नई दिल्ली। Plastic Notes In India: भारत में जल्द ही मुद्रा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) एक बार फिर प्लास्टिक या पॉलीमर बैंक नोटों को चलन में लाने की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रहा है। यदि यह योजना अमल में आती है तो देश में वर्षों से इस्तेमाल हो रहे पारंपरिक कागजी नोटों की जगह धीरे-धीरे अधिक टिकाऊ और आधुनिक तकनीक वाले नोट देखने को मिल सकते हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, आरबीआई की हाल में हुई दो बोर्ड बैठकों में पॉलीमर नोटों को लेकर चर्चा हुई है। ये बैठकें पटना और मुंबई में आयोजित की गई थीं। माना जा रहा है कि केंद्रीय बैंक जल्द ही इस दिशा में एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा कर सकता है।
क्यों बढ़ी प्लास्टिक नोटों की जरूरत?
भारत में हर साल बड़ी संख्या में मुद्रा नोट खराब हो जाते हैं। अधिक इस्तेमाल, नमी, धूल और अन्य कारणों से नोट जल्दी खराब होने लगते हैं, जिसके बाद उन्हें चलन से हटाना पड़ता है। इनकी जगह नए नोट छापने में सरकार और रिजर्व बैंक को भारी खर्च उठाना पड़ता है। यही कारण है कि लंबे समय तक चलने वाले पॉलीमर नोटों को एक व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं। इससे बार-बार नोट छापने की आवश्यकता कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी कमी आएगी।
नोट छापने का बढ़ता खर्च
आरबीआई के सामने नोटों की छपाई पर बढ़ता खर्च भी एक बड़ी चुनौती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में करेंसी नोटों की छपाई पर लगभग 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। यह राशि वित्त वर्ष 2023-24 के 5,101.4 करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक थी। विशेषज्ञों के अनुसार यह वृद्धि मुख्य रूप से बाजार में मुद्रा की बढ़ती मांग और खराब हो चुके नोटों को बदलने की आवश्यकता के कारण हुई। हालांकि वित्त वर्ष 2025-26 में यह खर्च घटकर लगभग 4,875 करोड़ रुपये रह गया, लेकिन लंबे समय के लिए लागत कम करने के विकल्पों पर विचार जारी है।
खराब नोटों की संख्या भी रही बड़ी समस्या
मुद्रा प्रबंधन से जुड़ी एक और चुनौती खराब नोटों की बढ़ती संख्या है। वर्ष 2024-25 में लगभग 23.8 अरब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ा था, जबकि 2023-24 में यह संख्या 21.24 अरब थी। हालांकि 2025-26 में खराब नोटों की संख्या घटकर 17.20 अरब रही, फिर भी यह आंकड़ा काफी बड़ा माना जाता है। ऐसे में पॉलीमर नोटों को एक टिकाऊ विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उनकी आयु सामान्य नोटों की तुलना में कहीं अधिक होती है।
2012 में भी हुआ था प्रयोग
प्लास्टिक नोटों का विचार भारत के लिए नया नहीं है। इससे पहले वर्ष 2012 में भी इस दिशा में कदम उठाया गया था। उस समय केंद्र सरकार ने पांच शहरों में 10 रुपये मूल्यवर्ग के पॉलीमर नोटों का परीक्षण करने की मंजूरी दी थी। कोच्चि, मैसुरु, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला में लगभग एक अरब पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल की योजना बनाई गई थी। हालांकि तकनीकी और परिचालन संबंधी कुछ चुनौतियों के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी और परीक्षण को रोकना पड़ा। अब माना जा रहा है कि उस समय सामने आई अधिकांश समस्याओं का समाधान कर लिया गया है, जिससे इस योजना को दोबारा आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है।
दुनिया के कई देशों में सफल हैं पॉलीमर नोट
पॉलीमर नोटों का उपयोग आज दुनिया के अनेक देशों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1998 में प्लास्टिक नोट जारी करने वाला पहला देश बना था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, रोमानिया और वियतनाम समेत करीब 60 देशों ने अपनी मुद्रा प्रणाली में पॉलीमर नोटों को शामिल किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि प्लास्टिक नोट न केवल अधिक टिकाऊ होते हैं बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर साबित होते हैं।
क्या होते हैं पॉलीमर नोट?
पॉलीमर बैंक नोट विशेष प्रकार की पतली और लचीली प्लास्टिक सामग्री से बनाए जाते हैं। हालांकि इन्हें प्लास्टिक कहा जाता है, लेकिन ये क्रेडिट या डेबिट कार्ड की तरह कठोर नहीं होते। इन्हें आसानी से मोड़ा जा सकता है और सामान्य कागजी नोटों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इन नोटों की बनावट ऐसी होती है कि उन पर पानी, नमी, धूल और गंदगी का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ता है। यही वजह है कि ये लंबे समय तक सुरक्षित बने रहते हैं।
सुरक्षा और टिकाऊपन सबसे बड़ी ताकत
पॉलीमर नोटों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी मजबूती और सुरक्षा है। इनमें आधुनिक सुरक्षा तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे नकली नोटों की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। इन नोटों में पारदर्शी सुरक्षा विंडो, माइक्रो-ऑप्टिक होलोग्राम, विशेष स्याही और अन्य उन्नत फीचर जोड़े जा सकते हैं। इन तकनीकों के कारण इनकी नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो जाता है।
भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की ओर कदम
यदि आरबीआई पॉलीमर नोटों का पायलट प्रोजेक्ट शुरू करता है और उसके परिणाम सकारात्मक रहते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत की मुद्रा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे न केवल नोटों की उम्र बढ़ेगी बल्कि छपाई और प्रतिस्थापन पर होने वाला खर्च भी कम होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर के बावजूद नकदी की उपयोगिता अभी भी बनी हुई है। ऐसे में अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और किफायती नोटों की दिशा में यह पहल भारतीय मुद्रा प्रणाली को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।