हिमाचल: कांग्रेस सरकार के वन्यजीव पार्कों की एंट्री फीस दोगुनी करने के फैसले से सियासी घमासान
कर्ज के बोझ तले दबी हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने वन्यजीव पार्कों और अभयारण्यों में भारतीय पर्यटकों के प्रवेश शुल्क को 150 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया है;
शिमला। कर्ज के बोझ तले दबी हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने वन्यजीव पार्कों और अभयारण्यों में भारतीय पर्यटकों के प्रवेश शुल्क को 150 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया है। इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार की वित्तीय प्रबंधन क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।
अगले वर्ष विधानसभा चुनाव वाले इस पहाड़ी राज्य में विदेशी पर्यटकों के लिए भी वन्यजीव पार्कों और अभयारण्यों में प्रवेश शुल्क बढ़ाकर 600 रुपये कर दिया गया है, जो पहले की तुलना में 100 प्रतिशत अधिक है। भाजपा नेताओं ने रविवार को इस फैसले की कड़ी आलोचना की।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा, "राहुल गांधी का 'खटाखट इकोनॉमिक मॉडल' हिमाचल प्रदेश को अंधेरे में धकेल चुका है और कांग्रेस सरकार राज्य की जनता को लूट रही है।"
उन्होंने भारतीय नागरिकों के लिए वन्यजीव अभयारण्यों और वन क्षेत्रों में प्रवेश शुल्क बढ़ाए जाने के फैसले पर भी कांग्रेस सरकार को निशाने पर लिया।
भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश ऐसा राज्य बन गया है जो उधार लेकर चलता है, घाटे की भरपाई के लिए टैक्स लगाता है और अपनी अक्षमता की कीमत जनता से वसूलता है।
हिमाचल प्रदेश में कुल 28 वन्यजीव अभयारण्य हैं, जिनमें से तीन शिमला जिले में स्थित हैं। इनमें शिमला वाटर कैचमेंट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी, दरंगहाटी वाइल्डलाइफ सेंचुरी, और तलरा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी शामिल हैं।
सोलन जिले में चैल वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी और मजाथल वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी स्थित हैं, जबकि कुल्लू जिले में तीर्थन, सैंज, कैस, कनावर, खोखन और मनाली क्षेत्र के वन्यजीव अभयारण्य मौजूद हैं।
प्रवेश शुल्क बढ़ाने संबंधी अधिसूचना मुख्य सचिव-सह-अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) के.के. पंत द्वारा जारी की गई है। अधिसूचना में संरक्षित वन क्षेत्रों में पेशेवर फोटोग्राफी और सिनेमैटोग्राफी के शुल्क में भी वृद्धि की गई है।
विपक्षी भाजपा नेताओं का आरोप है कि यह शुल्क वृद्धि कांग्रेस सरकार के बढ़ते कर्ज और वित्तीय दबाव का परिणाम है, जो चुनावी लोकलुभावन वादों और मुफ्त योजनाओं को पूरा करने की कोशिशों से पैदा हुआ है।
भाजपा नेताओं ने कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 के अंत तक राज्य पर कुल बकाया कर्ज 95,632 करोड़ रुपये था। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच सार्वजनिक ऋण से प्राप्त धनराशि का 52.99 प्रतिशत से लेकर 74.11 प्रतिशत तक हिस्सा पुराने कर्ज चुकाने में खर्च किया गया।
भाजपा का दावा है कि हिमाचल प्रदेश देश के सबसे अधिक कर्जग्रस्त राज्यों में शामिल है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि 31 जनवरी 2026 तक राज्य का कुल कर्ज लगभग 1.01 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
वर्ष 2025-26 के लिए 58,514 करोड़ रुपये के बजट अनुमान में कुल बजट का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और कर्ज चुकाने के लिए निर्धारित किया गया है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि जो सरकार अपने बजट का दो-तिहाई हिस्सा केवल खुद को चलाए रखने में खर्च कर रही हो, वह व्यावहारिक रूप से शासन करना छोड़ चुकी है। वह केवल किसी तरह चल रही है और इसकी कीमत जनता से वसूल रही है।
उन्होंने कहा कि वन्यजीव अभयारण्यों की प्रवेश फीस बढ़ाना कोई अलग फैसला नहीं है, बल्कि कांग्रेस सरकार के उस सिलसिले की नई कड़ी है, जिसमें लगातार जनता पर आर्थिक बोझ डाला जा रहा है।
भाजपा नेताओं ने पहले उठाए गए कदमों का भी उल्लेख किया, जिनमें मई 2025 में बस किराए में 15 प्रतिशत वृद्धि, वर्ष 2024 में बिजली सब्सिडी वापस लेना, वर्ष 2023 में बिजली दरों में बढ़ोतरी, वर्ष 2024 में राशन की कीमतें बढ़ाना, बिजली और पानी पर सेस बढ़ाना तथा वर्ष 2024 में प्रति यूनिट 10 पैसे का मिल्क सेस लागू करना शामिल है।
भाजपा नेताओं ने सुक्खू सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए और कहा कि बहु-करोड़ रुपये के खनन घोटाले, फर्जी आयुष्मान भारत कार्ड घोटाले, बागवानी विभाग में फर्जी फलदार पौधों की खरीद और हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड से जुड़े 175 करोड़ रुपये के टेंडर घोटाले जैसे मामलों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।