गैंगस्टर अबू सलेम की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, 25 साल पूरे होने की दलील खारिज

सुप्रीम कोर्ट में सलेम की ओर से दलील दी गई थी कि वह भारत में 25 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। उसकी गणना में अंडरट्रायल के तौर पर हिरासत में बिताया गया समय, दोषसिद्धि के बाद जेल में बिताई अवधि और जेल के दौरान मिली छूट को भी शामिल किया गया था।;

Update: 2026-09-11 04:46 GMT

नई दिल्ली: 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में दोषी गैंगस्टर अबू सलेम को जेल से जल्द रिहाई की उम्मीदों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने उसकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दावा किया था कि पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण के दौरान तय शर्तों के मुताबिक उसकी 25 साल की अधिकतम जेल अवधि पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें सलेम की तत्काल रिहाई की मांग को खारिज किया गया था।

दो जजों की पीठ ने सुनाया फैसला

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गुरुवार को मामले पर अपना फैसला सुनाया। हालांकि, अदालत के विस्तृत फैसले का इंतजार है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में सलेम की याचिका पर 27 जुलाई को सुनवाई पूरी हो गई थी। सलेम ने बॉम्बे हाई कोर्ट के अप्रैल में दिए गए आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था। हाई कोर्ट ने उसकी तत्काल रिहाई की मांग को समय से पहले और गलत कानूनी धारणा पर आधारित बताते हुए खारिज कर दिया था।

25 साल की अवधि को लेकर क्या था विवाद?

सुप्रीम कोर्ट में सलेम की ओर से दलील दी गई थी कि वह भारत में 25 साल से ज्यादा समय जेल में बिता चुका है। उसकी गणना में अंडरट्रायल के तौर पर हिरासत में बिताया गया समय, दोषसिद्धि के बाद जेल में बिताई अवधि और जेल के दौरान मिली छूट को भी शामिल किया गया था। सलेम का पक्ष था कि इन सभी अवधियों को जोड़ने पर वह 25 साल की सीमा पार कर चुका है और इसलिए उसे अब रिहा किया जाना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया था। अदालत ने कहा था कि सजा की निर्धारित अवधि की गणना में जेल में मिली छूट को शामिल करने की सलेम की कोशिश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाई कोर्ट के इस रुख को बरकरार रखा है।

2022 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र

इस मामले में सजा की अवधि की गणना किस तारीख से की जाएगी, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के 11 जुलाई 2022 के फैसले का भी महत्व है। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि सलेम की सजा की गणना के लिए हिरासत की अवधि 12 अक्टूबर 2005 से शुरू मानी जाएगी। यही तारीख वर्तमान विवाद में भी महत्वपूर्ण रही है। सलेम की ओर से अलग-अलग अवधियों को जोड़कर 25 साल पूरे होने का दावा किया गया, जबकि अदालतों ने प्रत्यर्पण और सजा की कानूनी शर्तों के तहत अवधि की गणना के तरीके पर अलग रुख अपनाया।

2005 में पुर्तगाल से हुआ था प्रत्यर्पण

अबू सलेम को 1993 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद पुर्तगाल से भारत लाया गया था। उसका प्रत्यर्पण 11 नवंबर 2005 को हुआ था। भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते की शर्तों का इस मामले में विशेष महत्व है। समझौते के तहत सलेम को भारत में मौत की सजा नहीं दी जा सकती थी। साथ ही उसकी जेल की सजा 25 वर्ष से अधिक नहीं होने की शर्त भी जुड़ी थी। इसी प्रावधान को आधार बनाकर सलेम ने अदालत के सामने रिहाई की मांग रखी थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फिलहाल रिहाई टली

सलेम की दलील का केंद्र यह था कि प्रत्यर्पण की शर्त के तहत अधिकतम 25 साल की अवधि पूरी हो चुकी है। लेकिन अदालत ने उसकी तत्काल रिहाई की मांग स्वीकार नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल उसे जेल से बाहर आने का रास्ता बंद हो गया है। मामले में विस्तृत फैसला आने के बाद यह और स्पष्ट होगा कि अदालत ने 25 वर्ष की अवधि की गणना और प्रत्यर्पण की शर्तों को लेकर किन कानूनी पहलुओं को निर्णायक माना है।

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