मुंबई: महंगाई के बढ़ते दबाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला किया है। करीब 44 महीने बाद केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में बढ़ोतरी की है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक के बाद रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट यानी 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके बाद रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गया है।
महंगाई से निपटने के लिए सख्त रुख
आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय आया है जब घरेलू महंगाई के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण वैश्विक आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और शेयर बाजारों में अनिश्चितता के बीच केंद्रीय बैंक ने महंगाई पर नियंत्रण को प्राथमिकता दी है। आरबीआई के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत बनी हुई है और आर्थिक गतिविधियों में गति कायम है। हालांकि, महंगाई के मोर्चे पर जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
होम और कार लोन की EMI पर असर
रेपो रेट बढ़ने का सीधा असर बैंकों और वित्तीय संस्थानों की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। खासकर फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, कार लोन और अन्य रिटेल लोन की ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। इससे आने वाले समय में नए कर्ज लेने वालों के साथ मौजूदा कर्जदारों की EMI पर भी असर पड़ने की संभावना है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए पैसा उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए आरबीआई से धन लेना महंगा हो जाता है, जिसका असर आगे चलकर ग्राहकों को मिलने वाले कर्ज पर पड़ सकता है।
SDF और MSF दरों में भी बढ़ोतरी
MPC ने केवल रेपो रेट में ही बदलाव नहीं किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) दर को 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) और बैंक रेट भी बढ़कर 5.75 प्रतिशत हो गए हैं। आरबीआई के इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में ब्याज दरों का पूरा ढांचा प्रभावित होने की संभावना है। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य वित्तीय परिस्थितियों को इस तरह संतुलित करना है कि महंगाई पर नियंत्रण रखा जा सके, जबकि आर्थिक विकास की रफ्तार भी बनी रहे।
ग्लोबल संकट ने बढ़ाई चिंता
आरबीआई ने वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को लेकर भी चिंता जताई है। मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का जोखिम बढ़ा है। ऊर्जा कीमतों में बदलाव का असर परिवहन से लेकर खाद्य पदार्थों और अन्य जरूरी वस्तुओं तक पर पड़ सकता है। इसके अलावा प्राकृतिक गैस की आपूर्ति, खाद और दूसरी आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई को लेकर भी वैश्विक स्तर पर चुनौतियां सामने आई हैं। खराब मौसम और कमजोर मानसून की आशंकाओं से कृषि उत्पादन पर भी दबाव पड़ने की संभावना जताई गई है।
महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत
आरबीआई ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए महंगाई को लेकर अपने अनुमान भी जारी किए हैं। केंद्रीय बैंक के मुताबिक, हेडलाइन CPI महंगाई अगले तीन तिमाहियों में औसतन करीब 5.8 प्रतिशत रह सकती है। वहीं पूरे वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा गया है। दूसरी तिमाही में महंगाई दर 4.9 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है। गवर्नर के मुताबिक, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी अब ज्यादा व्यापक रूप से दिखाई दे रही है।
GDP ग्रोथ पर RBI का अनुमान
महंगाई के दबाव के बावजूद आरबीआई ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती पर भरोसा जताया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि पहली तिमाही में वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत रही, जो घरेलू आर्थिक गतिविधियों की मजबूती को दर्शाती है। MPC के अनुमान के अनुसार मौजूदा वित्त वर्ष में देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रह सकती है। दूसरी तिमाही में ग्रोथ का अनुमान 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रखा गया है। वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी 7.1 प्रतिशत की ग्रोथ का अनुमान है।
दिसंबर में भी बढ़ सकता है दबाव
आरबीआई के सख्त रुख से संकेत मिलता है कि आने वाली मौद्रिक नीति बैठकों में भी महंगाई पर केंद्रीय बैंक की नजर बनी रहेगी। यदि वैश्विक परिस्थितियां और घरेलू महंगाई का दबाव कायम रहता है, तो आगे भी ब्याज दरों को लेकर सख्त फैसले की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी ने कर्ज लेने वालों के लिए ब्याज दरों का दबाव बढ़ा दिया है।