न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में मोहन भागवत बोले- विविधता में एकता भारत के DNA में

करीब 42 मिनट के अपने भाषण में उन्होंने भारत की विविधता, धर्म, जीवन के अलग-अलग चरणों, भौतिक सुख और व्यक्ति-समाज के बीच संतुलन जैसे मुद्दों पर विचार रखे। कार्यक्रम में 5,000 से अधिक भारतीय मूल के अमेरिकी शामिल हुए।;

Update: 2026-08-30 04:39 GMT

न्यूयॉर्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार रात न्यूयॉर्क के मशहूर मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम को संबोधित किया। करीब 42 मिनट के अपने भाषण में उन्होंने भारत की विविधता, धर्म, जीवन के अलग-अलग चरणों, भौतिक सुख और व्यक्ति-समाज के बीच संतुलन जैसे मुद्दों पर विचार रखे। कार्यक्रम में 5,000 से अधिक भारतीय मूल के अमेरिकी शामिल हुए। इसका आयोजन अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग (AHEAD) की ओर से किया गया था। कार्यक्रम में करीब 30 देशों के 180 धार्मिक नेताओं के शामिल होने की जानकारी दी गई।

‘एकता और विविधता भारत के DNA में’

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि एकता और विविधता भारत के DNA में है। उन्होंने कहा कि लोग देखने में अलग हो सकते हैं, उनके रहने-सहन और जीवन जीने के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन उनके बीच एक जन्मजात जुड़ाव मौजूद है। उन्होंने कहा कि विविधता में एकता भारत की पारंपरिक सोच रही है और देश ने अलग-अलग समय पर पूरी दुनिया को इसका एहसास कराया है। भागवत के मुताबिक, अलग-अलग विचारों और जीवनशैलियों के बावजूद समाज को जोड़ने वाली भावना भारत की मूल सोच का हिस्सा है।

सही सोच इंसान को ईश्वर के करीब ले जाती है

RSS प्रमुख ने इंसान की सोचने की क्षमता को एक महत्वपूर्ण वरदान बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास सही और गलत के बीच अंतर करने तथा अपने विचारों के आधार पर जीवन की दिशा तय करने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि सही सोच इंसान को भगवान के करीब ले जाती है, जबकि गलत सोच उसे जानवरों के करीब ले जाती है। उनके अनुसार, विचार और व्यवहार में संतुलन व्यक्ति के साथ-साथ पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण है।

धर्म सिर्फ पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं

भागवत ने धर्म की भारतीय अवधारणा को समझाते हुए कहा कि भारत में धर्म को केवल पूजा या किसी धार्मिक पहचान के रूप में नहीं देखा गया है। उनके मुताबिक, धर्म वह व्यवस्था है जो ब्रह्मांड और जीवन को संभालती है तथा जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य जीवन में संतुलन और जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है। यह व्यक्ति के आचरण को उसके परिवार, समाज और व्यापक दुनिया के साथ जोड़ता है।

भौतिक सुख से हमेशा नहीं मिलती संतुष्टि

अपने भाषण में RSS प्रमुख ने आधुनिक जीवन में बढ़ती भौतिक सुविधाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पैसा, सामान और दूसरी भौतिक सुविधाएं व्यक्ति को हर समय संतुष्टि नहीं दे सकतीं। भागवत के अनुसार, भौतिक सुख अस्थायी होता है और अधिक से अधिक सुविधाएं हासिल करने के बावजूद व्यक्ति के भीतर संतुष्टि की कमी बनी रह सकती है। उन्होंने जीवन में आंतरिक संतुलन और संतोष के महत्व पर जोर दिया।

‘अमेरिका कर्मभूमि है, उसके प्रति सच्चे रहें’

अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि जिस देश में वे रहते और काम करते हैं, वह उनकी कर्मभूमि है। इसलिए उनके प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना जरूरी है। उन्होंने भारतीय समुदाय से अपने कर्मक्षेत्र और समाज के प्रति निष्ठा बनाए रखने की बात कही।

जीवन के हर चरण की अपनी जिम्मेदारी

भागवत ने भारतीय परंपरा में बताए गए जीवन के चार चरणों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जीवन में सीधे संन्यास लेने की बजाय हर पड़ाव की अपनी जिम्मेदारी होती है। पहले चरण में सीखना, फिर परिवार और समाज की जिम्मेदारियां निभाना और बाद में अपने अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जीवन की क्रमिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

व्यक्ति, समाज और पर्यावरण में संतुलन जरूरी

RSS प्रमुख ने विकास की अवधारणा पर भी बात की। उन्होंने कहा कि प्रगति के लिए न तो व्यक्ति को दबाया जाना चाहिए और न ही समाज की उपेक्षा होनी चाहिए। उनके मुताबिक, व्यक्ति, समाज और पर्यावरण की भलाई को साथ लेकर चलना जरूरी है। संतुलित विकास तभी संभव है, जब इन तीनों के हितों के बीच तालमेल बनाया जाए। न्यूयॉर्क में दिया गया उनका संबोधन भारतीय जीवन-दर्शन और वैश्विक स्तर पर एकता की अवधारणा पर केंद्रित रहा।

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