CJP प्रोटेस्ट के बीच सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, दिल्ली में बैरिकेडिंग नहीं कर सकती पुलिस, इंटरनेट बहाली-बंद मेट्रो स्टेशनों पर मांगा जवाब

CJP Protest मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो सेवाएं सामान्य रखने, इंटरनेट प्रतिबंधों पर जवाब देने और बंद स्टेशनों का नक्शा पेश करने को कहा। पुलिस कार्रवाई और नागरिकों की आवाजाही पर भी सवाल उठे।;

Update: 2026-10-11 06:58 GMT

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में पुलिस कार्रवाई, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, इंटरनेट प्रतिबंध और प्रदर्शनकारियों की हिरासत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने संबंधित अधिकारियों से मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट प्रतिबंधों पर जवाब मांगा। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर आम नागरिकों की आवाजाही और जरूरी सेवाओं को पूरी तरह बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

मेट्रो सेवाएं सामान्य रखने पर जोर

सुनवाई के दौरान अदालत ने बंद किए गए मेट्रो स्टेशनों की सूची और उनकी भौगोलिक स्थिति दर्शाने वाला नक्शा पेश करने को कहा। इसका उद्देश्य यह समझना है कि प्रतिबंधों से यात्रियों और सार्वजनिक परिवहन पर कितना असर पड़ा।

सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि दिल्ली के कुल 303 मेट्रो स्टेशनों में से कुछ स्टेशनों पर ही प्रतिबंध लगाए गए थे। रिपोर्टों के मुताबिक, शुरुआत में 57 स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने का प्रस्ताव था। बाद में यह संख्या घटाई गई। अदालत को बताया गया कि शनिवार रात तक सभी मेट्रो स्टेशन खोल दिए गए थे और सेवाएं बहाल कर दी गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय जरूरत के मुताबिक नियंत्रित किया जा सकता है। अधिकारियों को अपने फैसलों और प्रतिबंधों की जानकारी यात्रियों तक पहुंचाने के निर्देश भी दिए गए थे।

बैरिकेडिंग और आम लोगों की आवाजाही पर सवाल

सुनवाई के दौरान दिल्ली में जगह-जगह बैरिकेडिंग और यातायात प्रतिबंधों का मुद्दा भी उठा। वकीलों ने दलील दी कि सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम नागरिकों को शहर में आने-जाने में परेशानी हुई। अदालत ने अधिकारियों से प्रतिबंधों की आवश्यकता और उनके प्रभाव का विवरण मांगा।

पीठ ने सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों को अनावश्यक परेशानी से बचाने के बीच संतुलन रखने पर जोर दिया। हालांकि, अदालत की टिप्पणियों को सभी बैरिकेडिंग पर बिना शर्त रोक के आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सुरक्षा संबंधी उपायों पर फैसला कानून और परिस्थितियों के अनुसार लिया जाना है।

इंटरनेट बहाली पर भी मांगी जानकारी

दिल्ली में जनपथ और कर्तव्य पथ के आसपास मोबाइल इंटरनेट सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को भी अदालत के सामने चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि इंटरनेट बंद करने का फैसला नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अनुरूप था या नहीं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इंटरनेट प्रतिबंधों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ फैसले का हवाला दिया। इस मामले में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया गया था।

सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इंटरनेट सेवाएं पिछली रात से बहाल हैं। पीठ ने इस जानकारी को रिकॉर्ड पर लेने की बात कही।

पुलिस कार्रवाई और हिरासत पर वकीलों की चिंता

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शहदान फरासत ने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों और वकीलों को कथित तौर पर घसीटकर बसों में बैठाया गया। वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही में आ रही बाधाओं पर चिंता जताई।

कपिल सिब्बल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों और प्रदर्शनकारियों की हिरासत का मुद्दा उठाया। ये आरोप सुनवाई के दौरान वकीलों की ओर से रखी गई दलीलों का हिस्सा हैं।

अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब और आदेशों के अनुपालन की रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। मामले में आगे की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट होगा कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासन ने क्या कदम उठाए और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कार्रवाई की गई।

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