संभल जामा मस्जिद सर्वे मामला: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, मस्जिद समिति की याचिका पर सुनवाई पूरी
सुप्रीम कोर्ट ने संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे से जुड़े मामले में शुक्रवार को सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मस्जिद की इंतजामिया समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के आदेश को बरकरार रखा गया था।;
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वे से जुड़े मामले में शुक्रवार को सुनवाई पूरी होने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। मस्जिद की इंतजामिया समिति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के आदेश को बरकरार रखा गया था।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने मस्जिद समिति, हिंदू पक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया। यह मामला पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था।
यह विवाद 2024 में दायर एक सिविल मुकदमे से जुड़ा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि संभल की जामा मस्जिद मूल रूप से एक हिंदू मंदिर थी, जिसे 16वीं शताब्दी में ध्वस्त कर मस्जिद बनाया गया। इसी दावे के आधार पर उन्होंने मस्जिद में धार्मिक अनुष्ठान करने का अधिकार मांगा और परिसर के सर्वे की मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने 19 नवंबर 2024 को एकतरफा (एक्स-पार्टी) आदेश पारित करते हुए स्थानीय जांच के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मई 2025 के अपने फैसले में इस आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि इस स्तर पर यह नहीं कहा जा सकता कि मुकदमा पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के तहत स्वतः प्रतिबंधित है।
सुनवाई के दौरान मस्जिद समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अधिवक्ता निजाम पाशा ने अपनी दलीलें रखीं। हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता हरि शंकर जैन पेश हुए, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने पक्ष रखा।
एएसजी के.एम. नटराज ने अदालत से कहा कि राज्य सरकार इस विवाद के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती, क्योंकि मूल वाद अभी ट्रायल कोर्ट में लंबित है। उन्होंने कहा कि राज्य का दायित्व दोनों पक्षों के धार्मिक अधिकारों और हितों की रक्षा करना है।
हालांकि, राज्य सरकार ने अपनी दलीलों में पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की व्याख्या पर जोर दिया। एएसजी ने कहा कि अधिनियम की धारा 2 में "रूपांतरण" की परिभाषा दी गई है, जिसमें किसी पूजा स्थल में बदलाव या परिवर्तन भी शामिल है, जबकि धारा 3 किसी भी पूजा स्थल के रूपांतरण पर रोक लगाती है।
सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत बाद की तारीख में अपना निर्णय सुनाएगी।