हाशिम रजा जलालपुरी ने कबीर के 100 दोहों को उर्दू शायरी में ढाला

16वीं सदी की संत कवयित्री मीराबाई की भक्ति रचनाओं का उर्दू में अनुवाद करने वाले नौजवान शायर हाशिम रजा जलालपुरी ने अब संत कवि कबीरदास के 100 दोहों को उर्दू शायरी में ढाला है

Update: 2021-06-28 02:35 GMT

नई दिल्ली। 16वीं सदी की संत कवयित्री मीराबाई की भक्ति रचनाओं का उर्दू में अनुवाद करने वाले नौजवान शायर हाशिम रजा जलालपुरी ने अब संत कवि कबीरदास के 100 दोहों को उर्दू शायरी में ढाला है। हाशिम रजा का ताल्लुक अवध की इल्मी और अदबी सरजमीन जलालपुर से है। जलालपुर शायरों, लेखकों और दानिशवरों की धरती मानी जाती है। हाशिम का जन्म 27 अगस्त, 1987 को नौहों और सलाम के मशहूर शायर जुल्फिकार जलालपुरी और सरवरी बानो के घर हुआ।

हाशिम अपनी शायरी और मुशायरों और कवि सम्मेलनों का जाना पहचाना नाम हैं। उन्होंने बताया, मैंने गंगा जमुनी तहजीब का पहला सबक जलालपुर में पढ़ा, जो आज तक मुझे जुबानी याद है।

वहीं मीराबाई के 209 पदों को 1510 अशआर में अनुवाद करने का कारनामा हाशिम रजा जलालपुरी को अपने दौर के शायरों से अलग करता है।

हाशिम रजा ने कबीर के पदों को पढ़ते हुए कहा, संतन जात न पूछो निरगुनियां, साध बाभन साप छत्तरी, साधै जाति बनियां, साधन मा छत्तीस कौम है, टेढ़ी तोर पुछनियां, साधै नाऊ साधै धोबी, साध जाति है बरियां, साधन मा रैदास संत हैं, सुपच ऋषि सो भंगियां, हिंदू-तुर्क दुई दीन बने हैं, कछू नहीं पहचनियां।

इसका उर्दू अनुवाद करते हुए हाशिम कहते हैं कि, यह जात पात पूछना बेकार है मियां, इंसानियत का दर्स तो दुश्वार है मियां। संतों की कोई जात न कोई बिरादरी, संतों के दिल में सब के लिए है बराबरी।

मजहब का कोई फर्क न कौमों का फर्क है, इंसानियत की राह में हर कोई गर्क है, हिंदू भी एक और मुसलमान एक है, एक ही खुदा के बंदे हैं, इंसान एक है।

हाशिम बताते हैं, शायरी की विरासत उन्हें बेशक अपने वालिद से मिली पर गीता का उर्दू शायरी में अनुवाद करने वाले पद्मश्री अनवर जलालपुरी और लखनऊ यूनिवर्सिटी में उर्दू के विभागाध्यक्ष प्रो. नैयर जलालपुरी भी उनके प्रेरणास्रोत रहे।

हाशिम रजा जलालपुरी ने आईएएनएस से कहा, इस समय भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को अगर किसी चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है तो वो है मोहब्बत और इंसानियत।

उन्होंने कहा, कबीर मोहब्बत और इंसानियत के सबसे बड़े प्रचारक रहे हैं, इसलिए उनकी रचनाएं आसान भाषा में लोगों तक पहुंचनी चाहिए, जिससे विभिन्न संप्रदायों के लोगों के बीच की दूरियां कम हो सकें।

हाशिम रजा ने बताया कि उन्होंने रूहेलखंड यूनिवर्सिटी, बरेली से बीटेक और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एमटेक की डिग्री हासिल की। बीटेक और एमटेक के बाद उर्दू साहित्य में एमए भी किया है।

हाशिम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ और रूहेलखंड यूनिवर्सिटी बरेली में लेक्चरर के तौर पर कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा वह ग्रामीण भारत को रोजगार परक शिक्षा से सशक्त करने वाली संस्था मीराबाई फाउंडेशन के चेयरमैन भी हैं।

वहं गंगा जमुनी तहजीब सम्मान, उर्दू रत्न और फाखिर जलालपुरी सम्मान, 2019 से सम्मानित हो चुके हैं।

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