भारत के विमानन क्षेत्र पर संकट के बादल

एयर इंडिया और इंडिगो से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं, बढ़ते घाटे और नियामकीय सवालों ने भारत के तेजी से बढ़ते विमानन क्षेत्र की चुनौतियों को उजागर कर दिया है;

Update: 2026-08-31 18:48 GMT

एयर इंडिया और इंडिगो से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं, बढ़ते घाटे और नियामकीय सवालों ने भारत के तेजी से बढ़ते विमानन क्षेत्र की चुनौतियों को उजागर कर दिया है.

एक साल पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विमानन क्षेत्र को उभरते भारत की पहचान बताते हुए कहा था कि यह उद्योग नई ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार है. लेकिन अब भारत के विमानन क्षेत्र को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. एयर इंडिया और इंडिगो जैसी देश की दो सबसे बड़ी एयरलाइनों से जुड़ी घटनाओं ने सुरक्षा, नियामक व्यवस्था और वित्तीय स्थिरता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े घरेलू विमानन बाजार के रूप में भारत ने पिछले दशक में तेज वृद्धि दर्ज की है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने इस विकास मॉडल की कमजोरियों को भी उजागर किया है. भू-राजनीतिक घटनाओं ने हालात को और जटिल बना दिया है, जिनसे एयरलाइनों की लागत बढ़ी है और विस्तार योजनाओं पर असर पड़ा है.

देश के घरेलू विमानन बाजार में एयर इंडिया और इंडिगो का दबदबा है. दोनों एयरलाइनों के पास मिलाकर घरेलू उड़ानों की लगभग 90 प्रतिशत सीट क्षमता है. विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिस्पर्धा की कमी भी उद्योग की चुनौतियों में एक महत्वपूर्ण कारक है.

मार्टिन कंसल्टिंग के प्रमुख और एविएशन क्षेत्र के विशेषज्ञ मार्क मार्टिन कहते हैं कि वैश्विक प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता के लिहाज से 2025 और 2026 भारत के लिए विमानन क्षेत्र में सबसे कठिन वर्षों में रहे हैं.

सुरक्षा के सवाल

इस महीने एयर इंडिया की एक उड़ान से जुड़ी घटना ने नई चिंताएं पैदा कर दीं. थाईलैंड के फुकेट से नई दिल्ली आ रही एयर इंडिया की एक उड़ान अचानक लगभग 300 फुट नीचे आ गई, जिससे 24 यात्री घायल हो गए. घटना के बाद तब और विवाद बढ़ गया जब रिपोर्टों में दावा किया गया कि विमान के कप्तान की लैंडिंग के बाद की गई जांच में मारिजुआना सेवन के संकेत मिले.

इसके बाद एयर इंडिया ने अपने सभी पायलटों की एक बार विशेष मादक पदार्थ जांच कराने का फैसला किया. मामले की जांच जारी है और शुरुआती निष्कर्ष आने वाले हफ्तों में सामने आने की संभावना है.

यह घटना ऐसे समय हुई है जब एयर इंडिया पहले से ही सुरक्षा संबंधी सवालों के केंद्र में है. पिछले साल अहमदाबाद से लंदन जा रहे एक बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान हादसे में 241 लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद एयरलाइन की सुरक्षा प्रक्रियाओं पर व्यापक ध्यान गया.

एक अलग ऑडिट में एयर इंडिया के भीतर सुरक्षा संबंधी लगभग 100 कमियां सामने आईं. संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार इनमें सात ऐसे उल्लंघन शामिल थे जिन पर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता बताई गई. रिपोर्ट में बोइंग 787 और बोइंग 777 विमानों के पायलटों के प्रशिक्षण में बार-बार सामने आने वाली कमियों का भी उल्लेख किया गया.

पूर्व एयरलाइन परिचालन प्रमुख शक्ति लुंबा का दावा है कि एयर इंडिया की सुरक्षा संस्कृति कमजोर है. उनके अनुसार केवल सुरक्षा की बात करने से सुरक्षा संस्कृति विकसित नहीं होती, बल्कि उसके लिए लगातार और ठोस कार्रवाई जरूरी होती है. डीजीसीए पर भी कई तरह के आरोप लगे हैं.

एयर इंडिया के पूर्व कार्यकारी निदेशक जितेंद्र भार्गव ने पायलट से जुड़े कथित मादक पदार्थ मामले को प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाला बताया. उन्होंने कहा कि यदि कोई पायलट लंबे समय से ऐसे व्यवहार में शामिल हो तो उसके सहयोगियों को इसकी जानकारी होने की संभावना रहती है.

वित्तीय दबाव के खतरे

सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के साथ-साथ भारतीय एयरलाइनों पर वित्तीय दबाव भी बढ़ रहा है. पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ने के बाद पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र बंद होने से भारतीय विमानन कंपनियों को लंबे और अधिक महंगे मार्गों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है.

इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण विमान ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी ने एयरलाइनों की लागत और बढ़ा दी है. रेटिंग एजेंसी आईसीआरए का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में भारतीय एयरलाइनों को लगभग चार अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है.

एयर इंडिया का घाटा पिछले वित्त वर्ष में बढ़कर 2.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया, जबकि इंडिगो को लगातार दो तिमाहियों में नुकसान दर्ज करना पड़ा है.

वित्तीय दबाव का असर विस्तार योजनाओं पर भी दिखाई दे रहा है. इंडिगो ने पिछले महीने अपनी वाइड-बॉडी विमान सेवा बंद कर दी, जबकि रिपोर्टों के अनुसार एयर इंडिया सैकड़ों नए विमानों की खरीद को टालने पर विचार कर रही है.

कैसे होगा विस्तार?

पिछले दशक में भारतीय विमानन क्षेत्र ने तेजी से विस्तार किया है. पिछले साल भारतीय एयरलाइनों ने लगभग 16.7 करोड़ यात्रियों को सेवा दी, जो दस वर्ष पहले के मुकाबले दोगुने से अधिक है. इसी अवधि में देश में 70 से अधिक नए हवाई अड्डे जुड़े और एयरलाइनों ने लगभग 1,500 विमानों के ऑर्डर दिए.

स्टारएयर कंसल्टिंग के अध्यक्ष हर्ष वर्धन का कहना है कि समस्या विकास की कमी नहीं, बल्कि यह है कि विमानन पारिस्थितिकी तंत्र के अन्य हिस्से इस तेज वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बिठा पाए. नियामकीय ढांचे को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. पिछले साल इंडिगो को पायलटों की थकान से जुड़े नए नियमों की पर्याप्त तैयारी ना होने के कारण बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द करनी पड़ी थीं. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि नए विश्राम नियमों के कुछ हिस्सों को अस्थायी रूप से स्थगित किया जाना नियमगत कमजोरी का संकेत है. लुंबा का आरोप है कि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) कई बार नियामक की बजाय सुविधाकर्ता की भूमिका निभाता दिखाई देता है.

पिछले दो दशकों में सात प्रमुख भारतीय एयरलाइनों का बंद होना या बिक जाना भी बाजार में प्रतिस्पर्धा कम होने का कारण बना है. इससे नियामकों के लिए प्रमुख कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना और मुश्किल हो गया है.

बड़ी तैयारी की जरूरत

सरकार ने पिछले साल कहा था कि देश को पांच बड़ी एयरलाइनों की जरूरत है. इसके बाद दो नई विमानन कंपनियों की योजनाओं को मंजूरी दी गई है. साथ ही हवाई अड्डा संचालकों को एयरलाइन स्वामित्व की अनुमति देने वाले नियमों में ढील देने के प्रस्ताव पर भी विचार किया जा रहा है.

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए निवेशकों को आकर्षित करना पर्याप्त नहीं होगा. उनके अनुसार लागत संरचना लंबे समय से इतनी कठिन रही है कि नई कंपनियों के लिए बाजार में जगह बनाना मुश्किल साबित हुआ है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विमानन महत्वाकांक्षाओं के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि एक ओर इस क्षेत्र को देश के सबसे संभावनाशील उद्योगों में गिना जाता है, जबकि दूसरी ओर इस व्यापार से मुनाफे पर लगातार दबाव बना हुआ है.

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