नई दिल्ली: दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित जिला अदालत में कार्यरत विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) सीबीआई-01 जितेंद्र प्रताप सिंह (Judge Jitendra Pratap Singh) इन दिनों सुर्खियों में हैं। उन्होंने बहुचर्चित दिल्ली आबकारी नीति मामले में सभी आरोपितों को बरी करने का फैसला सुनाया, जिसके बाद न्यायिक और राजनीतिक हलकों में उनकी भूमिका पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। केंद्रीय एजेंसियों द्वारा जांच किए जाने वाले संवेदनशील भ्रष्टाचार मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश के रूप में उनकी पहचान पहले से ही स्थापित रही है। आबकारी नीति मामले में दिए गए फैसले ने एक बार फिर उन्हें सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। हालांकि न्यायिक सूत्रों के अनुसार, उन्हें एक ऐसे जज के रूप में जाना जाता है जो तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया को सर्वोपरि मानते हैं।
न्यायिक पृष्ठभूमि और पेशेवर सफर
जितेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली न्यायिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से विधि की पढ़ाई की और न्यायिक सेवा में शामिल होने के बाद विभिन्न न्यायिक दायित्वों का निर्वहन किया। अक्टूबर 2024 में उन्हें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया। वर्तमान में वे विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) के रूप में तैनात हैं, जहां मुख्य रूप से सीबीआई द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों और सार्वजनिक पद से संबंधित आपराधिक मामलों की सुनवाई होती है। न्यायिक वर्ग में उन्हें सख्त, प्रक्रिया-आधारित और तथ्यों पर केंद्रित न्यायाधीश माना जाता है। उनके फैसलों में कानूनी सिद्धांतों की स्पष्ट व्याख्या और आदेशों में विस्तार से तर्क प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति देखी जाती है।
आबकारी नीति मामला: क्यों रहा अहम?
दिल्ली आबकारी नीति मामला पिछले कुछ वर्षों में देश के सबसे चर्चित राजनीतिक-प्रशासनिक मामलों में से एक रहा। इस मामले में केंद्रीय जांच एजेंसियों सीबीआई और ईडी ने कई राजनेताओं और अधिकारियों के खिलाफ जांच की। विशेष न्यायाधीश के रूप में जितेंद्र प्रताप सिंह ने इस मामले की सुनवाई की और अंततः सभी आरोपितों को बरी कर दिया। इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन न्यायिक दृष्टि से यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह एक अत्यंत संवेदनशील और व्यापक जांच वाले मामले का निष्कर्ष था। अदालत ने अपने आदेश में साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की दलीलों का विश्लेषण करते हुए निर्णय सुनाया।
मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़ा मामला
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ हेट स्पीच से जुड़ी एक रिवीजन याचिका भी उनके समक्ष आई थी। इस मामले में अदालत ने दिल्ली पुलिस और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया और ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड तलब किया। यह मामला चुनावी भाषण के दौरान दिए गए कथित बयान से जुड़ा था। अदालत ने मामले की सुनवाई जारी रखने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि शिकायत में उठाए गए मुद्दों की न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। इस आदेश ने यह संकेत दिया कि न्यायालय चुनावी बयानबाजी से जुड़े मामलों को गंभीरता से लेता है और प्रत्येक मामले का परीक्षण तथ्यों के आधार पर किया जाएगा।
कपिल मिश्रा मामले में रुख
आबकारी नीति मामले से पहले भी जितेंद्र प्रताप सिंह कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों की सुनवाई कर चुके हैं। वर्ष 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से जुड़े एक मामले में भाजपा नेता कपिल मिश्रा के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोपों की सुनवाई उनके समक्ष हुई थी। कपिल मिश्रा ने अपने खिलाफ जारी समन को चुनौती दी थी और कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। लेकिन अदालत ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि चुनावी भाषणों में प्रयुक्त शब्दों को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यदि किसी बयान से धार्मिक वैमनस्य भड़कने की संभावना हो, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अपने आदेश में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि आरोप मुकदमे की सुनवाई योग्य हैं और मामले को आगे बढ़ना चाहिए। यह निर्णय उस समय व्यापक चर्चा का विषय बना था, क्योंकि यह चुनावी भाषणों की कानूनी सीमाओं और आचार संहिता के पालन से जुड़ा था।
न्यायिक दृष्टिकोण: प्रक्रिया और साक्ष्य पर जोर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जितेंद्र प्रताप सिंह का न्यायिक दृष्टिकोण प्रक्रिया-आधारित है। वे किसी भी मामले में अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों का विस्तार से परीक्षण करते हैं और आदेशों में कानूनी आधार स्पष्ट करते हैं। भ्रष्टाचार और सार्वजनिक पद से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया की शुचिता को वे विशेष महत्व देते हैं। न्यायिक हलकों में यह भी कहा जाता है कि वे मीडिया या राजनीतिक विमर्श से प्रभावित हुए बिना केवल न्यायिक रिकॉर्ड और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय देते हैं। यही कारण है कि संवेदनशील मामलों की सुनवाई में उनका नाम प्रमुखता से सामने आता है।
राजनीतिक और न्यायिक प्रभाव
दिल्ली आबकारी नीति मामले में सभी आरोपितों को बरी करने के फैसले ने जहां एक ओर राजनीतिक बहस को तेज किया है, वहीं न्यायिक स्वतंत्रता और प्रक्रिया की अहमियत पर भी ध्यान केंद्रित किया है। यह फैसला दर्शाता है कि अदालतें जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और कानूनी मानकों के आधार पर ही निर्णय देती हैं। विशेष न्यायाधीश के रूप में जितेंद्र प्रताप सिंह की भूमिका इस संदर्भ में महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने अपने पूर्व निर्णयों में भी यह संकेत दिया है कि चाहे मामला किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा हो, अदालत का दायित्व कानून और साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करना है।
न्यायिक पहचान को चर्चा के केंद्र में ला दिया
राउज एवेन्यू अदालत के विशेष न्यायाधीश (पीसी एक्ट) सीबीआई-01 जितेंद्र प्रताप सिंह ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में सभी आरोपितों को बरी कर एक बार फिर अपनी न्यायिक पहचान को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इससे पहले कपिल मिश्रा और मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े मामलों में भी उनके आदेशों ने यह स्पष्ट किया था कि वे चुनावी भाषणों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े मामलों को गंभीरता से लेते हैं। उनकी न्यायिक शैली—सख्त, प्रक्रिया-आधारित और तथ्यों पर केंद्रित उन्हें संवेदनशील मामलों की सुनवाई के लिए उपयुक्त बनाती है। आबकारी नीति मामले के बाद उनकी भूमिका पर भले ही राजनीतिक बहस जारी हो, लेकिन न्यायिक दृष्टि से यह स्पष्ट है कि वे कानून के दायरे में रहकर ही निर्णय देने की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम हैं।