ़ाती है, जबकि सार्थक संवाद विश्वास पैदा करता है और स्थायी शांति व स्थिरता की नींव रखता है। हर नागरिक को गरिमा, न्याय, शांति और बिना भय के अपनी वैध मांगें रखने का अधिकार मिलना चाहिए।