5वीं पास युवती नहीं पढ़ सकी हिंदी अखबार, इलाहाबाद हाईकोर्ट हैरान; यूपी की शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट में पांचवीं पास युवती हिंदी अखबार नहीं पढ़ सकी। अदालत ने UP की शिक्षा व्यवस्था, बच्चों के कौशल विकास और पॉक्सो कानून में संभावित संशोधन पर चिंता जताई।;

Update: 2026-10-14 04:10 GMT

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। बांदा जिले से जुड़े एक बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले की सुनवाई के दौरान अदालत उस समय हैरान रह गई, जब पांचवीं कक्षा तक पढ़ने का दावा करने वाली युवती हिंदी अखबार नहीं पढ़ सकी। वह अपने नाम के अलावा कुछ लिखने में भी असमर्थ थी। इस मामले में अदालत ने शिक्षा, बच्चों के कौशल विकास और पॉक्सो कानून के व्यावहारिक पहलुओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

पांचवीं तक पढ़ाई, फिर भी हिंदी पढ़ने-लिखने में परेशानी

मामले की सुनवाई जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान युवती को अदालत के सामने पेश किया गया। बातचीत में उसने बताया कि वह पांचवीं कक्षा तक पढ़ी है, लेकिन हिंदी अखबार नहीं पढ़ सकती। लिखने के लिए कहे जाने पर उसने केवल अपना नाम लिख पाने की बात कही।

इस स्थिति पर अदालत ने चिंता जताई और सवाल किया कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था बच्चों को पर्याप्त शिक्षा देने तथा उन्हें आगे की कक्षाओं तक बनाए रखने में क्यों सफल नहीं हो पा रही है।

बच्चों को 12वीं तक शिक्षा और कौशल से जोड़ना जरूरी

हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन करते समय यह देखना जरूरी है कि बच्चे विद्यालय में दाखिला लेने के बाद पढ़ाई जारी रख पा रहे हैं या नहीं। अदालत ने सवाल उठाया कि युवती की शिक्षा पांचवीं कक्षा के बाद क्यों रुक गई।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों को बालिग होने तक शिक्षा और कौशल विकास से जोड़ना महत्वपूर्ण है, ताकि वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें। अदालत की टिप्पणी ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच के साथ-साथ पढ़ाई के वास्तविक परिणामों पर भी ध्यान आकर्षित किया।

पॉक्सो कानून के प्रावधानों पर भी चर्चा

सुनवाई के दौरान अदालत ने पॉक्सो अधिनियम के कठोर प्रावधानों और भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के बीच तालमेल पर विचार किया। पीठ ने टिप्पणी की कि अशिक्षा और कानूनी जानकारी की कमी के कारण कई लोग कानून के प्रावधानों और उनके परिणामों को पूरी तरह नहीं समझ पाते। हालांकि, कानून की अनभिज्ञता अपने आप में बचाव नहीं है, लेकिन अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में कानून का यांत्रिक इस्तेमाल न्याय से जुड़े सवाल पैदा कर सकता है।

पीठ ने विधि आयोग से पॉक्सो कानून में संभावित संशोधनों पर विचार करने का आग्रह किया। विशेष परिस्थितियों में न्यायिक विवेकाधिकार और सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंड पर विचार करने का सुझाव भी दिया गया।

युवक-युवती के मामले में क्या हुआ?

यह मामला एक युवक और युवती से जुड़ा है, जो 2025 में घर से चले गए थे। बाद में दोनों ने संयुक्त हलफनामे में खुद को पति-पत्नी बताया। युवती ने एक बच्चे को जन्म भी दिया। युवती के पिता और राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि घटना के समय वह नाबालिग थी। पिता ने दोनों के बीच सपिंड संबंध होने का दावा भी किया।

अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, युवती की उम्र निर्धारित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। केवल पांचवीं कक्षा का ट्रांसफर सर्टिफिकेट था। ऑसिफिकेशन टेस्ट में उसकी उम्र करीब 18 वर्ष आंकी गई। इसके आधार पर अदालत ने उसे बालिग मानते हुए उसकी इच्छा के अनुसार पति के साथ जाने की अनुमति दी।

पॉक्सो मुकदमे पर ट्रायल कोर्ट करेगा फैसला

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका तक सीमित हैं। लंबित पॉक्सो मुकदमे का फैसला ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा। आदेश की प्रति विधि आयोग को भेजने के निर्देश भी दिए गए।

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