बंधुआ मजदूर की पोती से नोबेल विजेता तक: जानिए 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली नवी पिल्लई कौन हैं

संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख और भारतीय मूल की नवी पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। जानिए दक्षिण अफ्रीका में पली-बढ़ीं नवी पिल्लई के संघर्ष और इस उपलब्धि की पूरी कहानी।;

Update: 2026-10-09 10:55 GMT

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र (UN) की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की पूर्व जज नवनेथम 'नवी' पिल्लई को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी नागरिक नवी पिल्लई को यह ऐतिहासिक सम्मान अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दिया गया है।

नवी पिल्लई का भारत के साथ गहरा ऐतिहासिक नाता है। 1890 के दशक में ब्रिटिश शासन के दौरान उनके दादा एक बंधुआ मजदूर के रूप में भारत से दक्षिण अफ्रीका के गन्ने के खेतों में काम करने गए थे।

रंगभेद से मुकाबला और तमिल संस्कृति में परवरिश

नवी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक प्रवासी तमिल परिवार में हुआ था। उनके पिता नारायणसामी एक बस ड्राइवर थे और मां शांतमा नायडू ने उन्हें पारंपरिक मूल्यों के साथ पाला।

रंगभेद (Apartheid) के कठोर दौर में पली-बढ़ीं नवी पिल्लई ने तमाम सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं को पार करते हुए कानूनी पढ़ाई पूरी की। वे दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने वाली भारतीय मूल की पहली महिलाओं में से एक बनीं और उन्होंने रंगभेद विरोधी आंदोलन में कानूनी मोर्चे पर सक्रिय भूमिका निभाई।

अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों की अडिग प्रहरी

नोबेल समिति के अनुसार, युद्ध और वैश्विक संघर्षों के इस दौर में नवी पिल्लई का जीवन और कार्य पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है। समिति ने जोर देकर कहा कि राजनीतिक दबावों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और कानून के शासन का सम्मान करना ही शांति का एकमात्र मार्ग है।

नवी पिल्लई ने रवांडा अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल के जज और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (UNHCHR) के रूप में भी ऐतिहासिक सेवाएं दी हैं।

नोबेल शांति पुरस्कार से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य

नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत वर्ष 1901 में हुई थी। अब तक यह सम्मान 112 व्यक्तियों और 28 अंतरराष्ट्रीय संगठनों को दिया जा चुका है। रेड क्रॉस (ICRC) को तीन बार और यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) को दो बार यह पुरस्कार मिला है।

इतिहास में 19 बार ऐसा भी अवसर आया है जब यह पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया, जिनमें प्रमुख रूप से दोनों विश्व युद्धों के वर्ष शामिल हैं। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी यह पुरस्कार स्थगित रखा गया था। वर्ष 2026 के इस पुरस्कार के तहत विजेता को 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना (लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर) की सम्मान राशि प्रदान की जाएगी।

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