ट्रंप की ईरान पर नए हमले की तैयारी? इस्लामाबाद में बातचीत के साथ ही अमेरिका क्यों बढ़ा रहा सैन्य जमावड़ा, समझें

अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। कई फाइटर जेट और हमलावर विमान पहले ही तैनात किए जा चुके हैं, जबकि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की तैयारी जारी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी सेना की 28वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 1500 से 2000 सैनिकों को जल्द ही मध्य पूर्व भेजा जा सकता है। इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना भी बड़े स्तर पर सक्रिय हो गई है।

Update: 2026-04-11 10:26 GMT
इस्लामाबाद/वॉशिंगटन:एक तरफ अमेरिकी उपराष्ट्रपति ईरान के साथ अहम शांति वार्ता के लिए इस्लामाबाद में मौजूद हैं, तो दूसरी तरफ वॉशिंगटन मध्य पूर्व में अपनी सैन्य मौजूदगी तेजी से बढ़ा रहा है। कूटनीति और सैन्य शक्ति का यह समानांतर इस्तेमाल संकेत देता है कि अमेरिका इस पूरे मामले में ‘दोनों विकल्प खुले’ रखकर आगे बढ़ रहा है।

मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना का बढ़ता जमावड़ा

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। कई फाइटर जेट और हमलावर विमान पहले ही तैनात किए जा चुके हैं, जबकि अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती की तैयारी जारी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिकी सेना की 28वीं एयरबोर्न डिवीजन के लगभग 1500 से 2000 सैनिकों को जल्द ही मध्य पूर्व भेजा जा सकता है। इसके अलावा, अमेरिकी नौसेना भी बड़े स्तर पर सक्रिय हो गई है।

अमेरिकी नेवी का USS जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश कैरियर स्ट्राइक ग्रुप अटलांटिक महासागर पार कर रहा है, जबकि USS बॉक्सर एम्फीबियस रेडी ग्रुप प्रशांत महासागर से खाड़ी क्षेत्र की ओर बढ़ रहा है। इन दोनों समूहों के एक सप्ताह से अधिक समय में खाड़ी क्षेत्र में पहुंचने की संभावना है।

वर्तमान में मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या 50,000 के पार पहुंच चुकी है, जो सामान्य 40,000 के स्तर से काफी अधिक है। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि अमेरिका संभावित किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहता है।

ईरान का अविश्वास

हालांकि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, लेकिन तेहरान का रुख अब भी सख्त और सतर्क बना हुआ है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने साफ कहा कि ईरान अच्छी नीयत से बातचीत में शामिल हो रहा है, लेकिन उसे अमेरिका पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा, “अमेरिका के साथ हमारे पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। बातचीत अक्सर वादों के उल्लंघन और नाकामी के साथ खत्म हुई है।” यह बयान इस बात को दर्शाता है कि वार्ता की मेज पर बैठने के बावजूद दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

ट्रंप की चेतावनी

कूटनीतिक कोशिशों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी सख्त संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर बातचीत विफल होती है, तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प पूरी तरह खुला है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी युद्धपोतों पर आवश्यक सामग्री लादी जा रही है और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बयान न केवल ईरान पर दबाव बढ़ाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि अमेरिका किसी भी स्थिति के लिए तैयार है।

दबाव और संवाद साथ-साथ

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका की यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में इसका असर ज्यादा दिखाई दे रहा है। एक ओर शांति वार्ता के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर सैन्य ताकत दिखाकर दबाव बनाया जा रहा है। इस रणनीति के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हो सकते हैं। पहला, बातचीत के दौरान ईरान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना, ताकि वह अमेरिकी शर्तों के प्रति ज्यादा लचीला रुख अपनाए। दूसरा, अगर वार्ता विफल होती है तो तुरंत सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार रहना। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि सैन्य तैनाती का मतलब तत्काल हमला ही हो। कई बार ऐसी तैनाती केवल ‘डिटरेंस’ यानी प्रतिरोधक शक्ति के रूप में भी की जाती है, ताकि विरोधी पक्ष आक्रामक कदम उठाने से बचे।

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