अमेरिका-ईरान तनाव से कच्चा तेल 107 डॉलर के पार, भारत की बढ़ी चिंता; युद्ध लंबा खिंचने का भी खतरा

भारत के लिए महंगे क्रूड का असर आयात बिल, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। खासतौर पर अगर तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बढ़ सकती है।;

Update: 2026-09-11 03:26 GMT

नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। गुरुवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इस साल 25 मई के बाद पहली बार कच्चा तेल इस स्तर पर आया है। अगस्त की शुरुआत की तुलना में क्रूड की कीमत में करीब 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। तेल की यह तेजी भारत के लिए भी चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।

अमेरिका में भी महंगा हुआ तेल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के साथ अमेरिका में भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में तेल की कीमत बढ़कर करीब 5.94 डॉलर प्रति गैलन हो गई है। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य टकराव अगर और लंबा खिंचता है तो वैश्विक सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है। भारत के लिए महंगे क्रूड का असर आयात बिल, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। खासतौर पर अगर तेल की कीमत लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बनी रहती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बढ़ सकती है।

ट्रंप बोले- नवंबर तक खत्म हो सकता है संघर्ष

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष को जल्द खत्म किया जा सकता है। पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने दावा किया कि यह संघर्ष नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों के आसपास समाप्त हो जाएगा। ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि ईरान अमेरिकी मध्यावधि चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है और अपनी सैन्य क्षमता को उस समय तक बनाए रखना चाहता है। हालांकि, उनके प्रशासन के भीतर युद्ध की अवधि को लेकर अलग-अलग चिंताएं सामने आने की खबरें हैं।

ट्रंप के सहयोगियों को युद्ध लंबा खिंचने की चिंता

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने ट्रंप के साथ हुई गोपनीय बातचीत में इस आशंका पर चिंता जताई कि संघर्ष उनके मौजूदा कार्यकाल के अंत यानी जनवरी 2029 तक भी खिंच सकता है। अगर ऐसा होता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव, तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर लगातार दबाव बना रह सकता है।

ईरान ने दी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी IRGC ने भी अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अमेरिका की ओर से अगला हमला होने पर ईरान की प्रतिक्रिया बेहद कड़ी होगी और उसकी कोई तय सीमा नहीं होगी। इससे दोनों देशों के बीच तनाव कम होने के बजाय और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। इसी वजह से तेल बाजार में भी निवेशकों की चिंता बढ़ी है।

IAEA के फैसले से तेहरान पर बढ़ा दबाव

परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के बीच एक अहम घटनाक्रम हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने बुधवार को ईरान के परमाणु नियमों के अनुपालन से जुड़े मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पास भेजने के पक्ष में मतदान किया। प्रस्ताव 23-3 वोटों से पारित हुआ, जबकि आठ देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। रूस, चीन और नाइजर ने प्रस्ताव का विरोध किया। यह कदम ईरान पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है। ईरान के IAEA प्रतिनिधि ने इस प्रस्ताव को अमेरिकी दबाव का नतीजा बताते हुए कहा कि इसका कोई आधार नहीं है और इससे कोई ठोस परिणाम नहीं निकलेगा।

जॉर्डन में अमेरिकी एयरबेस पर ईरानी हमला

इस बीच CBS की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने जॉर्डन स्थित अमेरिकी एयरबेस पर कई हमले किए। रिपोर्ट में दावा किया गया कि मुवाफ्फक साल्टी एयर बेस पर हमले के दौरान अमेरिकी सैन्य विमानों को नुकसान पहुंचा। रिपोर्ट के अनुसार, एक A-10 थंडरबोल्ट का एक विंग क्षतिग्रस्त हुआ, जबकि करीब आठ F-15 विमानों को मामूली नुकसान पहुंचा। बताया गया कि इन विमानों को बाद में फिर से सेवा में लगाया गया।

जवाब में अमेरिका ने दागीं 30 से ज्यादा पैट्रियट मिसाइलें

ईरानी हमलों के जवाब में अमेरिकी सेना ने 30 से अधिक पैट्रियट मिसाइलें दागीं। इससे पहले अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत को निशाना बनाए जाने के जवाब में अमेरिका ने ईरान के पांच तेल टैंकरों पर कार्रवाई की थी। इसके बाद ईरान की ओर से आठ टैंकरों और दो युद्धपोतों पर हमले किए जाने की रिपोर्ट सामने आई। अमेरिका-ईरान के बीच सैन्य टकराव के छह महीने से अधिक समय बीतने के बाद अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि संघर्ष का अगला चरण कितना लंबा चलेगा। यदि तनाव जल्द नहीं घटा, तो 100 डॉलर से ऊपर बना कच्चा तेल भारत समेत दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई चुनौती बन सकता है।

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