इस्लामाबाद। Islamabad Talks Crisis: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को थामने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता अब अनिश्चितता के दौर में पहुंच गई है। एक तरफ अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए तैयार है, वहीं ईरान की ओर से सस्पेंस बना हुआ है। इस बीच पाकिस्तान के एक बयान ने स्थिति को और जटिल बना दिया है, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
ईरान की शर्तों ने बढ़ाया संशय
इस वार्ता के भविष्य पर सबसे बड़ा सवाल ईरान की सख्त शर्तों के कारण खड़ा हुआ है। तेहरान ने साफ संकेत दिया है कि जब तक इजराइल लेबनान में अपने सैन्य अभियान नहीं रोकता, तब तक वह किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। ईरान का यह रुख बताता है कि वह इस संघर्ष को केवल अमेरिका-ईरान के द्विपक्षीय मुद्दे के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसे व्यापक क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में जोड़ रहा है।
ईरान का डेलीगेशन पहुंचा
अमेरिका के साथ प्रस्तावित वार्ता से पहले ईरान का डेलिगेशन शुक्रवार देर रात पाकिस्तान पहुंचा। ईरान की न्यूज एजेंसी तसनीम के मुताबिक, यह डेलीगेशन 71 लोगों का है। इस टीम में सिर्फ बातचीत करने वाले लोग ही नहीं, बल्कि एक्सपर्ट सलाहकार, मीडिया प्रतिनिधि, डिप्लोमैट और सुरक्षा से जुड़े अधिकारी भी शामिल हैं। इस बातचीत टीम की अगुवाई ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गलीबाफ कर रहे हैं। टीम में ईरान के अनुभवी विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी शामिल हैं।
अमेरिका तैयार, लेकिन रास्ता मुश्किल
अमेरिका की ओर से इस वार्ता के लिए उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजा गया है, जिसमें जेरेड कुशनर और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस जैसे नाम शामिल बताए जा रहे हैं। पाकिस्तान ने इन प्रतिनिधिमंडलों की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम किए हैं। सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की निगरानी में पूरे इस्लामाबाद में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और धारा 144 लागू कर दी गई है। हालांकि, इन तैयारियों के बावजूद वार्ता की सफलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ईरान को धमकी
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बातचीत से पहले ईरान को धमकी दी है। उन्होंने कहा है कि ईरान के पास थोड़े समय के लिए समुद्री रास्तों पर जबरदस्ती वसूली करने के अलावा कोई दांव नहीं है। उन्होंने यह भी धमकी दी कि वे इसलिए जिंदा हैं, ताकि बातचीत कर सकें।
बढ़ी कूटनीतिक उलझन
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान खुद भी विवाद के केंद्र में आ गया है। आमतौर पर किसी भी शांति वार्ता में मेजबान देश से तटस्थ रहने की उम्मीद की जाती है, लेकिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने स्थिति को भड़का दिया। अपने पोस्ट में उन्होंने इजराइल की कड़ी आलोचना करते हुए उसे “मानवता के लिए अभिशाप” तक बता दिया। उन्होंने लेबनान में इजराइली कार्रवाई को नरसंहार करार दिया और तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। हालांकि, बाद में दबाव के चलते यह पोस्ट हटा लिया गया, लेकिन तब तक इसका असर पड़ चुका था।
क्या इजराइल स्वीकार करेगा ऐसी मध्यस्थता?
विश्लेषकों का मानना है कि इस बयान के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इजराइल ऐसे देश की मध्यस्थता स्वीकार करेगा, जो खुलकर उसके खिलाफ बयान दे रहा है। इसी को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान का यह कदम एक तरह का ‘सेल्फ-गोल’ साबित हो सकता है, जिसने वार्ता की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इजराइल की सैन्य तैयारी तेज
इधर, इजराइल ने भी हालात को देखते हुए अपनी सैन्य तैयारियां तेज कर दी हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइली वायुसेना के लड़ाकू विमानों को ऑपरेशन के लिए तैयार रखा गया है और संभावित हमलों की रणनीति पर काम चल रहा है। यह संकेत देता है कि यदि कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो क्षेत्र में संघर्ष और तेज हो सकता है।
एजेंडे में बड़ा टकराव
प्रस्तावित वार्ता में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होनी थी, लेकिन दोनों पक्षों के रुख में बड़ा अंतर है। ईरान जहां स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखने और जहाजों से शुल्क वसूलने की बात करता है, वहीं अमेरिका इस मार्ग को पूरी तरह स्वतंत्र और सुरक्षित रखना चाहता है। इसके अलावा, अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइलों पर सख्त प्रतिबंध चाहता है, जबकि ईरान इन मांगों को अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है। ईरान की एक और बड़ी मांग है कि उस पर लगे सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएं।
तनाव के बीच हमलों की खबरें
इसी बीच ईरान के कुछ हिस्सों से विस्फोटों की खबरें भी सामने आई हैं। तेहरान के उत्तर-पूर्वी इलाकों ओजगोल, कनात कौसर और लाविजान में धमाकों की आवाजें सुनी गई हैं।
वार्ता से ज्यादा टकराव के संकेत
मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता आसान नहीं होगी। एक तरफ ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा है, दूसरी तरफ अमेरिका अपने प्रस्तावों से पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। ऊपर से पाकिस्तान की भूमिका और इजराइल की सैन्य तैयारियां इस पूरे समीकरण को और जटिल बना रही हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि शांति की मेज सज जरूर गई है, लेकिन हालात इस ओर इशारा कर रहे हैं कि अगर कूटनीतिक प्रयास विफल होते हैं, तो यह संघर्ष और व्यापक रूप ले सकता है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत का रास्ता निकलेगा या तनाव और बढ़ेगा।