टाटा समूह में बढ़ी खींचतान, चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल पर ट्रस्ट्स ने जताई आपत्ति

टाटा संस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर पहले पद छोड़ने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के बाद अगले पांच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर किया।;

Update: 2026-09-18 07:07 GMT

मुंबई: Tata Group Dispute: टाटा समूह में चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल को लेकर शुरू हुआ विवाद अब समूह के नियंत्रण, निवेश की दिशा और भविष्य की रणनीति से जुड़े बड़े मतभेद में बदलता दिखाई दे रहा है। गुरुवार को मुंबई में टाटा संस के निदेशक मंडल की करीब तीन घंटे चली बैठक में चंद्रशेखरन को मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद पांच वर्ष के लिए फिर कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव बहुमत से पारित किया गया। हालांकि, समूह के सबसे बड़े शेयरधारक टाटा ट्रस्ट्स ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है।

बोर्ड ने बहुमत से पास किया प्रस्ताव

टाटा संस की ओर से जारी बयान के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने बोर्ड के अनुरोध पर पहले पद छोड़ने के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया। इसके बाद बोर्ड ने उनके मौजूदा कार्यकाल के बाद अगले पांच वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बहुमत से मंजूर किया। इस प्रस्ताव के खिलाफ टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के वोट करने की बात सामने आई है, जबकि अन्य निदेशकों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। ऐसे में बोर्ड का फैसला समूह के भीतर जारी मतभेद को खत्म करने के बजाय नए चरण में ले जाता दिख रहा है।

अगस्त में चंद्रशेखरन ने जताई थी विदाई की इच्छा

एन. चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होना है। उन्होंने अगस्त 2026 में टाटा संस के बोर्ड को पत्र लिखकर कार्यकाल समाप्त होने के बाद पद पर नहीं बने रहने की इच्छा जताई थी। बताया गया कि उनके कार्यकाल के विस्तार को लेकर बोर्ड के भीतर आम सहमति नहीं बन पा रही थी। इसके बाद 17 सितंबर की बोर्ड बैठक पर सबकी नजर थी। बैठक के बाद कंपनी के बयान ने स्थिति बदल दी और चंद्रशेखरन के पांच साल के नए कार्यकाल का प्रस्ताव सामने आया।

असल मुद्दा चेयरमैन पद से कहीं बड़ा

टाटा समूह में चल रही खींचतान को केवल चेयरमैन की नियुक्ति का विवाद नहीं माना जा रहा है। इसके केंद्र में समूह की रणनीतिक दिशा, निवेश की प्राथमिकताएं और टाटा संस के संचालन में ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे मुद्दे भी हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शापूरजी पलोनजी समूह की हिस्सेदारी करीब 18.4 प्रतिशत है, जबकि बाकी हिस्सेदारी विभिन्न सूचीबद्ध कंपनियों, परिवार के सदस्यों और अन्य निवेशकों के पास बताई जाती है।

नोएल टाटा चाहते हैं निवेश पर ज्यादा नियंत्रण

नोएल टाटा का रुख समूह के घाटे वाले कारोबार और नए क्षेत्रों में बड़े निवेश को लेकर अधिक सतर्क बताया जाता है। उनके पक्ष से यह सवाल उठाया जाता रहा है कि जिन कारोबारों में भारी पूंजी लगाई जा रही है, उनसे भविष्य में किस तरह का रिटर्न हासिल होगा। इसके विपरीत चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह ने एयर इंडिया के अधिग्रहण के अलावा टाटा डिजिटल, सेमीकंडक्टर-इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश किए हैं। सूचीबद्ध कंपनियों की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत होने के बावजूद एयर इंडिया और डिजिटल कारोबार जैसे कुछ गैर-सूचीबद्ध व्यवसायों को लेकर रणनीति पर सवाल उठते रहे हैं।

एयर इंडिया और डिजिटल कारोबार पर मतभेद

नोएल टाटा की ओर से ऐसे कारोबारों के लिए लंबी अवधि की स्पष्ट योजना और नए निवेश की जवाबदेही तय करने पर जोर दिए जाने की बात सामने आई है। उनका यह भी मत बताया जाता है कि समूह के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों पर टाटा संस के बोर्ड में पर्याप्त चर्चा होनी चाहिए। दूसरी ओर, मौजूदा प्रबंधन की रणनीति में समूह को नए और तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में स्थापित करने पर जोर रहा है। यही अंतर दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक दृष्टिकोण का एक प्रमुख बिंदु बना हुआ है।

टाटा संस की लिस्टिंग भी बड़ा मुद्दा

विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग भी है। भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किए जाने के बाद उसकी लिस्टिंग का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है। टाटा ट्रस्ट्स के रुख को लेकर ऐसी चर्चा है कि वह निजी कंपनी के रूप में टाटा संस पर ट्रस्ट्स के नियंत्रण को बनाए रखने के पक्ष में है। हालांकि, मौजूदा कानूनी और नियामकीय प्रावधानों के कारण इस मामले में किसी एक पक्ष की इच्छा से अंतिम फैसला होना जरूरी नहीं है। टाटा संस ने भी अपने बयान में कहा है कि वह आरबीआई के दिशानिर्देशों के अनुरूप लिस्टिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।

आगे भी जारी रह सकती है खींचतान

गवर्नेंस, उत्तराधिकार, निवेश रणनीति और लिस्टिंग जैसे मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण के कारण टाटा समूह के भीतर विवाद का समाधान अभी स्पष्ट नहीं है। चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव बोर्ड से पारित हो चुका है, लेकिन टाटा ट्रस्ट्स की आपत्ति के संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में समूह के स्वामित्व और प्रबंधन के रिश्ते को लेकर महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं।

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