ऐसे कैसे बनेगा कैशलेस इंडिया : छोटे-छोटे लेनदेन के लिए चढ़ना पड़ती है पहाड़ी...!

सरकार मुद्राविहीन देश (केशलेस इंडिया) की बात कर रही है लेकिन अब भी कई गाँव इंटरनेट की पहुंच से दूर हैं।;

Update: 2017-01-05 21:24 GMT

नहीं पंहुच सका कई गाँवों में मोबाइल नेटवर्क

किसान और छोटे व्यापारी हो रहे परेशान

इंदौर !  सरकार मुद्राविहीन देश (केशलेस इंडिया) की बात कर रही है लेकिन अब भी कई गाँव इंटरनेट की पंहुच से दूर है। ऐसे में यह सपना आखिर कैसे पूरा हो पाएगा। डिजिटल इंडिया के तमाम दावों के बावजूद अब भी मध्यप्रदेश के कुल 56 हजार गाँवों में से पांच हजार अब भी मोबाइल नेटवर्क की जद में नहीं आ सके हैं। हालाँकि सभी 22 हजार 824 पंचायतों का डिजिटलाइजेशन यानी इन्हें कम्प्यूटर सुविधाओं से जोड़ दिया गया है।

देवास जिले के बागली जनपद का गाँव टप्पा ऊंची-ऊंची पहाडिय़ों और जंगल से घिरा है। लगभग ढाई हजार की आबादी वाले इस गाँव में नोटबंदी से लोग खासे परेशान हैं। इनकी परेशानी का असल कारण यहाँ मोबाइल नेटवर्क नहीं मिल पाना है। गाँव में न तो कोई बैंक शाखा है और न ही कोई एटीएम. अपना पैसा निकालने के लिए इन्हें यहाँ से 22 किमी दूर हाटपीपल्या कस्बे जाना पड़ता है। किसी को पांच सौ-हजार रूपये भी निकालना हो तो पूरा दिन चौपट हो जाता है। अकेले टप्पा ही नहीं आसपास के करीब 15 गाँवों के यही हालात हैं।

इंटरनेट सुविधाओं के जरिए युवा लेनदेन करना भी चाहते हैं लेकिन गाँव में इंटरनेट के लिए मोबाइल नेटवर्क ही नहीं है। मोबाइल पर कुछ लोगों ने बैंकिंग सुविधाओं के एप डाउनलोड भी किए हैं पर छोटे-छोटे भुगतान के लिए गाँव से तीन किमी दूर ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी की ख़ाक छानना पड़ती है। लेनदार और देनदार दोनों ही यहाँ मोबाइल नेटवर्क के लिए घंटो जतन करते रहते हैं। कभी आसानी से मिल जाता है और कभी नहीं मिले तो पेड़ों पर भी चढना पड़ता है। इसी कारण अब तक यहाँ की सेवा सहकारी संस्था भी नेट योजना से नहीं जुड़ सकी है। 2007 से आदेश होने के बाद भी यह अब तक बैंक से जुडी नहीं है।

इनका कहना है

नोटबंदी के कारण कई किसानों के खेत खाली ही रह गए। वे यहाँ बोवनी ही नहीं कर सके। ऋषि पटेल के आठ बीघा खेत में डालर चना बोने के लिए 40 हजार रूपये का बन्दोबस्त नहीं हो सका। दो-दो हजार रूपये रोज से कब पैसे पूरे होते।
नाथूसिंह सैंधव,
पत्रकार

कस्बे से किराना सामान का आर्डर देने या भुगतान करने के लिए मोबाइल का सहारा तो है पर उसके लिए दुकान छोडक़र पहाड़ी चढनी पडती है।
सुरेश गुजराती, किराना व्यापारी, टप्पा

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